श्री_महाराज_जी_द्वारा_उत्तर:
मधुसूदन सरस्वती ने वृन्दावन में गोवर्धन की परिक्रमा किया और भगवान नहीं मिले। फिर किया, फिर किया, फिर किया और बहुत दिन करते रहे परिक्रमा, तब भगवान् के दर्शन हुए, तो मधुसूदन ने पीठ कर लिया भगवान् की तरफ। वो रूठ गये, कहने लगे- तुम इतने देर में क्यों आए? तो भगवान् ने दिखाया, उनके पापों का पहाड़ कि तुम्हारे इतने पाप थे कि ये सब जल जायँ, भस्म हो जायँ, तब तो मैं आऊँ। तो अनन्त जन्मों के पाप हमारे हैं, इतना गंदा अंत:करण है कि अगर कपड़ा थोड़ा मैला है तो एक बार साबुन लगाओ, साफ हो गया और अगर धोया ही नहीं है कभी तो गंदा ही रहेगा। चौबीस घण्टे ये भी फीलिंग नहीं है अभी कि भगवान् हमारे अंत: करण में बैठा है, छोटी सी बात। और भगवान् हमारे अंत:करण में नित्य रहता है, ये सुना है, पढ़ा है? 'हाँ'। और 'भगवान् सर्वव्यापक है? हाँ। ' पर मानते हो? ' एक घण्टा भी नहीं मानते, २४ घण्टे में। तो साधना क्या कर रहे हो जो बड़ा भारी फल मिल जाए, तुमको। साधना गलत कर रहे हो, लापरवाही कर रहे हो, अपनी गोपनीयता रख रहे हो। हम जो सोच रहे हैं, कोई नहीं जानता। वह बैठा-बैठा नोट कर रहा है, कहते हो कोई नहीं जानता।
अगर सही साधना लगातार करता रहे, तो एक दिन लक्ष्य प्राप्त हो जाएगा, असम्भव नहीं है। बड़े-बड़े पापात्मा महापुरुष बने हैं, इतिहास साक्षी है। लेकिन थोड़ी साधना करो, बहुत बड़ा फल चाहो ऐसा नहीं हो सकता है। अपने आपको धिक्कारो अपनी कमी मानो। हम लेक्चर सुन लेते हैं, कीर्तन-आरती कर लेते हैं, ये कोई साधना है।
उनके लिए आँसू बहाओ और हर समय, हर जगह महसूस करो कि वो हमारे साथ हैं- ये साधना है, असली। अहंकार से युक्त हो करके मनुष्य कीर्तन में बैठा, तो आराम से मुँह से बोल रहा है, न रूपध्यान कर रहा है, न आँसू बहा रहा है। ये सब लापरवाही है। उसको पता नहीं है कि कल का दिन मिले या न मिले, रात को ही हार्टफेल हो जाए, क्या पता? यही लापरवाही हमने हर मानव देह में किया। अनन्त बार हमें मनुष्य का शरीर मिला। बहुत दुर्लभ है, फिर भी मिला। और हर मानव देह में हमने क्या किया? माँ-बाप में, सब में, पड़ोसी में, लग गए चौबीस घण्टे। एम.ए. करो, डी लिट् करो, पी.एच.डी भी किया, ये किया, वो किया। अब क्या करें? अब सर्विस करो, सर्विस ढूढा, जगह-जगह परेशान हुए, नहीं मिली, फिर मिल गई सर्विस। अब क्या करें? अब ब्याह कर लो। उसके बाद २-४-६ बच्चे हो गए, अब फिर उनका पालन-पोषण करो और उनके दुःख में दुखी हो। बुढ़ापा आ गया, नाती-पोते हो गए, अब उन्ही का चिंतन, मनन। एक्टिंग में चले गए मन्दिर या अपने घर में ही दो मिनट बैठ गए। ये क्या है? ये तो जान-बूझकर जैसे मनुष्य शरीर को समाप्त करना चाहते हैं और कहते हैं, अपने बेटे से- देखो बेटा! मै तो 70 साल का हो गया, मेरी तो बीत गयी। तुम अपनी सोचो। मेरी तो बीत गयी। क्या बीत गयी? जब आप मरोगे तो क्या रिकॉर्ड होगा? कहां जाओगे? अरे जो होगा देखा जाएगा। देखा नहीं जाएगा, भोगा जाएगा। बड़ा कमाल दिखाया तुमने, दस-बीस कोठी बना ली, दस- बीस करोड़ कमा लिए, दस-बीस बच्चे पैदा कर लिए। अरे, ये सब क्या है? वो तो कुत्ते-बिल्ली भी करते हैं, इसमें आपने कौन-सा कमाल किया है। सब पशु-पक्षी पेट भरते हैं, अपना।
जिस काम को करने के लिए प्रतिज्ञा की थी माँ के पेट में, भगवान् से कि महाराज! हमें निकालो इस नरक से, हम आपका ही भजन करेंगे, वह भूल गये। और सबकी देखा-देखी, वह उधर भाग रहा है, तुम भी भागो। सब लोग भाग रहे हैं, मैटीरियल साइड में कि यहीं आनंद है, एक लाख में, एक करोड़ में, एक अरब में। बस भागे जा रहे हैं। किसी से भी पूछ लेते कि अरबपति किस हाल में है? क्यों भई! आपका क्या हाल है? तो अगर वह बोलेगा ईमानदारी से तो कहेगा कि दिन-रात टेंशन है और नींद की गोली खाकर सोते हैं। उसी सीट पर जाना चाहते हो? अरे! शरीर चलाने के लिए भी कर्म करना है, ये सही है, लेकिन ये लिमिट मे करो, रोटी-दाल मिल जाय, बस। परवाह होनी चाहिए। देखो बच्चों को, छह -आठ महीने तो मटरगश्ती करते हैं पढ़ाई में और जब परीक्षा का एक महीना रह गया तो सारी रात जागते हैं, पढ़ते हैं। यदि ऐसी पढ़ाई शुरू से ही किए होते तो top करते। हम लोगों को कोई जब संसारी मुसीबत आ गई, बेटा सीरियस है, ये है, वो है- भगवान्! हम मान गए आप हो। अच्छा, अब कृपा करके इसको ठीक कर दो। ऐसे ही भगवान कहते हैं बेवकूफ बनाने के लिए हम ही मिले हैं, तुमको। हमेशा तो तुम लापरवाह रहे।
सोचो, बार-बार सोचने से साधना होगी। बार-बार फील करना- अरे! इतनी उम्र बीत गई, अब अगर जिन्दा भी रहे तो बुढ़ापे में क्या करोगे? जल्दी करो। सबको पता है कि हम माया के अण्डर में हैं, काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष सब भरा हुआ है, सबके अंदर। लेकिन इन्ही दोषों में से एक दोष किसी का कोई कहने दे- आप जरा क्रोधी हैं, आप जरा लोभी हैं, आप जरा स्वार्थी हैं, आप जरा मक्कार हैं। सही बात तो कह रहा है। फील क्यों करते हैं? तुमको तो पता है। हाँ, यह बात ठीक कह रहा है। कोई व्यापारी है, उसे कहते हैं ये व्यपारी हैं, सेठजी हैं वह बुरा तो नहीं मानता कि हमको कलेक्टर कहो। तुम जो कुछ हो, उसी में से तो कोई कुछ कहेगा। अरे वो बड़ा स्वार्थी है। अरे! भला बताओ स्वार्थी तो महापुरुष, भगवान्, संसार भर है। कौन स्वार्थी नहीं है? असली हो या नकली, स्वार्थ सब स्वार्थ है।
जगद्गुरूत्तम_श्री_कृपालु_जी_महाराज