(जगद्गुरु आदेश)


          उधार करना बंद करो

    संसार में दो चीजें बहुत दुर्लभ हैं:

1. मानव देह -यह इतनी दुर्लभ है कि इंद्र, वरुण, कुबेर आदि स्वर्ग के देवता भी मनुष्य शरीर पाने के लिए तरसते हैं, जिनकी हम लोग भक्ति करते हैं। जबकि देवताओं के पास बहुत ज्ञान होता है और उनका शरीर भी दिव्य होता है उनके शरीर से खुशबू आती है। फिर वो मनुष्य शरीर क्यों चाहते हैं, जो इतना गंदा है?

    इसलिए कि देवताओं को कर्म करने का अधिकार नहीं है। वो भोग-योनि हैं। जितने दिन के लिए स्वर्ग मिला है, केवल उतने ही दिन वे स्वर्ग का सुख भोग सकते हैं। वो कर्म करके अपनी बिगड़ी नहीं बना सकते। केवल मानव देह में ही कर्म करने का अधिकार है। इसी शरीर में भगवत्प्राप्ति हो सकती है।

    इसलिए मानव देह सबसे दुर्लभ है, जिसके लिए वेद कहता है -

    ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ करोड़ों कल्पों तक अन्य योनियों में भटकने के बाद भगवान् कभी एक बार मानव देह देते हैं।

     लेकिन केवल मानव देह मिल जाने से काम नहीं बनेगा, क्योंकि हमारे ऊपर तो माया हावी है और हमारे अंदर अज्ञान भरा हुआ है।

2. वास्तविक गुरु का मिलन -

    हमें वास्तविक गुरु मिल जाएँ - बड़ी भगवत्कृपा और पुण्य से सही गुरु मिलते हैं। और वे हमें शास्त्रों-वेदों के ज्ञान को संक्षेप में समझा दें - यह बता दें कि क्या करने से हमारा काम बन जाएगा।

    भगवान् को पाना सबसे सरल है, क्योंकि वे अंदर ही बैठे हैं। केवल रियलाइज़ करना है।

    लेकिन उपरोक्त दोनों दुर्लभ चीजें मिलने के बाद भी अगर कोई बिना भगवत्प्राप्ति किए मर जाए, तो इसके दो कारण होते हैं। हम भगवत्प्राप्ति में दो बड़ी गड़बड़ियाँ करते हैं -

1. हम लोग सबमें भगवान् को नहीं मानते और अपने अंदर भी भगवान् को नहीं मानते।

    वेद कहता है कि भगवान् सबके हृदय में रहते हैं। जीव और भगवान् - दोनों हृदय में एक ही स्थान पर रहते हैं। भगवान् हमारे अंदर बैठकर हमारे विचार नोट करते हैं, कर्म नहीं। फिर उन कर्मों का अगले जन्म में फल देते हैं।

    यह सब हम जानते हैं, लेकिन मानते नहीं,क्योंकि भूल जाते हैं। इसी कारण हम किसी गरीब को अपमानित करके और अधिक दुःखी कर देते हैं, जो पहले से ही दुःखी है। हमने यह नहीं सोचा कि उसके भीतर भी हमारे श्यामसुंदर बैठे हैं और सब कुछ नोट कर रहे हैं। परपीड़ा सम नहिं अधमाई - दूसरे को दुःख देने के समान कोई पाप नहीं हुआ करता। लेकिन हम इसे भूल जाते हैं।

2. तन, मन और धन से भगवान् की भक्ति करने में उधार कर देते हैं।

    बचपन से लेकर बुढ़ापे तक, हर अवस्था में हम किसी न किसी बहाने से भक्ति करने में उधार करते जाते हैं।

     प्रह्लाद ने कहा - कौमार आचरेत् प्राज्ञो...

    अरे मनुष्यों ! बाल्यावस्था में ही उपासना शुरू कर दो। क्या पता तुम्हारी जवानी आए ही न। तुम देख ही रहे हो - लाखों बच्चे मर गए, मर रहे हैं। कोई एक साल में, कोई पैदा होते ही, कोई चार साल में, कोई दस साल में। इसलिए उधार मत करो।

      को हि जानाति कस्याद्य मृत्युः कालो भविष्यति। कौन जानता है कि हमें कल का दिन मिले न मिले?

     पाप करने में - काम, क्रोध, लोभ, मोह को लाने में - हम उधार नहीं करते। यह सोचकर उनका उधार नहीं करते कि "ये पाप कल कर लेंगे।"

     रावण ने मरते समय लक्ष्मण से कहा दो बातों को याद रखना -

    अच्छा काम तुरंत करना - उधार न करना, और गलत काम को उधार कर देना यह कहकर कि कल कर लेंगे।

     इससे यह लाभ होगा कि मनुष्य की प्रवृत्ति बदलती रहती है - हो सकता है कल वह बुरा विचार आए ही नहीं और हम पाप करने से बच जाएँ।

    भगवान् की भक्ति में उधार मत करो। जब पेट के लिए छह से आठ घंटे लगाते हो, तो आत्मा के लिए कम से कम दो-चार घंटे तो दो! कुछ काम न हो, तो अण्ड-बण्ड सोचते रहते हो उससे अच्छा भगवान् का ही चिंतन कर लो, जिससे मन शुद्ध हो जाएगा। लापरवाही मत करो।

    मानव देह क्षणभंगुर है। अगला क्षण मिले न मिले। मरने के बाद यह मानव देह फिर नहीं मिलने वाली। एक कुत्ता दिन भर घूमता है, फिर भी बिना पेट भरे ही सो जाता है। जंगली जानवर दिन भर पानी ढूँढते फिरते हैं, फिर भी पानी नहीं मिलता और वे मर जाते हैं। ये सब हम लोग भोग चुके।

     यदि पाप करते-करते यह देह छूट गई, तो चौरासी लाख की इन निकृष्ट योनियों में भटकना पड़ेगा -इसको कोई नहीं रोक सकता।

    इसलिए भगवान् की कृपा को रियलाइज़ करके, सबमें भगवान् को मानो और भक्ति में उधार मत करो।


    जगदगुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज

No comments:

Post a Comment