विरह का भाव

ये श्रेष्ठ भाव बताया गया है। मिलन से भी श्रेष्ठ विरह भाव रसिक लोग कहते हैं कि मिलन भाव में प्रियतम एक ही स्थान पर दिखाई पड़ते हैं, लेकिन जब विरह का भाव हो तो प्रियतम हर जगह दिखाई पड़ते हैं। इसलिए श्रेष्ठ भाव और प्रेम का बढ़ना भी वो विरह में अधिक होता है, मिलन से भी अधिक। क्योंकि मिलन में एक चीज ये भी होती है कि जब प्रियतम सामने है तो उनमें दोष भी दिखाई दे जाएंगे। वे हमारे अनुरूप नहीं हैं, हमारे अनुकूल नहीं हैं। यह दोष की प्रवृत्ति भी आ सकती है, दोष बुद्धि भी आ सकती है। लेकिन विरह में दोष बुद्धि नहीं आती, वहां केवल प्रेम बढ़ता ही जाता है। इसलिए रसिकों ने विरह को श्रेष्ठ बताया मिलन से भी।

तो ये भी जो पद हम लोग अभी गाएंगे, यह विरह माधुरी का पद है। और आप लोगों ने यदि ध्यान दिया हो तो श्री महाराज जी ने प्रेम रस मदिरा में 21 माधुरिया बनाई हैं। और उन 21 माधुरियों में विरह माधुरी में ही सबसे अधिक पद है। सबसे अधिक पद विर विरह मा। क्योंकि विरह ही हमारे प्रेम को बढ़ाता है। प्रेम हमारा कब बढ़ेगा? जब ये हृदय प्रियतम की याद में व्याकुल होगा, तड़पेगा तभी तो प्रेम बढ़ेगा। और भीतर कोई व्याकुलता ही नहीं, मिलन की ऐसी कोई तड़प ही पैदा नहीं हो रही कि श्याम सुंदर से मिलन हो जाए, उनका दर्शन हो जाए। तो फिर ऐसे प्रेम का भी क्या लाभ? उस प्रेम में तो वृद्धि ही नहीं होगी कभी।

और प्रेम किसे कहते हैं? प्रतिक्षण वर्धमानम। प्रेम का स्वरूप क्या है? जो प्रतिक्चर बढ़ता जाए, उसको प्रेम कहते हैं। हम लोग भी प्रेम तो करते हैं हरि गुरु से, लेकिन हमारा प्रेम एक ही लेवल पर बना हुआ है, बढ़ नहीं रहा। आप लोग कभी अपने आप को ध्यान से देखिए, क्या हमारा प्रेम बढ़ रहा है? घट भले ही रहा हो, बढ़ता हुआ नहीं दिखाई पड़ रहा। क्योंकि अगर बढ़ता हुआ दिखाई पड़ता, तो उसके लक्षण होते कि हां, अब तो उनसे मिले बिना रहा नहीं जा रहा, भीतर तड़प पैदा हो रही है। ये सांसारिक चीजें अच्छी नहीं लग रही, सब सांसारिक प्रपंच व्यर्थ रखता है। सांसारिक लोग व्यर्थ रखते हैं, सांसारिक कार्य व्यर्थ लगते हैं। सब व्यर्थ लगता है। क्या ऐसी अवस्था हो रही है हमारी? अभी तो नहीं हो रही, अभी तो संसार का सब कुछ अच्छा लग रहा है।

तुलसीदास जी ने बड़ा सुंदर कहा है विनय पत्रिका में: "जो मोहि राम लागते मीठे, तू शट रस नवरस अन रस रस है जाते।" सब फीके जो मोह राम लागते मीठे। कितना सुंदर कहा कि अगर राम अच्छे लग रहे होते, मीठे लग रहे होते, तो अपने आप संसार के सारे रस फीके लगते। अभी सांसारिक रसों में आनंद मिल रहा है, तो इसका अर्थ है कि अभी राम मीठे नहीं लग रहे। तो हम अपने आप को स्वयं ही तोल सकते हैं कि हमारा प्रेम बढ़ रहा है या घट रहा है, या एक ही जगह पर स्थिर हो गया है। स्थिर हो गया है तो भी प्रेम नहीं, और घटना तो प्रेम का स्वरूप ही नहीं है। प्रेम का स्वरूप तो केवल बढ़ना है। जो प्रतििक्षण बढ़ता जाए।

तो हमारे भीतर वो विरह का भाव आए, बहुत आवश्यक है। विरह मांगना चाहिए हमें श्याम सुंदर से कि हमें विरह दे दीजिए। श्री महाराज जी ने अपने एक संकीर्तन में भी लिखा: "ना दे दो ऐसी विह वेद ना मिट जाए मम अहम चेतना। ऐसी विह वेदना दे दीजिए हमारे इस हृदय में कि जो अहम भरा हुआ है भीतर, वो उस विरह अग्नि से वो अहम जल जाए। ऐसा विरह प्रदान कीजिए।" तो विरह मांगना चाहिए हमें। जितना जितना हमारा विरह बढ़ेगा, हम आगे बढ़ेंगे। इस हृदय में वो उत्कंठा, वो व्याकुलता, वो तड़प पैदा होगी, तब हम आगे बढ़ते जाएंगे। हमारी साधना आगे बढ़ेगी, प्रेम आगे बढ़ेगा। यानी हम जिस मार्ग की ओर चल रहे हैं, अभी हम रुक गए हैं। भीतर वो व्याकुलता नहीं आ रही, इसलिए आगे नहीं बढ़ पा रहे। हमें ये तो पता है कि हमारा लक्ष्य क्या होना चाहिए, भगवत प्राप्ति। ये तो पता चल गया, लेकिन भगवत प्राप्ति कैसे होगी? वो ठाकुर जी से मिलन कैसे होगा? यह जानते हुए भी आगे नहीं बढ़ रहे। जानते हैं कि हां, ठाकुर जी से मिलन प्रेम से ही होगा। जब जैसे जैसे हमारा प्रेम बढ़ेगा, जैसे जैसे हम तड़पेंगे उनकी याद में, वो भी तड़पेंगे फिर हमारी याद में। जब हमारी ये स्थिति हो जाएगी कि अब उनसे मिले बिना एक क्षण भी रहा नहीं जा रहा, तो उनकी भी वैसी स्थिति होगी।

श्री महाराज जी ने बताया है ना कि अगर हम यह जानना चाहें कि हरि गुरु हमसे कितना प्रेम करते हैं, तो अपने हृदय पर हाथ रख के सोचो, हम कितना करते हैं। क्योंकि हम जितना करते हैं, उतना उनको भी करना पड़ेगा। अगर हम उनके लिए व्याकुल होते हैं, ऐसा नहीं कि हम आंसू बहाते जाएं और ये सोचें, अरे, उनको तो कुछ पड़ी नहीं हमारी। हम ही आंसू बहाते रहते हैं, उनके लिए व्याकुल होते रहते हैं। ऐसा नहीं। जब हम आंसू बहाते हैं, हम व्याकुल होते हैं उनके लिए, तो वे भी व्याकुल होते हैं हमारे लिए। बस हमें अपनी वो व्याकुलता बढ़ानी है, अपनी तड़प बढ़ानी है। तभी तो वे भी उधर से दौड़ के आएंगे। ये जीव अब मेरे बिना रह नहीं सकता। अब तो इससे मिलन करना ही होगा, इसको मिलन का प्रेम देना ही होगा। तब वो दौड़ के आएगी। इसलिए मिलन से भी ज्यादा वो विरह भाव अपने भीतर लेकर के आओ। वो विरह भी तो क्या चाहता है? मिलन ही तो चाहता है ना। विरह में हम क्या चाहते हैं? विरह हमें परेशान करता है, हमारे प्रेम को बढ़ाता है। उस विरह में भी तो हम मिलन ही तो चाहते हैं। तो विरह से मिलन की स्थिति उत्पन्न होगी। इसलिए विरह को उड़ाना वो आवश्यक है। पहले इसलिए विह मांगा करिए हरि गुरु से। रोरो करके दे दो ऐसी वेदना, जिसमें हमारे शरीर का, मन का, बुद्धि का सबका अहंकार जलकर भस्म हो जाए। ऐसी वेदना प्रदान कीजिए।

यहां ये जो पद श्री महाराज जी ने लिखा, इस पद में भी एक गोपी का विरह भाव है। श्याम सुंदर मथुरा चले गए। अब गोपियां, वो तो प्रेम की आचार्य रहीं। उनसे अधिक प्रेम तो आज तक कोई कर नहीं पाया। अब उस गोपी की कैसी अवस्था है? वो कहती है: "ओ रसिया, कस सुरति बिल आप चले गए मुझे छोड़कर। तो मेरी तो सुरति ही मिसार दी आपने। अब आपको मेरा कोई स्मरण ही नहीं, मुझे भूल गए। वहां जाकर के आप। मैं तो लोक वेद कुलकानी आ सब तज आई पिय शरण तहारी। मैं तो ये संसार सारे लोक वेद की सब मर्यादा आदि सबको छोड़ के, सबका त्याग करके बस आपकी शरण में आई थी। और आप मेरा ही त्याग करके चले गए मथुरा। कैसे आपने भुला लिया मुझे?"

मग जोहत अखिया पतराई हारी, हे विपिन बनवारी। हर दिन, हर क्षण ये आंखें आपकी की प्रतीक्षा करती हैं, आपका रास्ता देखती हैं। तो यही भाव रहता हृदय में, किसी क्षण तो प्रियतम आएंगे। वन वन में घूम घूम कर आपको ढूंढते ढूंढते मैं हार गई हूं। आप कहां हैं? तारे गिनत जात सब यामिनी पलक एक युग सम लगारी। अब तो रातें भी कैसे कटती हैं? तारे गिनगिन कर इन आंखों में नींद भी नहीं आती। आपके विरह में केवल दिन रात ये आंखें बहती हैं। और रात को भी तारे गिनगिन के रात कटती हैं। तो आपका आगमन कब होगा? आपसे मिलन कब होगा? अब तो एक एक पल भी युग के समान भारी लग रहा है।

निर्मोही कस मोह मोह अब तड़पावत बेतीर मुरारी। आप तो निर्मोही हो गए। मुझे पहले तो मोह लिया। या तो मुझसे प्रेम ही ना करते, तो भी हमारी आज ये अवस्था तो ना होती। हम आपके लिए ऐसे बेचैन तो ना होते, ऐसे तड़प तो ना रहे होते। तो पहले तो मुझे मोह लिया, मेरे मन को, मेरी बुद्धि को सब मोह लिया। और अब बेर हो गए। अब आपको कोई फर्क नहीं पड़ रहा कि मैं कैसे तड़प रही हूं। यहां हम आपके बिना कैसे रह रहे हैं? अब आपको इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा। ऐसे बेतीर हो गए आप। जत लेत नहीं प्राण दुभा अति विपत्त हमारी। और ऐसी अवस्था हो गई है कि ना तो जिया जा रहा है और ना ही प्राण ही निकल रहे हैं इस शरीर से।

देखिए गोपियों की अवस्था ऐसी थी। इतना विरह था उनके भीतर जब ठाकुर जी से गए। लेकिन किसी गोपी ने शरीर का त्याग नहीं किया उस भाव में भी। क्योंकि उनके भीतर ये एक भाव था, ये शरीर भी श्याम सुंदर की धरोहर है। निष्काम प्रेम किया था ना, अपना सब कुछ नछावर कर दिया श्याम सुंदर को। समर्पण कर दिया। शरीर भी उनकी धरोहर है। तो उनके अनुपस्थिति में शरीर से प्राण भी कैसे निकल जाए? वे कभी आ गए और उन्होंने ढूंढा हमें, तो फिर क्या होगा? उनको कष्ट होगा। ये भाव इसलिए प्राण भी नहीं निकल रहे। प्राण भी नहीं त्यागती वो गोपियां। ऐसा प्रेम। वो कहती है: "अब ना तो जिया जा रहा है, ना ही प्राण ही निकलते हैं शरीर से। दोनों तरफ से हमारी मुसीबत हो गई। ऐसी अवस्था में पड़े हैं हम। अब कृपाल मोक तज माधव उबरी वर निज उ करी उ धारी।" तो वो सखी अंत में कहती है: "गोपी, लगता है अब हमारा त्याग करके जो मथुरा गए हैं ठाकुर जी श्याम सुंदर, वहां उनको कुवरी वो मन भा गई है। उससे प्रेम कर लिया उन्होंने। इसलिए अब उनको हमारी याद नहीं आ रही है। उमरी से मन लगा लिया। वो मन भा रही है।" ये उलहाना दे रही है प्रेम में। गोपी तो जैसा इस गोपी का भाव है कि प्रियतम ब्रज छोड़कर गए हैं, हमारा त्याग करके चले गए। और वो जो उसकी अवस्था है, वैसी अवस्था अपने भीतर भी हमको लेकर के आनी है कि प्रियतम कब आपसे मिलन होगा।

तो वही विरह का भाव लेकर के तब इस पद का गान करें, रूप ध्यान सहित। और रूप ध्यान करते हुए आंसू बहाते हुए। ये जरूर प्रयास किया करिए कि अश्रु तो बहे इन आंखों से। ऐसे सूखा सूखा कीर्तन नहीं करना है। अभी भी हम प्रवचन सुन रहे थे, उसमें श्री महाराज ने क्या कहा? पहले स्मरण, फिर कीर्तन। इसलिए रूप ध्यान आवश्यक है। और रूप ध्यान करते हुए आंसू बहाना भी उतना ही आवश्यक है। आंसू कब आएंगे? जब सच में रूप ध्यान करते हुए उस भाव में डूबेंगे, तभी तो आंसू आएंगे। और केवल आंख बंद कर लिए और आंख बंद करके मन यहां वहां विचरण करने गया, तो फिर तो आंसू नहीं आएंगे। इसलिए उस रस में डूबिए, अपने मन को डूबाइए उस भाव में लेकर जाइए। तब इन आंखों से आंसू बहेंगे। तब कीर्तन करना, पद गायन करना, साधना करना हमारा सार्थक होगा। इसलिए आंसू बहाने का विशेष प्रयास करो। रूप ध्यान में जाओ, भीतर उस भाव के उतरो। ना आंसू आए, तो धिक्कारो अपने आप को कि मन, तुझे किस बात का अहंकार है? किस बात का? क्या है तेरे पास जो प्रियतम के मिलन की उत्कंठा लेकर के भी इन आंखों से आंसू नहीं बह सकते? धिकारी अपने आप को, अपने मन को डांटिए। ना आंसू आए। और ये सोचिए, यदि आंसू बहा के हमने साधना न करी, तो फिर शिव महाराज जी को भी तो प्रसन्नता कैसे होगी? भला, वे भी तो उसी से प्रसन्न होते हैं। यहां जिन जीवों के साथ इतना परिश्रम मैंने किया, इनको बारंबार इतना समझाया, आंसू बहाओ, आंसू बहाओ। अभ्यास करो। हां, ये जीव अभ्यास कर रहे हैं, आंसू बहा रहे हैं। खूब आंसू बहाना पड़ेगा। बिना आंसू बहाए तो उनसे मिलन होगा नहीं। और तब तक आंसू बहाने होंगे। श्री महाराज ने लिखा है ना, तब तक आंसू बहाओ जब तक श्याम सुंदर स्वयं आकर अपने पीतांबर से तुम्हारे आंसू ना पहुंच दे। तब तक उन आंसुओं को सच्चा भी मत मानना जब तक श्याम सुंदर स्वयं आ के ना पूछ ले अपने पितांबर से। इसलिए आंसू बहाओ, आंसू बहाओ। धीरे-धीरे, धीरे आंसू भी हमारे सच्चे।

Source : SUSHREE NIKUNJESHWARI DEVI JI


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