रक्षिष्यतीति विश्वासो,गोप्तृत्वे वरणं तथा।
आत्मनिक्षेप कार्पण्यम्,षड्विधा शरणागति:।।
वह मेरी रक्षा करेंगे ही यह विश्वास करना, अपने आपको उनकी धरोहर समझना। जैसे किसी ने कोई चीज आपके पास अपनी रख दी कि मैं बाहर जा रहा हूँ लौट कर आऊँगा तब ले लूँगा। अब आप केवल उसकी रक्षा करते हैं, क्योंकि वह धरोहर है, उसका उपयोग नहीं करते, क्योंकि वह धरोहर है। उसके उपयोग करने का अधिकार आपको नहीं है, केवल रक्षा करने के लिये ही आपके पास रखी गयी है, इसलिये अपने आपको गुरु की धरोहर समझ कर उसकी रक्षा मात्र आपको करना है।
अपना आपका क्या है? शरीर, मन बुद्धि, इन्द्रिय, यही सब तो है। जो भी कुछ मेरा है वह सब आत्मा के सहित आपका है, यह सब गुरु का है। उस गुरु का है यह सब और आपके पास धरोहर के रूप में रखा है क्योंकि शरीर आपके पास रहेगा, मन आपके पास रहेगा, बुद्धि आपके पास रहेगी। लेकिन उन सब को गुरु का समझ कर आपको सदुपयोग करना है।
जो कुछ मिला है उसको गुरु के आदेशानुसार सदुपयोग करना चाहिये। गुरु ने कहा—न सोचो, नहीं सोचोगे। ऐसा करो, कर लिया। ऐसा न करो, नहीं करेंगे। धरोहर के रूप में समझने का मतलब है गुरु के आदेश के अनुसार कार्य करना। उसके दास है, ऐसा समझना, ऐसा अनुभव करना।
इस प्रकार गुरु के शरणागत जो भी साधक है, उसको और कुछ करना नहीं है। केवल गुरु आज्ञा पालन करना है।
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