जगदगुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज_से_प्रश्न: महाराज जी! ये काम-क्रोध वाले दोष दूर क्यों नहीं हो रहे हैं जबकि हम रोजाना प्रवचन सुनते हैं, कीर्तन करते हैं, इनमें न्यूनता क्यों नहीं आ पाती है? जैसे अभी तक आपने कहा- जरा सा किसी का धक्का लग गया, तो तुरन्त गुस्सा हो जाता है, यह बात बिल्कुल सत्य है। तो महाराज जी! तेजी से अंतःकरण शुद्ध हो, वह स्थिति क्यों नहीं बन रही रही है, कैसे ठीक हो?



श्री_महाराज_जी_द्वारा_उत्तर:

मधुसूदन सरस्वती ने वृन्दावन में गोवर्धन की परिक्रमा किया और भगवान  नहीं मिले। फिर किया, फिर किया, फिर किया और बहुत दिन करते रहे परिक्रमा, तब भगवान् के दर्शन हुए, तो मधुसूदन ने पीठ कर लिया भगवान् की तरफ। वो रूठ गये, कहने लगे- तुम इतने देर में क्यों आए? तो भगवान् ने दिखाया, उनके पापों का पहाड़ कि तुम्हारे इतने पाप थे कि ये सब जल जायँ, भस्म हो जायँ, तब तो मैं आऊँ। तो अनन्त जन्मों के पाप हमारे हैं, इतना गंदा अंत:करण है कि अगर कपड़ा थोड़ा मैला है तो एक बार साबुन लगाओ, साफ हो गया और अगर धोया ही नहीं है कभी तो गंदा ही रहेगा। चौबीस घण्टे ये भी फीलिंग नहीं है अभी कि भगवान् हमारे अंत: करण में बैठा है, छोटी सी बात। और भगवान् हमारे अंत:करण में नित्य रहता है, ये सुना है, पढ़ा है? 'हाँ'। और 'भगवान् सर्वव्यापक है? हाँ। ' पर मानते हो? ' एक घण्टा भी नहीं मानते, २४ घण्टे में। तो साधना क्या कर रहे हो जो बड़ा भारी फल मिल जाए, तुमको। साधना गलत कर रहे हो, लापरवाही कर रहे हो, अपनी गोपनीयता  रख रहे हो। हम जो सोच रहे हैं, कोई नहीं जानता। वह बैठा-बैठा नोट कर रहा है, कहते हो कोई नहीं जानता।


अगर सही साधना लगातार करता रहे, तो एक दिन लक्ष्य प्राप्त हो जाएगा, असम्भव नहीं है। बड़े-बड़े पापात्मा महापुरुष बने हैं, इतिहास साक्षी है। लेकिन थोड़ी साधना करो, बहुत बड़ा फल चाहो ऐसा नहीं हो सकता है। अपने आपको धिक्कारो अपनी कमी मानो। हम लेक्चर सुन लेते हैं, कीर्तन-आरती कर लेते हैं, ये कोई साधना है।


उनके लिए आँसू बहाओ और हर समय, हर जगह महसूस करो कि वो हमारे साथ हैं- ये साधना है, असली। अहंकार से युक्त हो करके मनुष्य कीर्तन में बैठा, तो आराम से मुँह से बोल रहा है, न रूपध्यान कर रहा है, न आँसू बहा रहा है। ये सब लापरवाही है। उसको पता नहीं है कि कल का दिन मिले या न मिले, रात को ही हार्टफेल हो जाए, क्या पता? यही लापरवाही हमने हर मानव देह में किया। अनन्त बार हमें मनुष्य का शरीर मिला। बहुत दुर्लभ है, फिर भी मिला। और हर मानव देह में हमने क्या किया? माँ-बाप में, सब में, पड़ोसी में, लग गए चौबीस घण्टे। एम.ए. करो, डी लिट् करो, पी.एच.डी भी किया, ये किया, वो किया। अब क्या करें? अब सर्विस करो, सर्विस ढूढा, जगह-जगह परेशान हुए, नहीं मिली, फिर मिल गई सर्विस। अब क्या करें? अब ब्याह कर लो। उसके बाद २-४-६ बच्चे हो गए, अब फिर उनका पालन-पोषण करो और उनके दुःख में दुखी हो। बुढ़ापा आ गया, नाती-पोते हो गए, अब उन्ही का चिंतन, मनन। एक्टिंग में चले गए मन्दिर या अपने घर में ही दो मिनट बैठ गए। ये क्या है? ये तो जान-बूझकर जैसे मनुष्य शरीर को समाप्त करना चाहते हैं और कहते हैं, अपने बेटे से- देखो बेटा! मै तो 70 साल का हो गया, मेरी तो बीत गयी। तुम अपनी सोचो।  मेरी तो बीत गयी। क्या बीत गयी? जब आप मरोगे तो क्या रिकॉर्ड होगा? कहां जाओगे? अरे जो होगा देखा जाएगा। देखा नहीं जाएगा, भोगा जाएगा। बड़ा कमाल दिखाया तुमने, दस-बीस कोठी बना ली, दस- बीस करोड़ कमा लिए, दस-बीस बच्चे पैदा कर लिए। अरे, ये सब क्या है? वो तो कुत्ते-बिल्ली भी करते हैं, इसमें आपने कौन-सा कमाल किया है। सब पशु-पक्षी पेट भरते हैं, अपना।

 

जिस काम को करने के लिए प्रतिज्ञा की थी माँ के पेट में, भगवान् से कि महाराज! हमें निकालो इस नरक से, हम आपका ही भजन करेंगे, वह भूल गये। और सबकी देखा-देखी, वह उधर भाग रहा है, तुम भी भागो। सब लोग भाग रहे हैं, मैटीरियल साइड में कि यहीं आनंद है, एक लाख में, एक करोड़ में, एक अरब में। बस भागे जा रहे हैं। किसी से भी पूछ लेते कि अरबपति किस हाल में है? क्यों भई! आपका क्या हाल है? तो अगर वह बोलेगा ईमानदारी से तो कहेगा कि दिन-रात टेंशन है और नींद की गोली खाकर सोते हैं। उसी सीट पर जाना चाहते हो? अरे! शरीर चलाने के लिए भी कर्म करना है, ये सही है, लेकिन ये लिमिट मे करो, रोटी-दाल मिल जाय, बस। परवाह होनी चाहिए। देखो बच्चों को, छह -आठ महीने तो मटरगश्ती करते हैं पढ़ाई में और जब परीक्षा का एक महीना रह गया तो सारी रात जागते हैं, पढ़ते हैं। यदि ऐसी पढ़ाई शुरू से ही किए होते तो top करते। हम लोगों को कोई जब संसारी मुसीबत आ गई, बेटा सीरियस है, ये है, वो है- भगवान्! हम मान गए आप हो। अच्छा, अब कृपा करके इसको ठीक कर दो। ऐसे ही भगवान कहते हैं  बेवकूफ बनाने के लिए हम ही मिले हैं, तुमको। हमेशा तो तुम लापरवाह रहे।


सोचो, बार-बार सोचने से साधना होगी। बार-बार फील करना- अरे! इतनी उम्र बीत गई, अब अगर जिन्दा भी रहे तो बुढ़ापे में क्या करोगे? जल्दी करो। सबको पता है कि हम माया के अण्डर में हैं, काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष सब भरा हुआ है, सबके अंदर। लेकिन इन्ही दोषों में से एक दोष किसी का कोई कहने दे- आप जरा क्रोधी हैं, आप जरा लोभी हैं, आप जरा स्वार्थी हैं, आप जरा मक्कार हैं। सही बात तो कह रहा है। फील क्यों करते हैं? तुमको तो पता है। हाँ, यह बात ठीक कह रहा है। कोई व्यापारी है, उसे कहते हैं ये व्यपारी हैं, सेठजी हैं वह बुरा तो नहीं मानता कि हमको कलेक्टर कहो।  तुम जो कुछ हो, उसी में से तो कोई कुछ कहेगा। अरे वो बड़ा स्वार्थी है। अरे! भला बताओ स्वार्थी तो महापुरुष, भगवान्, संसार भर है। कौन स्वार्थी नहीं है? असली हो या नकली, स्वार्थ सब स्वार्थ है।

जगद्गुरूत्तम_श्री_कृपालु_जी_महाराज

🌺भक्तवत्सलता 🌺

 ♻️♻️हमारे महाराज जी ♻️♻️

     


           🌺भक्तवत्सलता 🌺


   🌼दिनाँक 28 सितम्बर 2013🌼


श्री महाराज जी ने एक कैंसर रोग से ग्रसित महिला रोगी के बारे में पूरी जानकारी ली। जिनका नाम स्नेहलता था वो मनगढ़ आश्रम वासी थीं उन्हें देखने स्वयं श्री महाराज जी उनके कमरे में गये।


श्री महाराज जी इसके पहले  27 अगस्त 2013 को मनगढ़ से हवाई मार्ग द्वारा वृन्दावन धाम पधार गये थे। वृन्दावन धाम, गोलोक धाम और बरसाना धाम में विभिन्न महोत्सव में व्यस्त रहे। दिनाँक 23 सितम्बर 2013 को ही मनगढ़ धाम लौट कर आये । यद्यपि आप फोन से प्रतिदिन स्नेहलता से बात करते थे और उससे यही कहा करते, अभी चली मत जाना, मैं आ रहा हूँ, मेरे सामने जाना। वो प्रतिदिन आपके आने की प्रतीक्षा करती रही और कहती रही कि ठीक है उनकी जब इच्छा हो तब वे आयें। इसलिये आते ही उसके पास गये। रात्रि में सत्संग के समय जब वो आयी तो उसे अपने गले की माला पहनाई, वो भाव विभोर होकर रोने लगी तो आप भी उसे देखकर द्रवित हो गये। दूसरे दिन जब उसे सत्संग में आने में विलम्ब हो गया तो स्वयं कीर्तन में से उठकर उसे देखने गये। प्रतिदिन अपना प्रसाद उसके लिये भिजवाते रहे। 


दो दिन बाद वो फ़िर रात में आपके दर्शन के लिये नहीँ आ सकी। क्योंकि दिन प्रतिदिन उसकी हालत बिगड़ती ही जा रही थी। तो जब आप रात में विश्राम करने चले गये, अपने बिस्तर पर सोने के लिये लेट गये थे कि अचानक उठकर बाहर आ गये और बड़ी शीघ्रता से उसे देखने उसके कमरे में गये और उससे कहा अरे तू आज मेरे पास नहीँ आयी। मैं सो गया था कि मुझे तेरी आवाज़ आयी वैसे ही मैं तुझे देखने के लिये भागा। 


29 सितम्बर 2013 को ही स्नेह दीदी श्री महाराज जी के सम्मुख गोलोकवासी हुईं।


बताओ ऐसा कौन होगा भक्तवत्सल, हमारा रखवार जो क्षण-क्षण अपने शरणागत बच्चों की सदा चिन्ता करता हो, उनकी रक्षा करता हो, अन्तिम समय हरि गुरु स्मरण करते हुये शरीर त्याग करे इसके लिये श्री महाराज जी ने कितना प्रयत्न किया। उसके कमरे में जगह जगह लिखवा दिया। मन को सदा श्रीकृष्ण एवं उनके नाम, रूप, गुण, लीला, धाम तथा उनके स्वजन में ही रखना है।

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ऐसाे है रखवार हमारो।

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प्यारे प्यारे श्री महाराज जी की जय ।

मेरे नैनन तारे जाग रे।

 





मेरे नैनन तारे जाग रे।
भई भोर चहुँ ओर शोर सुन, बोलत शुक पिक काग रे।

शीतल-मंद-सुगंध पवन बह, चकई पाइ सुहाग रे।

आई भानु-किरन लखु मोहन, चंद्र-किरन गई भाग रे।

उदित-भानु लखि विकसित कमलनि, भ्रमरन पियत पराग रे।

दोउ कर परसि ‘कृपालु’ मातु मुख, चूमति अति अनुराग रे।।



भावार्थ:- सोते हुए श्यामसुन्दर को जगाती हुई मैया कहती है कि हे मेरे आँखों के तारे श्यामसुन्दर! जागो। देखो तो सवेरा हो गया। चारों ओर तोते, कोयल एवं कौवे शोर कर रहे हैं।  शीतल, मंद, सुगन्धित वायु बह रही है। रात भर की बिछुड़ी हुई चकई, चकवे से मिल रही है। सूर्य की किरणें फैल रही हैं। चन्द्रमा की किरणें समाप्त हो रही हैं। सूर्योदय होने से खिले हुए कमलों पर गुंजार करते हुए भौंरे पराग रस पी रहे हैं।
          ‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में मैया इस प्रकार कहती हुई प्रेम विभोर हो कर अपने दोनों हाथों से श्यामसुन्दर का मुख स्पर्श कर चूमकर बार-बार बलिहार जा रही है।



🌷प्रेमरस मदिरा श्रीकृष्णबाललीला-माधुरी🌷



जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज🌷🌷

नहि बिसरत सखि, छैल बिहारी।

 




नहि बिसरत सखि, छैल बिहारी।

जित देखूँ तित वोही वोही दीखत,
      हाय!ये कैसी मोहिनि डारी।

मोर मुकुट सिर पेच रतन को,
    हलकैं मुख अलकें घुँघरारी।

चंचल नैन मैन मद गंजन,
     तामें अंजन रेखु सँवारी।

कुंडल लोल हलनि श्रवनन में,
   अधर धरि मुरली धुनि प्यारी।

नाक बुलाक भृकुटि वर बॉकी,
   गोल कपोलनि की छवि प्यारी।

उर विशाल वनमाल विराजत,
     गुंजमाल मोतिन माला री।

मणिमय वलय युगल कर सोहे,
   कटि किंकिनि पीताम्बर धारी।

गरल सुधा मदमइ दृग चितवनि,
   करत फिरत जादू टोना री।

बजत चरन छूम छ्ननन नूपुर,
    ताहू पर मुसकावति भारी।

अब 'कृपालु' मम लगत न पलकें,
    देखि अनूपम रूप बिहारी।


  🌷ब्रज रस माधुरी-१🌷


जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज🌷🌷