मेरे नैनन तारे जाग रे।

 





मेरे नैनन तारे जाग रे।
भई भोर चहुँ ओर शोर सुन, बोलत शुक पिक काग रे।

शीतल-मंद-सुगंध पवन बह, चकई पाइ सुहाग रे।

आई भानु-किरन लखु मोहन, चंद्र-किरन गई भाग रे।

उदित-भानु लखि विकसित कमलनि, भ्रमरन पियत पराग रे।

दोउ कर परसि ‘कृपालु’ मातु मुख, चूमति अति अनुराग रे।।



भावार्थ:- सोते हुए श्यामसुन्दर को जगाती हुई मैया कहती है कि हे मेरे आँखों के तारे श्यामसुन्दर! जागो। देखो तो सवेरा हो गया। चारों ओर तोते, कोयल एवं कौवे शोर कर रहे हैं।  शीतल, मंद, सुगन्धित वायु बह रही है। रात भर की बिछुड़ी हुई चकई, चकवे से मिल रही है। सूर्य की किरणें फैल रही हैं। चन्द्रमा की किरणें समाप्त हो रही हैं। सूर्योदय होने से खिले हुए कमलों पर गुंजार करते हुए भौंरे पराग रस पी रहे हैं।
          ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में मैया इस प्रकार कहती हुई प्रेम विभोर हो कर अपने दोनों हाथों से श्यामसुन्दर का मुख स्पर्श कर चूमकर बार-बार बलिहार जा रही है।



🌷प्रेमरस मदिरा श्रीकृष्णबाललीला-माधुरी🌷



जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज🌷🌷

नहि बिसरत सखि, छैल बिहारी।

 




नहि बिसरत सखि, छैल बिहारी।

जित देखूँ तित वोही वोही दीखत,
      हाय!ये कैसी मोहिनि डारी।

मोर मुकुट सिर पेच रतन को,
    हलकैं मुख अलकें घुँघरारी।

चंचल नैन मैन मद गंजन,
     तामें अंजन रेखु सँवारी।

कुंडल लोल हलनि श्रवनन में,
   अधर धरि मुरली धुनि प्यारी।

नाक बुलाक भृकुटि वर बॉकी,
   गोल कपोलनि की छवि प्यारी।

उर विशाल वनमाल विराजत,
     गुंजमाल मोतिन माला री।

मणिमय वलय युगल कर सोहे,
   कटि किंकिनि पीताम्बर धारी।

गरल सुधा मदमइ दृग चितवनि,
   करत फिरत जादू टोना री।

बजत चरन छूम छ्ननन नूपुर,
    ताहू पर मुसकावति भारी।

अब 'कृपालु' मम लगत न पलकें,
    देखि अनूपम रूप बिहारी।


  🌷ब्रज रस माधुरी-१🌷


जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज🌷🌷

भोजन को भी भजन के लिये सोचकर कीजिये।

 भोजन को भी भजन के लिये सोचकर कीजिये। हर चीज़ भगवान् के उद्देश्य से कीजिये। बार-बार भगवान् को बीच में लाइये। तो वो रोम रोम में भर जायगा। इस प्रकार आप लोग नियम का पालन करें। मुख्य बात स्वार्थ है। सारा संसार और सारा परमार्थ स्वार्थ पर निर्भर करता है। हमारा स्वार्थ है- आप लोग भगवान् की ओर चलें और हमें खुशी हो हमारे बच्चे देखो, इनमें कितना अनुशासन है और कितना भगवान् के लिये रूपध्यान करके, आँसू बहा रहे हैं,और हमारा खून बढ़ जाय। और आपका तो लाभ होगा ही प्रत्यक्ष। उस बात पर तो खास तौर से आपको ध्यान देना है। अपने मतलब के लिये आप लोग आये हैं, कोई 'कृपालु' पर कृपा करने तो आये नहीं हैं? अपना मतलब तो हल कीजिये। हमारा मतलब तभी हल होगा, जब आपका अपना मतलब हल हो। आप साधना में आगे बढ़े, तो फिर हमको उतनी खुशी होगी। हमको सुख देना चाहते हैं आप,आपका लक्ष्य यही होना चाहिये- 'हरि गुरु की सेवा।' उनको सुख देना। तो उसके लिये आपको उनकी इच्छानुसार चलना चाहिये। उनको कैसे सुख मिलेगा ? अगर हम नियम का पालन करें, तो उनको सुख मिलेगा, तो उनकी कृपा मिलेगी, जो मेन (main) चीज़ है,जिससे हमारा लक्ष्य हल होगा। ये सब सोच करके दुश्मन मन को शासन में रखो। उसकी मत सुनो।

साधना नियम-2
श्री महाराज जी द्वारा दिये गये निर्देश
(साधना शिविर अक्टूबर 2005)



हरि बिनु बिगरी नाहिं बने |

 हरि बिनु बिगरी नाहिं बने |

कर्म ज्ञान अरु भक्ति - साधना, वेदन यदपि भने |

तदपि न छुटत मोह माया मन, किये यतन अपने |

सुत वित पति तिय महँ नित देखत, साँचे सुख सपने |

बुधि समुझाय थकी बहु विधि मन, पै मन नाहिं मने |

कह ‘कृपालु’ हरि अनुकंपा बिनु, मन हरि रस न सने  ||

भावार्थ  -श्यामसुन्दर की प्राप्ति के बिना अनादि काल का दु:ख नहीं समाप्त हो सकता | यद्यपि वेदों ने कर्म, ज्ञान एवं भक्ति की साधना का निरूपण किया है, तथापि अपने प्रयत्न करने मात्र से माया का अत्यन्ताभाव नहीं हो सकता ! धन, पुत्र, स्त्री, पति में सच्चा सुख मानने का अभ्यास पड़ गया है | बुद्धि ने मन को अनेक प्रकार से समझाया किन्तु फिर भी मन नहीं मानता |

      ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं –हे श्यामसुन्दर ! तुम्हारी कृपा के बिना मन तुम्हारे चरण-कमलों का रसिक नहीं बन सकता है |


एक सिन्धु वैदग्ध्य सिन्धु है, कला विलास प्रकार।

एक सिन्धु अनुराग सिन्धु है, मादन भाव निहार।

एक सिन्धु वात्सल्य सिन्धु है, दीनन हित सरकार।

एक सिन्धु है कृपा सिन्धु जो, सुनत प्रपन्न पुकार।

एक सिन्धु लावण्य सिन्धु है, पिये सतत रिझवार।

एक सिन्धु है केलि सिन्धु जो, रिझवत नन्दकुमार।

एक सिन्धु है रूप सिन्धु जो, रसिकन प्राणाधार।

सप्त सिन्धु की ज्यों 'कृपालु' भू, त्यों वृषभानु दुलार।

भावार्थ : श्री राधा का दिव्य वपु मानों सप्त सिन्धु का सार ही है। अनेक प्रकार की विलास कलाओं का वैदग्ध्य सिन्धु प्रथम है। दूसरा मादनाख्य महाभाव का अनुराग सिन्धु है जिससे प्रेमी नंदनन्दन सदैव ही प्रिया राधा के वशीभूत रहते हैं। दीन जनों के हित श्री राधा उर में विलोडित सिन्धु तीसरा सिन्धु है। शरणागत जीवों का क्रन्दन श्रवण करने हेतु श्री राधा के हृदय में कृपा सिन्धु भी सदैव हिलोरें लेता रहता है। पांचवां लावण्य सिन्धु है जो रसिक शेखर श्री कृष्ण की रूप-रस-पान की तृष्णा को सदा अक्षुण्ण रखता है अर्थात् रूप रस पान करते हुए भी वे अतृप्त बने रहते हैं। श्री राधा में स्थित केलि सिन्धु उनके प्रियतम को सदा रस विवश किये रहता है। श्री राधा का रूप सिन्धु तो रसिकों के प्राणों का आधार ही है। इस प्रकार से भानुनन्दिनी सातों समुद्रों से युक्त पृथ्वी के समान ही हैं।


अकारण करुणा वरुणालय

कृपाकन्द कृपालु सरकार की जय 🙌