उत्तर : ये महत्व नहीं हुआ करता, मन की भावना का सब महत्व होता है। वैसे कहानी किस्से हैं सबके पुराणों में। कुम्भ माने घड़ा। अमृत का घड़ा जहाँ-जहाँ रखा गया, वहाँ कुम्भ मेला होने लगा। लेकिन ये सब तो बातें हैं, असली बात तो है, अपने मन की भावना। गंगा जी हो, जमुना जी हो, सरस्वती जी हो, कोई हो, हमारी भावना यदि उनमें दिव्य है तो हमको दिव्य फल मिलेगा, और यदि भावना मायिक है तो मायिक फल मिलेगा। उसमें न कुम्भ कुछ करेगा, न जन्माष्टमी, न रामनवमी, न वृन्दावन, न चारों धाम ? सब बकवास है। ये तो इसलिए है कि प्राचीनकाल में सब सन्त लोग वहाँ जाया करते थे और गृहस्थी भी जाया करते थे, तो गृहस्थी लोग सन्तों के द्वारा उपदेश लेकर साधना करते थे। अब सन्त लोग तो शायद दो-चार ही जाते हैं, बाकी पाखंडी लोग लाखों जाते हैं, हजारों नहीं।
तो अगर कोई गृहस्थी जाकर वहाँ उपदेश प्राप्त करना चाहे, तो पाखंडियों के चक्कर में पड़ जाएगा, अज्ञानियों के और हानि हो जाएगी। मनुष्य अज्ञ है, इसलिए वह भोला है। वह ग़लत जगह को सही मान लेता है, गलत आदमी को सिद्ध महापुरुष मान लेता है। वो सब पंडाल देखता है।
इस पंडाल में ज्यादा विशेषता है, बड़ी लाइट है, बहुत बड़ा है, यह बहुत बड़ा बाबा होगा। हाँ! हाँ ! ऐसी भावनायें आ जाती हैं और वह श्रद्धा कर लेता है।
जैसे पोलिटिक्स में जितना चालाक, चार सौ बीस आदमी होता है, उतना सफल हो जाता है, ऐसे ही भगवत् विषय में है। जितना आदमी अच्छा प्रोपेगंडा कर लेता है- ये बाबाजी ऐसे हैं, हिमालय से आए हैं, इनकी उम्र २०० वर्ष है, ये ऐसा करते हैं, जिसको जो चाहे दे देते हैं। अनेक प्रकार के गलत प्रचार करके लोगों को अपनी ओर आकृष्ट करते हैं उनके यहाँ ज्यादा भीड़ होती है। लोग धोखे में पड़ जाते हैं। अब कोई तीर्थ-वीर्थ इन मामलों में कोई महत्व नहीं रखता। बस ये है कि भावना अपनी भगवत्संबंधी बनावें, तो वृन्दावन में रहे तो भी ठीक है, और नरक में रहे तो भी ठीक है। इसमें कोई अन्तर नहीं है।
एकोदेवः सर्वभूतेषु गूढ़ः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ।
वेद कह रहा है कि भगवान् ने संसार बनाया और सर्वव्यापक हो गए- 'प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना' समान रूप से व्याप्त हुए। ऐसा नहीं है कि मयखाने में छोटा भगवान् है, मन्दिर में बड़ा भगवान् है। एक से, वही पूर्ण भगवान् सर्वत्र व्याप्त हैं। इसका प्रमाण भी दिया है भगवान् ने कि इतना बड़ा राक्षस हिरण्यकशिपु, जब उसने प्रश्न किया प्रह्लाद से कि क्या इस खम्भे में भी तेरा भगवान् है? उसने कहा- हाँ है। नृसिंह उसी खम्भे से प्रगट हो गए। हाँ-हाँ मैं हूँ, देख।
तो पवित्र अपवित्र से मतलब नहीं है, तीर्थ गैर-तीर्थ से मतलब नहीं है, मतलब है अपनी भावना का। कितने लोग वृन्दावन में रहते हैं, अयोध्या में रहते हैं, काशी में रहते हैं, उज्जैन में रहते हैं, ये समझकर कि वहाँ मरेंगे तो मुक्ति मिल जायगी। सब धोखा है। तीर्थ स्थानों में पाप करने से और बड़ा पाप माना जाता है। अरे! पाप तो सभी जगह पाप है, लेकिन भगवान् के धाम में, सन्त के सामने, मन्दिर में तो अच्छी भावना बननी चाहिए। वहाँ भी जो पाप करे वो बहुत बड़ा पाप है। लेकिन अगर अपराध करता है तो उसको नामापराध बोलते हैं, और उसका प्रायश्चित कोई शास्त्रों में नहीं लिखा, बस महापुरुष ही क्षमा कर सकता है। तो तीर्थों का क्या महत्व होगा, जब भगवान् सर्वव्यापक हैं, चाहे प्रयाग हो, चाहे काशी हो। कबीरदास ने कहा- 'जो कबिरा काशी गरे तो रामहिं कौन निहोर।' हम काशी में नहीं मरेंगे, हम मगहर में जाकर मरेंगे, देखें कैसे नरक मिलता है। क्योंकि भगवान् तो सर्वव्यापक है, यह महापुरुष जानता है इसलिए उसके दिमाग में ये बीमारी नहीं है कि यह स्थान अधिक महत्वपूर्ण है। हाँ हाँ, आज कोई सन्त है, किसी जगह, जब तक वह सन्त है, तब तक उस स्थान का महत्व है क्योंकि उससे लाभ मिल रहा है जीवों को। लेकिन कल उसी जगह राक्षस आकर बस जाये तो क्या महत्व रह जाएगा ? भगवान् सर्वव्यापक सब जगह हैं, अन्दर ही बैठे हैं, बाहर की कौन कहे। लेकिन कोई लाभ नहीं मिल रहा है। तो सारा लाभ भावना से मिलता है, मन की भावना सही हो-
जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी ॥
कुम्भ मेले में हजारों आदमी जाते हैं ऐसे भी। जिनका लक्ष्य- अनाचार, पापाचार, भ्रष्टाचार, दुराचार, जेब काटना, यही धन्धा है, वह भी जाते हैं कुम्भ में। उनका व्यापार अच्छा चलता है। अरे यार! आज बात बन गई। क्या हुआ ? दस जेब काटा आज। उनके लिए कुम्भ जो है, पाप का घर है।
रहस्य जानना जरूरी है। गंगाजी कौन हैं, यह पहले जानो, फिर मानो, फिर उसके पास जाओ, तब असली लाभ मिलेगा। वर्ना जाओगे किसी महात्मा के पास क्या देखोगे ? सिर, पैर, हाथ, कान, नाक। इनसे क्या मिलेगा ? ये तो सबके एक से होते ही हैं। अरे । थोड़ा-थोड़ा परिवर्तन होता है, उसका मुँह ऐसा है, उसकी नाक ऐसी है, और क्या खास बात होगी। वह चाहे शंकराचार्य हों, चाहे वल्लभाचार्य हों, चाहे निम्बार्काचार्य हों, कोई जगद्गुरु हों, चाहे गधा गुरु हो, शरीर तो सबका वैसे ही है। जो कुछ उसका माल-मसाला है, वो तो भीतर है; उसको समझो, और उसको पाने के लिए जो साधन है, उसको करो।
#निखिलदर्शनसमन्वयाचार्य_जगद्गुरुत्तम_श्री_कृपालु_जी_महाराज
( पुस्तक- प्रश्नोतरी भाग -१ , पेज ११४ से ११८)