जो संग हमारे मन को सत में ले जाए, भगवान में ले जाए, ये सत्संग। और वो संग जो हमारे मन को संसार में ले जाए, ये कुसंग। तो सत्संग में कमाई होगी, कुसंग में गवाई होगी। आपने साधना की, दो घंटा अपने मन को शुद्ध कर दिया, लेकिन बाद में लापरवाही कर दिए, अब बैठ के न्यूज़ सुनने लग गए। अरे ठीक है, 10 मिनट न्यूज़ सुन लेते हैं। तो दो घंटे की साधना को 10 मिनट के कुसंग ने खत्म कर दिया। दुसंग का सर्वथा ही त्याग करना चाहिए, दुसंग यानी कुसंग। त्याग दो। डॉक्टर भी तो दो चीजें बोलता है ना, यह दवा लेना और यह परहेज रखना। डायबिटीज का मरीज गया, डॉक्टर कहता है कि हम इंसुलिन की गोली दे रहे हैं और मीठा मत खाना, यह परहेज बता दिया। अब मरीज ने गोली तो नियमानुसार ले ली, लेकिन उसकी शुगर बढ़ती चली गई। तो डॉक्टर के पास वापस गया, डॉक्टर साहब आपकी दवाई तो काम कर नहीं रही। डॉक्टर ने कहा, मीठा खाया था क्या? खाए थे कलाकंद और जलेबी और रसगुल्ला, डेली उसका आस्वादन करते थे, फिर दवाई कैसे काम करेगी? ऐसे ही हम सत्संग करें और कुसंग से बच के रहे, वरना वो कुसंग हमारी साधना को खा जाएगा।
सत्संग क्या, कुसंग क्या? संग एक में उपसर्ग सत है, एक में उपसर्ग कु है। सुसंग और कुसंग। यानी वो संग जो हमारे मन को सत में ले जाए, भगवान में ले जाए, ये सत्संग। और वो संग जो हमारे मन को संसार में ले जाए, एक कुसंग। तो सत्संग में कमाई होगी, कुसंग में गवाई होगी। अब कमाई तो धीरे-धीरे होती, और गवाही बहुत जल्दी हो जाती। आपने साधना की, दो घंटा अपने मन को शुद्ध कर दिया, लेकिन बाद में लापरवाही कर दी, आप बैठ के न्यूज़ सुनने लग गए। अरे ठीक है, 10 मिनट न्यूज़ सुन लेते तो दो घंटे की साधना को 10 मिनट के कुसंग ने खत्म कर दी। तो फिर हम कैसे सोचे कि हम आगे चलेंगे?
एक व्यक्ति घास फूस की रस्सी बना रहा था। वो रस्सी घास को ऐसे बांधना पड़ता, वो बांधता चला जा रहा था, मेहनत करते हुए। 1 घंटे के बाद उसने सोचा, पसीना पसीना हो गए हैं, अब 50 गज तो हो गई होगी। उसने हाथ ऐसे पीछे किया तो पांच फुट की रस्सी है केवल, और बाकी को क्या हो गया? बाकी वो पीछे भैंसा खड़ा था, वो रस्सी खाता जा रहा था। तुम बना रहे थे, वो खा रहा था। तो यही कुसंग है। वो कुसंग आपकी साधना को खा लेगा। तो सत्संग करने से श्रद्धा बढ़ेगी। अब आप किसका संग करते हैं? संसारी का संग करेंगे, वो आपकी श्रद्धा को नष्ट कर देगा।
दो भिखारी बाजार में बैठे हुए थे, उदास, जीवन विफल हो गया। एक भिखारी ने दूसरे से पूछा, भाई क्यों तुम्हारी यह दुर्दशा हुई? उसने कहा, मैंने किसी की सलाह ली नहीं, अपनी बुद्धि से कार्य करता गया, इसीलिए यह दुर्दशा हो गई। तुम बताओ तुम्हारी हालत फटीचर कैसे हुई? उसने कहा, मैंने सबसे सलाह ले ली, इसलिए यह हालत हो गई। तो किसी से सलाह ना लेना यह भी डेंजरस है, सबकी सलाह लेना यह भी डेंजरस है। अरे भी, सबकी सलाह कैसे लोगे? एक ऊंट जो है, वो नदी में खड़ा था। अब ऊंट तो लंबा चौड़ा है ना। लोमड़ी ने तट से पूछा, ऊंट भाई, यह पानी गहरा है क्या? ऊंट ने कहा, बिल्कुल भी नहीं। तो लोमड़ी ने कहा, ठीक है, मैं भी आती हूं। अब वो आई और डूबने लगी। उसने कहा, तुम तो कह रहे थे कि पानी गहरा नहीं है! ऊंट ने कहा, मैं बोल रहा हूं पानी गहरा नहीं। तो इसी प्रकार से आप अगर संसारी लोगों से राय लेने लग जाएंगे, वो कहेंगे, ये कोई एज थोड़ी है भक्ति करने की, जब शरीर बेकार हो जाए, बूढ़े हो जाओ, संसार में कोई पूछे नहीं, उस समय राधे-राधे करो। ये क्या अभी से तुम राधे-राधे करने लग गए हो? तो आप सबकी सुनेंगे, एक तो आपका मन सांसारिक हो जाएगा, और दूसरा आपका जो निश्चय है वो हिल जाएगा। इसीलिए हम सत्संग करें और कुसंग से अपने आप को बचा के रखें। तो कुसंग मतलब संसार का संग।
अब साथ ही साथ कुछ ऐसे-ऐसे इनडायरेक्ट कुसंग होते हैं, महाराज जी उसका डिटेल अपने प्रेम रस सिद्धांत में किए। जैसे कि तमाम संतों का प्रवचन सुनना। अब यह कोई कुसंग तो नहीं है? तो अच्छी बात बताते हैं, इसमें क्या समस्या? आपके लिए समस्या है, क्योंकि सब संतों के मार्ग अलग-अलग हैं, वह अपने-अपने ढंग से जीव का कल्याण कर रहे हैं, वास्तविक संत भी। लेकिन आपके पास इतना सामर्थ्य नहीं है कि उसका समाधान कर सके। तो आप कहेंगे, अरे हमारा क्या, कोई फर्क नहीं पड़ेगा, कोई बाल बांका नहीं होगा, हम सुन लेते हैं, ये भी सुन लेते हैं, वो भी सुन लेते हैं, ये भी सुन लेते हैं। परिणाम क्या होगा? अंदर डाउट आ जाएगा। अब डाउट आ गया, अब गुरु जी की वेट करो। गुरु जी, हमारे अंदर डाउट आ गया, आपसे मिले, इसका समाधान हो, शंका समाधान हो। आप तो बोले कि दैन्य भाव बढ़ाओ, और हम एक दूसरे संत को मिले, उन्होंने कहा, तुम तो ब्रह्म हो, तुम ही भगवान हो, दीनता क्या बढ़ाते हो? तो हमने यह भी सुना, यह भी सुना, यह भी सुना, सब खिचड़ी बना दिए। तो यह इनडायरेक्ट कुसंग हो गया।
ऐसे ही एक भयंकर कुसंग है दूसरों में दोष देखना, दूसरे के दोष पर विचार करना, यह भयंकर कुसंग। अब उसको मुंह से बोलने लग जाना, यह तो सबसे बड़ा कुसंग है। यह तो सर्वनाश करने वाला, पाप इकट्ठा करने वाला। लेकिन हमने अपना टाइम वेस्ट क्यों किया दूसरे के दोष देखने के लिए? क्या हमारे अंदर कोई कम दोष है? हम उस पर क्यों नहीं ध्यान दिए? वो कविता आती है ना, कि तू जो औरों की ओर करता है अंगुस्ते नुमाई, हम जब किसी की ओर उंगली करते हैं, देख यह तीन झुकी है तेरी ओर। एक उंगली हम दूसरे की तरफ करते हैं, तीन हमारी तरफ रहती हैं। तो महाराज जी ने इस पर निषेध कर दिया है:
लखहु जनी पर दोष कबहु दोष निज लखु प्यारे।
लखहु जनी पर दोष कबहु दोष निज लखु प्यारे।
दोष निज लखु प्यारे।
भाई, दूसरों के दोष मत देखो। अगर देखने ही है दोष तो अपने मन को अपने सब दोष दिखा दो, और बाकी सब में टाइम वेस्ट मत करो। और इससे आगे है चुगली करना, किसी का दोष दूसरे को बताना। यह तो बहुत ही बुरा कर्म हो जाता है। इसमें तो हम मात्र पाप कमाते हैं। दूसरे का दोष तीसरे को बताना, इससे हम पाप के भागी बन जाते।
एक राजा ने साधु भोज किया। साधुओं को अपने महल में बुलाकर भोजन करा रहा था, तो खिचड़ी इत्यादि तैयार हो रही थी। अब उसको तो पता नहीं, आकाश में एक चील मरे हुए सांप को उठाकर ले जा रहा था, उस सांप तो