सोई जान जेह देहु जनाई जानत तुम ही तुम ही होई जाई राम कृपा बिनु सुन खगराई जान न जाई राम प्रभु ताई ठीक तो अब भगवान की कृपा आ गई। बीच में हमारी छुट्टी अब पहले भगवान की कृपा हो तब हम भगवान को जाने तब विश्वास हो तब प्रेम हो। फिर शास्त्र वेद आए। ना छुट्टी नहीं है यह कृपा किस पर होती है यह तो समझ लो किस पर होती है। हां, जिन जीवों पर हुई है, क्यों हुई है और हमारे ऊपर क्यों नहीं हुई। हां, यह बात तो है। हम कोई भगवान के दुश्मन तो नहीं हैं। हम भी संतान हैं। एक अनंत महापुरुषों पर कृपा हुई, वे लोग भगवान के लोक में परमानंद का उपभोग कर रहे हैं और हम 84 लाख का चक्कर काट रहे हैं। कोई ना कोई बात तो है। पता लगाना है तो वेदों ने कहा कि मैं इसीलिए तो आया हूं तुमको यह बताने कि कृपा कैसे होगी। तुमको कुछ करना है तब कृपा होगी। हमको क्या करना है तो वेद कहता है।
वेदा ब्रह्मा विषया त्रिकांड विषय में वेद में तीन कांड हैं, तीन मार्ग हैं कृपा के लिए कर्म, ज्ञान, भक्ति। क्यों तीन ही क्यों है? इसलिए कि भगवान का स्वरूप है सच्चित आनंद। सच्चिदानंद भगवान है। ना, हम उनके अंश हैं तो हम भी तीन काम कर सकते हैं: कर्म, ज्ञान और प्रेम। यही तीन हम भी करते हैं। रोज गलत एरिया में करें, वह अलग बात है। तो इसीलिए तीन मार्ग हैं भगवान के ओर जाने के लिए भी कर्म, ज्ञान, भक्ति। भागवत में भी कहा योगायो मया प्रोक्ता नणाम श्रे विधित सया ज्ञानम कर्म च भक्तिश्च तीन मार्ग। अब पहले मार्ग को लीजिए कर्म। कर्म माने धर्म। धर्म माने धारण करने योग्य। धारण करने योग्य जैसे आप खाना खाते हैं तो क्या खाना चाहिए, ये समझ कर खाते हैं ना? गोबर तो नहीं खाते। कोई अगर परस दे गोबर, ये क्या है? गाय का गोबर है। ये क्यों परसा है खाने के लिए? पागल हो गया। ये खाने की चीज थोड़ी है। ये खाने की चीज है आटा, दाल, चावल वगैरह के सामान, तरकारी है, फल है। ऐसे ही आत्मा के लिए धारण करने वाला सामान जो हो, उसको धर्म कहते हैं। वो कौन बताएगा? तो वेद प्रणहितो धर्म भागवत छ एक 40। जो वेद बतावे, यह धर्म है, यह अधर्म है। उसको कहते हैं विधि निषेध। यह करो, यह धर्म है। यह ना करो, पाप अधर्म।
तो जब वेदों ने तीन मार्ग बताया 11 21 35 में वेदा ब्रह्मात्म विषय त्रिकांड विषय में, तो उसने फिर बताया कि धर्म संपदते सज भी रधस्त विपरजया 11 21 15। छह शर्तें पूरी करें तो उसका नाम धर्म। जैसे जैसे यज्ञ करना है, आपको हवन करना है तो छह शर्त है। नंबर एक कहां यज्ञ किया जाए? कहां यज्ञ किया जाए? हमारे पंडित जी तो अपने आंगन में ही कर देते हैं। उसका नियम है शास्त्र में। तब यज्ञ शुरू किया जाए, वो भी नियम है। यज्ञ करने वाला शुद्ध अंतःकरण वाला हो, छल कपट अविश्वास युक्त नहीं। द्रव्य जिससे यज्ञ हो रहा है, वो सामान सही कमाई का हो, वर्णाश्रम धर्म के अनुसार और विधि जो वेद में विधि बताई है, उसके अनुसार यज्ञ हो और मंत्र जिस मंत्र से यज्ञ हो रहा है, वह मंत्र का उच्चारण सही सही हो।
पतंजलि भाष्य में कहा गया कि दुष्ट शब्द स्वरतो वर्णतो मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमा सबाजो जजमानम हनस्त यथेंद्र शत्रु स्वरतो पराधात। एक राक्षस था, उसने यज्ञ कराया कि हमसे इंद्र मार मारा जाए और मंत्र था इंद्र शत्रु विवर्धस्व। यज्ञ करने वाले मुनियों ने कहा, ये मेरा इष्ट देव है इंद्र और मैं ही यज्ञ करूं। और राक्षस ने कहा, नहीं करोगे तो मैं सबको मार दूंगा। और डर के मारे बेचारे तो मुनियों ने आपस में मीटिंग की कि इसको वेद मंत्र तो आता नहीं राक्षस को अपन चालाकी करो। अक्षर वही रहेंगे लेकिन आदात को अंतदात कर दिया। उदात कहते हैं ऊंचे स्वर से बोलना। तो वेद में तीन होते हैं: उदात, अनुदात, स्वरित। ऊंचे स्वर से बोलना इंद्र, ये इ पर जोर देना और अनुदात इंद्र नीचे ले आना। तो आददात का मतलब था इंद्र का शत्रु बढ़े, माने राक्षस बढ़े, इंद्र मारा जाए। उसको अंत्योदात कर दिया तो उसका मतलब हो गया कि इंद्र से राक्षस मारा जाए। उल्टा हो गया और यज्ञ हुआ और वत्रासुर मारा गया। मरते समय उसने भगवान से कहा, हम भी तुम्हारी औलाद हैं। तुमने वचन दिया था कि यज्ञ का जैसा मंत्र है, वैसे ही वरदान दिया। तो भगवान ने कहा, यही तो मंत्र का अर्थ है अंतोदात में। और ये तो ऋषि मुनियों की गलती है। ये तुम्हारे ही तो हैं। ऋषि मुनि बुलाए हुए, मैं क्या करूं? अरे, ब्रह्मा ने यज्ञ किया पुत्र पैदा करने के लिए, उसके इला लड़की हुई, पुत्र नहीं हुआ। विधि में गलती हो गई। काशी नरेश मारा गया, विधि में गलती हो गई। प्रह्लाद को मारने के लिए प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यपु के गुरु, उनके पुत्रों ने यज्ञ किया, विधि में गलती हो गई। तो प्रह्लाद नहीं मरा, गुरु पुत्र मर गए। एक स्वर में गलती हो जाए तो इतना कठिन है धर्म। इसलिए मुंडकोपनिषद कहता है, प्लवा हेते अदृढ़ यज्ञ रूपा अष्टाद वरम जे अविद्या मंत्र वर्तमान स्वयं धीरा पंडितम्य माना ज्यमाना परंत मूढ़ा अंधाना यथा अविद्याया बहुधा वर्तना भयं कृत्था बाला। यत कर्मणो न प्रद रागा तेना लोका इष्टा पूम मन माना। एक दो सात, एक दो आठ, एक दो नौ, एक दो 10, एक दो 12 परिक्ष लोकान कर्मचान्या। तक मुंडकोपनिषद ने कहा कि ये कर्म धर्म अगर कोई कर भी ले सही सही तो उसका फल है स्वर्ग। वह है नश्वर। वहां भी माया है, वहां भी काम, क्रोध, लोभ, मोह, राग, द्वेष। सब यहां के सुख से वहां का सुख करोड़ों गुना बड़ा है। ये ठीक है लेकिन एक तो वो लिमिटेड है, दूसरे नश्वर है, तीसरे दुख का मिक्सचर है। जैसे आप लोग मोटरसाइकिल पर जाते हैं, एक गरीब आदमी पहली बार आगे कार देखा। कार होती तो अब कार मिल गई। Maruti कार से जा रहे हैं। आप उधर से BMW देखा, एक करोड़ की यह गाड़ी है। हमारी गाड़ी क्या? यानी वो वर्तमान सुख गया अपने से आगे वाले को देख के। अपने एरिया में तहसीलदार, एक सब इंस्पेक्टर हैं, खराब है। एसपी साहब आए, एसपी के आगे आईजी आए, सब दुखी हैं। वो सुख दुख से युक्त है। ये स्वर्ग का हाल है। कठोपनिषद कहता है, हमारी भी सुन लो शोभा मतसदंत तत सर्वेणा जरती तेजा। एक एक एक 26। कठोपनिषद पुण्यजितो लोकक्षयते। छंदोग्य उपनिषद आठ 11 कोटियां बताई स्वर्ग के सुखों की। शशानंदस मीमानसा भवती तैत उपनिषद दो आठ। सर्वत्र माया का अधिपत प्रश्नोपनिषद पुण्यन पुण्यम लोकम नति पापेन पापम उभा्या मनुष्य लोकम। प्रश्नोपनिषद तीन सात न ध्रुव प्राप्तते ही ध्रुवं तत। कठोपनिषद एक दो 10। भागवत में देख लीजिए, दुख दकाम निष्ठा शद्रंदा सुचारिता आदंतवंत एव स्वर्ग में दुख है, अशांति है, अतृप्ति है, अपूर्णता है। आिचाद मंगलम कर्मणाम परिणामित्वा। ये भागवत कह रही है, तावत प्रमोदते स्वर्ग जावत पुण्यम समाप्यत। जब तक पुण्य है, स्वर्ग में रह लीजिए। पुण्य समाप्त हो गया, अब कुत्ते, बिल्ली, गधे की योनियों में डाल दिया गया। हीन तरंबा विष जजा बिरिंच निरया चकार 9 5 25। भागवत ब्रह्मलोक को भी वहां के सुख को भी नरक के समान मानते हैं जो परमानंद पा चुके। और गीता देख लीजिए, तेतम भक्त स्वर्ग लोकम विशालम छने पुण्य मृत लोकम 92। या देवता देवा जानता भूतान जान भूते 925। देवा देव जजो जानती मद भक्त जानती माप सात 23। आ ब्रह्म भोका पुनरावर्तन अर्जुन आठ 16। उधम गच्छती सतस्था मध्य तष् राजसा जघन्य गुण वृत्तस्था अधो गच्छती तामसा। गीता 14 18। स्वर्ग की सर्वत्र निंदा एवंम लोकम परम विद्या नश्वरम कर्म निर्मितम। भागवत 11 तीन 20। सत्व प्रलीना स्वरती नररोकम रजोलया तमोलयास्तु निरयम जानमाव निर्गुणा 11 25 22। स्वर्ग स्वप्पंत दुखदाई। तो कर्म धर्म का फल स्वर्ग है, वह यह है नश्वर, माया के अंडर में है। वहां भी दुख, अशांति है।
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