यह अत्यंत दिव्य, ज्ञानवर्धक और दार्शनिक रूप से महत्वपूर्ण प्रसंग है। अद्वैत वेदांत के महान प्रवर्तक आदि शंकराचार्य और स्वयं जगतजननी मां दुर्गा (जो एक विलाप करती हुई स्त्री के रूप में प्रकट हुईं) के बीच का यह संवाद भक्ति और शक्ति के महत्व को पूरी तरह स्पष्ट करता है।
जब काशी के मणिकर्णिका घाट पर आदि शंकराचार्य का 'अद्वैत' दर्शन पूर्ण हुआ
सनातन धर्म के पुनरुद्धारकर्ता, जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने पूरे भारतवर्ष की यात्रा कर वेदों और अद्वैत वेदांत की पुनर्स्थापना की। शंकराचार्य के दर्शन का मूल आधार था: "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" अर्थात केवल ब्रह्म ही एकमात्र सत्य सत्ता है, यह संसार मिथ्या (नश्वर या अस्तित्वहीन) है, और जीवात्मा स्वयं ब्रह्म ही है।
परंतु, जब वे अपने शिष्यों के साथ काशी (वाराणसी) में निवास कर रहे थे, तब उनके जीवन में एक ऐसी अलौकिक घटना घटी, जिसने उनके इस दृष्टिकोण को एक पूर्णता प्रदान की। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि बिना 'शक्ति' के 'ब्रह्म' भी निष्क्रिय है।
मणिकर्णिका घाट का वह मार्ग और रोती हुई स्त्री
एक दिन आदि शंकराचार्य अपने शिष्यों के साथ स्नान के लिए सुप्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट की ओर जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक अत्यंत दीन-हीन स्त्री अपने मृत पति के शव को अपनी गोद में लेकर मार्ग के बीचोबीच बैठी विलाप कर रही थी। वह बार-बार चीख रही थी, "मेरे पति इतने अच्छे थे, हे भगवान! तुमने इन्हें मुझसे क्यों छीन लिया?"
चूँकि मार्ग संकरा था और शव के कारण रास्ता पूरी तरह अवरुद्ध हो गया था, शंकराचार्य वहाँ रुक गए। उन्होंने अत्यंत शांत स्वर में कहा, "माते! कृपया मार्ग दे दीजिए, हमें आगे जाना है।"
वह स्त्री अपने विलाप में इतनी खोई थी कि उसने शंकराचार्य की बात पर ध्यान नहीं दिया और उसका रोना और तेज हो गया। शंकराचार्य ने थोड़ा ऊंचे स्वर में कहा, "माता, हमें स्नान के लिए जाना है। कृपया थोड़ा हटकर हमें मार्ग दीजिए।"
जब वह स्त्री फिर भी नहीं हटी, तो शंकराचार्य को थोड़ा सा संकोच और झुंझलाहट हुई। उन्होंने कहा, "माते! इस तरह रोने से क्या लाभ? तुम्हारे पति जा चुके हैं। जो चला गया, वह कभी लौटकर नहीं आता।"
स्त्री का प्रतिप्रश्न: जिसने अद्वैत दर्शन को हिला दिया
तभी अचानक उस रोती हुई स्त्री ने शंकराचार्य की ओर देखा और एक ऐसा अप्रत्याशित प्रश्न किया जिसने इतिहास बदल दिया।
उसने कहा, "हे आचार्य! आप मुझसे क्यों कह रहे हैं? आप मेरे पति से कहिए ना! उनसे कहिए कि वे उठ जाएं और आपके लिए रास्ता छोड़ दें!"
शंकारचार्य अचंभित रह गए। उन्होंने कहा, "माता! क्या पति के वियोग में तुम्हारी मति मारी गई है? यह एक मृत शरीर (शव) है। इसके भीतर कोई प्राण-ऊर्जा (शक्ति) नहीं बची है। यह स्वयं कैसे उठ सकता है?"
उस स्त्री के चेहरे पर अचानक एक अलौकिक तेज चमक उठा। उसने तीखे स्वर में कहा:
"आचार्य! आपके अपने सिद्धांत और वेदों की व्याख्या के अनुसार तो केवल ब्रह्म ही एकमात्र सत्ता है। आपके अनुसार ब्रह्म को सृष्टि की रचना के लिए किसी 'शक्ति' (ऊर्जा) की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यदि शक्ति अस्तित्व में है, तो संसार में दो सत्ताएँ हो जाएंगी (ब्रह्म और शक्ति), जिससे आपका 'अद्वैत' टूट जाएगा। तो मुझे बताइए आचार्य, यदि आपका ब्रह्म बिना किसी शक्ति के इस संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना कर सकता है, तो यह मृत शरीर बिना शक्ति के उठ क्यों नहीं सकता? जरा इसे उठाकर दिखाइए!"
वेदव्यास भी जिन्हें पराजित न कर सके, उन्हें किसने निस्तब्ध किया?
शंकराचार्य स्तब्ध रह गए! उनके पास इस तर्क का कोई उत्तर नहीं था। वे सोचने लगे कि यह साधारण स्त्री कौन है, जिसने मेरे अद्वैत दर्शन की सबसे मजबूत दीवार में एक क्षण में छेद कर दिया?
उन्हें वह समय याद आया जब वे शास्त्रों के रचयिता महर्षि वेदव्यास से शास्त्रार्थ करने हिमालय की कंदराओं (उत्तर बद्री) में गए थे। १८ पुराणों के लेखक व्यास जी के साथ उनका शास्त्रार्थ लगातार १४ दिनों तक चला था। ७ दिन के शास्त्रार्थ में जब व्यास जी शंकराचार्य को पराजित नहीं कर पाए, तो अगले ७ दिन और चर्चा हुई। अंत में व्यास जी ने प्रसन्न होकर शंकराचार्य को आशीर्वाद दिया था कि तुम सफल होगे, जाओ और वेदों का प्रचार करो।
शंकराचार्य ने सोचा—"जिन्हें स्वयं साक्षात व्यास जी शास्त्रार्थ में नहीं हरा सके, उन्हें इस मणिकर्णिका घाट पर एक साधारण स्त्री ने निरुत्तर कर दिया!" उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं और ध्यान लगाया।
जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो वहाँ का पूरा दृश्य बदल चुका था। न तो वह मृत शरीर था और न ही वह विलाप करती स्त्री। उनके स्थान पर स्वयं महिषासुरमर्दिनी मां दुर्गा सिंह पर सवार अपनी दस भुजाओं के साथ साक्षात प्रकट थीं। शंकराचार्य ने तुरंत भूमि पर दंडवत प्रणाम किया।
'आनंद लहरी' का प्रकटीकरण
उसी क्षण आदि शंकराचार्य के मुख से शुद्ध और अलौकिक संस्कृत में मां भवानी की स्तुति फूट पड़ी। माँ दुर्गा की प्रशंसा में शंकराचार्य द्वारा रचित दो स्तोत्र पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं—एक सौंदर्य लहरी और दूसरी आनंद लहरी। [1, 2]
'आनंद लहरी' की रचना इसी पावन घटना के बाद काशी में हुई थी। इस स्तुति में शंकराचार्य ने स्वीकार किया कि ईश्वर (शिव/ब्रह्म) सृष्टि की रचना, पालन और संहार करते तो हैं, लेकिन वे यह सब अपनी 'योगमाया शक्ति' के माध्यम से ही करते हैं। यदि शिव के साथ शक्ति न हो, तो शिव भी 'शव' के समान निश्चल हो जाते हैं। [1, 2]
इस अलौकिक घटना से हमारे जीवन के २ बड़े सूत्र (Learnings)
यह प्रसंग केवल एक ऐतिहासिक कथा नहीं है, बल्कि यह हमारे व्यावहारिक और आध्यात्मिक जीवन के लिए दो अत्यंत महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सूत्र देता है:
१. भगवान और उनकी शक्ति का एकात्म स्वरूप
अक्सर लोग पूछते हैं कि राम के साथ सीता, कृष्ण के साथ राधा, और नारायण के साथ लक्ष्मी क्यों पूजी जाती हैं? वे कोई साधारण लौकिक स्त्रियाँ नहीं हैं। वे भगवान की ही साकार स्वरूप-शक्ति (योगमाया) हैं।
जैसे अग्नि को उसकी गर्मी (ऊष्मा) और प्रकाश से अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही भगवान को उनकी शक्ति से अलग नहीं किया जा सकता। शिव और पार्वती एक हैं, कृष्ण और राधा एक हैं। शक्तिमान और शक्ति का यह अद्वैत ही पूर्ण सत्य है।
जैसे अग्नि को उसकी गर्मी (ऊष्मा) और प्रकाश से अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही भगवान को उनकी शक्ति से अलग नहीं किया जा सकता। शिव और पार्वती एक हैं, कृष्ण और राधा एक हैं। शक्तिमान और शक्ति का यह अद्वैत ही पूर्ण सत्य है।
२. संसार 'मिथ्या' (अस्तित्वहीन) नहीं, बल्कि 'अस्थायी' है
जिस भौतिक ऊर्जा (प्रकृति) से यह संसार बना है, वह योगमाया द्वारा ही संचालित है। यह संसार पूरी तरह से काल्पनिक या 'नॉन-एग्ज़िस्टेंट' नहीं है। हाँ, यह अस्थायी (Temporary) जरूर है, क्योंकि यहाँ सब कुछ परिवर्तनशील है, लेकिन जब तक हम यहाँ हैं, इसका अस्तित्व सत्य है।
इसीलिए, आपको अपने इस भौतिक शरीर का पूरा ध्यान रखना होगा। इसे सही मात्रा में प्रोटीन, विटामिन, खनिज और कार्बोहाइड्रेट देने होंगे। यदि शरीर अस्वस्थ रहेगा, तो आप ईश्वर की ओर बढ़ने की यात्रा भी शुरू नहीं कर पाएंगे। स्वयं भगवान कृष्ण ने गीता में अर्जुन से कहा है:
"नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः..." (गीता ६.१६)
अर्थात—हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत अधिक खाने वाले का सिद्ध होता है और न बिल्कुल न खाने वाले का।
निष्कर्ष: यह शरीर धर्म और साधना को करने का एकमात्र माध्यम (वाहन) है। जो आध्यात्मिक लोग यह कहते हैं कि भौतिक विज्ञान या शरीर की देखभाल बेकार है, वे गलत हैं। मन की शुद्धि के लिए जितनी आध्यात्मिक उन्नति आवश्यक है, इस शरीर को स्वस्थ रखने के लिए भौतिक विज्ञान भी उतना ही जरूरी है। जीवन के अंतिम लक्ष्य को पाने के लिए इन दोनों के बीच संतुलन और सामंजस्य (Harmonization) बिठाना ही सच्ची समझदारी है।
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