हरि बिनु बिगरी नाहिं बने |
कर्म ज्ञान अरु भक्ति - साधना, वेदन यदपि भने |
तदपि न छुटत मोह माया मन, किये यतन अपने |
सुत वित पति तिय महँ नित देखत, साँचे सुख सपने |
बुधि समुझाय थकी बहु विधि मन, पै मन नाहिं मने |
कह ‘कृपालु’ हरि अनुकंपा बिनु, मन हरि रस न सने ||
भावार्थ -श्यामसुन्दर की प्राप्ति के बिना अनादि काल का दु:ख नहीं समाप्त हो सकता | यद्यपि वेदों ने कर्म, ज्ञान एवं भक्ति की साधना का निरूपण किया है, तथापि अपने प्रयत्न करने मात्र से माया का अत्यन्ताभाव नहीं हो सकता ! धन, पुत्र, स्त्री, पति में सच्चा सुख मानने का अभ्यास पड़ गया है | बुद्धि ने मन को अनेक प्रकार से समझाया किन्तु फिर भी मन नहीं मानता |
‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं –हे श्यामसुन्दर ! तुम्हारी कृपा के बिना मन तुम्हारे चरण-कमलों का रसिक नहीं बन सकता है |
एक सिन्धु वैदग्ध्य सिन्धु है, कला विलास प्रकार।
एक सिन्धु अनुराग सिन्धु है, मादन भाव निहार।
एक सिन्धु वात्सल्य सिन्धु है, दीनन हित सरकार।
एक सिन्धु है कृपा सिन्धु जो, सुनत प्रपन्न पुकार।
एक सिन्धु लावण्य सिन्धु है, पिये सतत रिझवार।
एक सिन्धु है केलि सिन्धु जो, रिझवत नन्दकुमार।
एक सिन्धु है रूप सिन्धु जो, रसिकन प्राणाधार।
सप्त सिन्धु की ज्यों 'कृपालु' भू, त्यों वृषभानु दुलार।
भावार्थ : श्री राधा का दिव्य वपु मानों सप्त सिन्धु का सार ही है। अनेक प्रकार की विलास कलाओं का वैदग्ध्य सिन्धु प्रथम है। दूसरा मादनाख्य महाभाव का अनुराग सिन्धु है जिससे प्रेमी नंदनन्दन सदैव ही प्रिया राधा के वशीभूत रहते हैं। दीन जनों के हित श्री राधा उर में विलोडित सिन्धु तीसरा सिन्धु है। शरणागत जीवों का क्रन्दन श्रवण करने हेतु श्री राधा के हृदय में कृपा सिन्धु भी सदैव हिलोरें लेता रहता है। पांचवां लावण्य सिन्धु है जो रसिक शेखर श्री कृष्ण की रूप-रस-पान की तृष्णा को सदा अक्षुण्ण रखता है अर्थात् रूप रस पान करते हुए भी वे अतृप्त बने रहते हैं। श्री राधा में स्थित केलि सिन्धु उनके प्रियतम को सदा रस विवश किये रहता है। श्री राधा का रूप सिन्धु तो रसिकों के प्राणों का आधार ही है। इस प्रकार से भानुनन्दिनी सातों समुद्रों से युक्त पृथ्वी के समान ही हैं।
अकारण करुणा वरुणालय
कृपाकन्द कृपालु सरकार की जय 🙌
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