मेरे नैनन तारे जाग रे।
Spiritual Blog, Jagadguru Kripalu Ji Maharaj
भोजन को भी भजन के लिये सोचकर कीजिये। हर चीज़ भगवान् के उद्देश्य से कीजिये। बार-बार भगवान् को बीच में लाइये। तो वो रोम रोम में भर जायगा। इस प्रकार आप लोग नियम का पालन करें। मुख्य बात स्वार्थ है। सारा संसार और सारा परमार्थ स्वार्थ पर निर्भर करता है। हमारा स्वार्थ है- आप लोग भगवान् की ओर चलें और हमें खुशी हो हमारे बच्चे देखो, इनमें कितना अनुशासन है और कितना भगवान् के लिये रूपध्यान करके, आँसू बहा रहे हैं,और हमारा खून बढ़ जाय। और आपका तो लाभ होगा ही प्रत्यक्ष। उस बात पर तो खास तौर से आपको ध्यान देना है। अपने मतलब के लिये आप लोग आये हैं, कोई 'कृपालु' पर कृपा करने तो आये नहीं हैं? अपना मतलब तो हल कीजिये। हमारा मतलब तभी हल होगा, जब आपका अपना मतलब हल हो। आप साधना में आगे बढ़े, तो फिर हमको उतनी खुशी होगी। हमको सुख देना चाहते हैं आप,आपका लक्ष्य यही होना चाहिये- 'हरि गुरु की सेवा।' उनको सुख देना। तो उसके लिये आपको उनकी इच्छानुसार चलना चाहिये। उनको कैसे सुख मिलेगा ? अगर हम नियम का पालन करें, तो उनको सुख मिलेगा, तो उनकी कृपा मिलेगी, जो मेन (main) चीज़ है,जिससे हमारा लक्ष्य हल होगा। ये सब सोच करके दुश्मन मन को शासन में रखो। उसकी मत सुनो।
हरि बिनु बिगरी नाहिं बने |
कर्म ज्ञान अरु भक्ति - साधना, वेदन यदपि भने |
तदपि न छुटत मोह माया मन, किये यतन अपने |
सुत वित पति तिय महँ नित देखत, साँचे सुख सपने |
बुधि समुझाय थकी बहु विधि मन, पै मन नाहिं मने |
कह ‘कृपालु’ हरि अनुकंपा बिनु, मन हरि रस न सने ||
भावार्थ -श्यामसुन्दर की प्राप्ति के बिना अनादि काल का दु:ख नहीं समाप्त हो सकता | यद्यपि वेदों ने कर्म, ज्ञान एवं भक्ति की साधना का निरूपण किया है, तथापि अपने प्रयत्न करने मात्र से माया का अत्यन्ताभाव नहीं हो सकता ! धन, पुत्र, स्त्री, पति में सच्चा सुख मानने का अभ्यास पड़ गया है | बुद्धि ने मन को अनेक प्रकार से समझाया किन्तु फिर भी मन नहीं मानता |
‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं –हे श्यामसुन्दर ! तुम्हारी कृपा के बिना मन तुम्हारे चरण-कमलों का रसिक नहीं बन सकता है |
एक सिन्धु वैदग्ध्य सिन्धु है, कला विलास प्रकार।
एक सिन्धु अनुराग सिन्धु है, मादन भाव निहार।
एक सिन्धु वात्सल्य सिन्धु है, दीनन हित सरकार।
एक सिन्धु है कृपा सिन्धु जो, सुनत प्रपन्न पुकार।
एक सिन्धु लावण्य सिन्धु है, पिये सतत रिझवार।
एक सिन्धु है केलि सिन्धु जो, रिझवत नन्दकुमार।
एक सिन्धु है रूप सिन्धु जो, रसिकन प्राणाधार।
सप्त सिन्धु की ज्यों 'कृपालु' भू, त्यों वृषभानु दुलार।
भावार्थ : श्री राधा का दिव्य वपु मानों सप्त सिन्धु का सार ही है। अनेक प्रकार की विलास कलाओं का वैदग्ध्य सिन्धु प्रथम है। दूसरा मादनाख्य महाभाव का अनुराग सिन्धु है जिससे प्रेमी नंदनन्दन सदैव ही प्रिया राधा के वशीभूत रहते हैं। दीन जनों के हित श्री राधा उर में विलोडित सिन्धु तीसरा सिन्धु है। शरणागत जीवों का क्रन्दन श्रवण करने हेतु श्री राधा के हृदय में कृपा सिन्धु भी सदैव हिलोरें लेता रहता है। पांचवां लावण्य सिन्धु है जो रसिक शेखर श्री कृष्ण की रूप-रस-पान की तृष्णा को सदा अक्षुण्ण रखता है अर्थात् रूप रस पान करते हुए भी वे अतृप्त बने रहते हैं। श्री राधा में स्थित केलि सिन्धु उनके प्रियतम को सदा रस विवश किये रहता है। श्री राधा का रूप सिन्धु तो रसिकों के प्राणों का आधार ही है। इस प्रकार से भानुनन्दिनी सातों समुद्रों से युक्त पृथ्वी के समान ही हैं।
अकारण करुणा वरुणालय
कृपाकन्द कृपालु सरकार की जय 🙌