भोजन को भी भजन के लिये सोचकर कीजिये। हर चीज़ भगवान् के उद्देश्य से कीजिये। बार-बार भगवान् को बीच में लाइये। तो वो रोम रोम में भर जायगा। इस प्रकार आप लोग नियम का पालन करें। मुख्य बात स्वार्थ है। सारा संसार और सारा परमार्थ स्वार्थ पर निर्भर करता है। हमारा स्वार्थ है- आप लोग भगवान् की ओर चलें और हमें खुशी हो हमारे बच्चे देखो, इनमें कितना अनुशासन है और कितना भगवान् के लिये रूपध्यान करके, आँसू बहा रहे हैं,और हमारा खून बढ़ जाय। और आपका तो लाभ होगा ही प्रत्यक्ष। उस बात पर तो खास तौर से आपको ध्यान देना है। अपने मतलब के लिये आप लोग आये हैं, कोई 'कृपालु' पर कृपा करने तो आये नहीं हैं? अपना मतलब तो हल कीजिये। हमारा मतलब तभी हल होगा, जब आपका अपना मतलब हल हो। आप साधना में आगे बढ़े, तो फिर हमको उतनी खुशी होगी। हमको सुख देना चाहते हैं आप,आपका लक्ष्य यही होना चाहिये- 'हरि गुरु की सेवा।' उनको सुख देना। तो उसके लिये आपको उनकी इच्छानुसार चलना चाहिये। उनको कैसे सुख मिलेगा ? अगर हम नियम का पालन करें, तो उनको सुख मिलेगा, तो उनकी कृपा मिलेगी, जो मेन (main) चीज़ है,जिससे हमारा लक्ष्य हल होगा। ये सब सोच करके दुश्मन मन को शासन में रखो। उसकी मत सुनो।

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