श्रीनाथ जी ने आज तक अपना हाथ नीचे क्यों नहीं किया? एक संत के मुख से सुनी अद्भुत कथा
हम सब अक्सर सोचते हैं कि भगवान हमसे कितना दूर हैं, या वे हमारे बारे में क्या सोचते होंगे। लेकिन सच तो यह है कि प्रभु अपने चाहने वालों से इतना अगाध प्रेम करते हैं कि उनके नेत्र हर पल बस अपने भक्तों को ही खोजते रहते हैं।
भगवान स्वयं कहते हैं—"जो मुझे प्रेम करता है, वह मुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय है।" वे हमारे गुण नहीं देखते, हमारा वंश नहीं देखते, हमारे भीतर का बल या हमारा रूप-रंग नहीं देखते। वे तो भावग्राही जनार्दन हैं। उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं कि हमारा शरीर कैसा है, उन्हें बस इस बात से मतलब है कि हमारा भाव कैसा है और हम उन्हें कितनी मात्रा में अपना मानते हैं। इसी 'अपनेपन' का नाम तो भक्ति है।
हाल ही में एक परम पूज्य संत के मुख से श्रीनाथ जी (श्री गोवर्धननाथ जी) के स्वरूप की एक ऐसी अनोखी और करुणामयी व्याख्या सुनने को मिली, जिसने हृदय को भीतर तक झकझोर दिया। आइए, उस दिव्य भाव का रसपान करते हैं।
भक्त का प्रश्न: "हे श्रीनाथ जी! अब तो हाथ नीचे कर लो..."
हम सब जानते हैं कि भगवान ने ब्रजवासियों की रक्षा के लिए सात दिन और सात रात तक अपनी कनिष्ठिका उंगली पर विशाल गोवर्धन पर्वत को उठाए रखा था। सात दिन बाद जब इंद्र का अभिमान चूर हो गया, मूसलाधार बारिश थम गई और सब कुछ ठीक हो गया, तब पर्वत को वापस रख दिया गया।
परंतु, एक भक्त के मन में बड़ा ही सुंदर और बाल-सुलभ प्रश्न उठा। उसने एक संत से पूछा—"हे महाराज! इंद्र को अक्ल आ गई, ब्रज की स्थिति ठीक हो गई, फिर भी हमारे श्रीनाथ जी आज तक अपना बायां हाथ ऊपर उठाए क्यों खड़े हैं? अब तो सदियाँ बीत गईं, प्रभु से कहो कि अब तो अपना हाथ नीचे कर लें!"
संत का उत्तर: मेले में खोए बच्चे और व्याकुल पिता की कहानी
उस महात्मा ने जो उत्तर दिया, वह भगवान की परम करुणा का साक्षात स्वरूप है। उन्होंने कहा—"अरे पगली! वह कृपानिधान हैं, और उनका वह उठा हुआ हाथ ही तो उनकी असीम करुणा का प्रतीक है।" इसे उन्होंने एक बेहद सुंदर दृष्टांत से समझाया:
कल्पना कीजिए, एक छोटा सा बच्चा अपने पिता की उंगली पकड़कर एक बहुत बड़े और भारी भीड़ वाले मेले में जाता है। अचानक भीड़ के धक्के से पिता का हाथ छूट जाता है और बच्चा खो जाता है।
अब जरा सोचिए, उस बच्चे को जितनी चिंता है, उससे हजार गुना अधिक चिंता और व्याकुलता उस पिता के हृदय में है। बच्चे को चुप कराने के लिए तो मेले में बहुत से लोग आ जाएंगे—कोई उसे टॉफी देगा, कोई खिलौना दिखाएगा, कोई कहेगा, 'बेटा रो मत, अभी तुम्हारे पापा मिल जाएंगे।' उसे रिझाने वाले बहुत हैं।
लेकिन उस पिता का क्या? उसका तो चैन खो गया है। उसका कोई मित्र आकर कहे कि—'भाई, सुबह से ढूंढ रहे हो, चलो थोड़ी देर बैठकर नाश्ता कर लो, फिर ढूंढ लेंगे।' तो पिता तड़पकर कहेगा—'अरे! जब तक मेरा बच्चा नहीं मिलता, मेरे गले से पानी का एक घूंट भी नीचे नहीं उतरेगा!' वह व्याकुल होकर इधर-उधर दौड़ता है।
अंत में, वह पिता मेले के बीच बने एक ऊंचे टीले (चबूतरे) पर जाकर खड़ा हो जाता है ताकि वह ऊपर से पूरी भीड़ को देख सके। पिता की नजरें इतनी पारखी होती हैं कि लाखों की भीड़ में भी वह अपने बच्चे को पहचान लेता है। जैसे ही उसे दूर भीड़ में अपना रोता हुआ बच्चा दिखाई देता है, वह वहीं से अपना हाथ हवा में ऊपर उठाता है और हिलाते हुए जोर से पुकारता है—"पुत्र! मैं यहाँ हूँ... देख, मैं यहाँ हूँ! तू रो मत, बस मेरी तरफ देख, मैं यहीं खड़ा हूँ!"
आज भी इशारा कर रहे हैं गोवर्धनधारी
संत ने कहा कि ठीक यही स्थिति हम सब जीवों की और श्रीनाथ जी की है। यह संसार एक बहुत बड़ा मेला है, जहाँ हम माया के आकर्षणों में आकर अपने परम पिता परमेश्वर का हाथ छोड़ बैठे हैं और खो गए हैं। हमें जितनी चिंता भगवान की नहीं है, उससे कोटि-कोटि गुना अधिक चिंता हमारे ठाकुर जी को हमारी है।
इसीलिए, वे गोवर्धननाथ के रूप में उस ऊंचे गोवर्धन पर्वत पर अपना हाथ उठाकर खड़े हो गए हैं। वे उस ऊंचे धाम से अपना हाथ उठा-उठाकर संसार के मेले में भटके हुए हम जैसे बच्चों को इशारा कर रहे हैं:
"ए पुत्र! ए मेरी लाडली! मैं यहाँ हूँ, मैं यहाँ हूँ... जरा इस संसार की भीड़ से अपनी नजरें हटाकर मेरी ओर देख तो सही! तू मेरी ओर देखेगा, तो मैं तुझे दिख जाऊंगा। आजा मेरे पास..."
प्रभु सदियों से वही हाथ उठाए हमारी राह देख रहे हैं। वे इतने उदार, इतने करुणा के सागर और दयानिधान हैं कि वे केवल भक्ति और अपनेपन के अधीन हैं। पर एक हम हैं, जो उनके इस प्रेम भरे इशारे को समझ ही नहीं पा रहे हैं और संसार के खिलौनों (भोग-विलास) में उलझे हुए हैं।
निष्कर्ष
भक्तों, हमारे श्रीनाथ जी का उठा हुआ हाथ पर्वत उठाने का श्रम नहीं, बल्कि हम भटके हुए जीवों को वापस बुलाने का एक अनंत आमंत्रण है। आइए, इस पावन भाव को अपने हृदय में बसाएं और अपने उस व्याकुल पिता की ओर एक कदम बढ़ाएं, जो कब से हाथ उठाए हमारी प्रतीक्षा कर रहा है।
"नमो गोवर्धनधारी, श्रीनाथ कृपालु दयालु हरी..."
आपको श्रीनाथ जी के इस स्वरूप का यह दिव्य भाव कैसा लगा? अपने भाव नीचे कमेंट बॉक्स में 'जय श्रीजी' या 'श्री गोवर्धननाथ की जय' लिखकर जरूर व्यक्त करें।