प्रभु राम का जीवन और शिक्षा (रामायण भाग 1)

अयोध्या पूरी एक नया युग की प्रतीक्षा में थी। प्रजा लोग हर्षोल्लास के साथ खुशियां मना रहे थे। अचानक सब बदल गया। प्रभु राम को सिंहासन में अभिषिक्त होना था, लेकिन कैकई के प्रार्थना पर दशरथ जी ने प्रभु राम को 14 साल के वनवास की आज्ञा दी एवं भरत जी को सिंहासन में अभिषिक्त होने के लिए सूचित किया गया। एक दारुण दुस्वाद से सब लोग हतचकित हो गए, लेकिन प्रभु राम के श्रीमुख मंडल में वही स्मित हास्य जो राजा बनने की सूचना पाकर था और जो वनवास जाने की सूचना मिलकर वही स्मित हास्य उनके श्रीमुख मंडल में उदेति सविता ताम्रस्ताम्रवामेति च संपत्तच विपत्तच महता एक रूपता जैसे सूर्य भगवान उदय के समय में जिस रंग धारण करके निकलते हैं, जब अस्तांचल में जाते हैं, वही रूप लेकर जाते हैं।

जो महापुरुष होते हैं, तो सब समय एक स्थिति पर रहते हैं। भागवत में कहा गया है, "बाप की संपत्ति यानी प्रभु की संपत्ति को कौन संतान पा सकती है?" पहली शर्त तत्तुकम सुसमक्षमाणु, दूसरा उनवा कृतम विपाकम। उनकी अनुकंपा, उनकी कृपा पाने के लिए पहली शर्त है सुखदुख जो मिलता है, वो प्रभु की इच्छा मानकर उसको साहस भोग करना। जब सुख का समय आता है, सब लोग विभोर होकर हर्षित पुलकित हो जाते हैं और जो दुख का समय आता है, हम लोग बहुत भ्रमित हो जाते हैं। हम लोग बहुत परेशान हो जाते हैं। जिस प्रकार सुख हमारे किए हुए कर्मों का फल है, दुख भी तो हमारे किए हुए कर्मों का फल है।

तो इसीलिए संभापर्णता भगवान और महापुरुष हम लोगों को सिखाते हैं। अपने जीवन में इसको करके संभावपन्नता प्रभु राम के जीवन में सबसे बड़ी शिक्षा है। प्रभु राम राजा बनेंगे, यह सूचना जानकर जितनी प्रसन्नता है, जंगल जाना पड़ेगा। 14 साल के लिए जंगल जाना पड़ेगा, यह सूचना सुनकर वही उनकी स्थिति है। इसी को संभावपता कहते हैं। महापुरुष और भगवान यही समभाव गुण प्रकट करते हैं, जिससे हमको सीखना है।

संपूर्ण वैज्ञानिक है सुखदुख हमारे कर्मों का फल है। सुख का भोग करने के समय हम विभोर रहते हैं, दुख के भोग करने के समय हम परेशान हो जाते हैं। यह दुख तो हमारे किए हुए कर्मों का फल है। बल्कि हमको प्रसन्न रहना चाहिए। हमारे खराब कर्मों का फल भोग लेंगे, तो आगे अच्छा ही अच्छा है। जिस प्रकार सूर्य उदय के समय और अस्त के समय एक स्थिति में रहते हैं, महान व्यक्ति, महापुरुष और भगवान भी जीवन में यही आदर्श को स्थापित करते हैं। प्रभु राम ने यही आदर्श को जगत में स्थापित किया।

महापुरुष और भगवान के लिए खास करके महापुरुष के लिए कहा गया है, "वेदांत वाक्यु सदा रमंतः, भिक्षा न मात्र चतुष्टता, अशोक मंत करण चरंतः, कौपी निवंत खल भाग्यवंत।" जो मिल जाए उसमें प्रसन्न रहना। भिक्ष मात्रण चतुष्ट मंत क्योंकि कि अशोक वो अंतकरण में विचरण करने वाले। इसलिए ना वैभव, ना अभाव, उनके हृदय में कोई हर्ष, ना कोई उद्वेग पैदा कर सकते हैं। प्रभु राम यही आदर्श जगत में रखते हैं।

तीसरी सीख हमको यह मिलती है कर्तव्य परायणता और अधिकार का त्याग। प्रभु राम कर्तव्य परायणता के ऊपर जोर दे रहे हैं। क्योंकि हमको तो प्रभु से कृपा चाहिए। तो और हम अगर शास्त्रों के अनुसार कर्तव्यों का पालन करेंगे, हमारे प्रभु को प्रसन्नता होगी। इसलिए कर्तव्य परायणता का पालन प्रभु कर रहे हैं और अपना अधिकार जाहिर नहीं कर रहे हैं। क्योंकि अधिकार जो है, वो सुसुख वासना है। कर्तव्य परायणता यह है उनके सुख के लिए कार्य करना। अत कामे प्रेमे बहुत अंतर। काम अंधतम प्रेम निर्मल भास्कर। काम अपने सुख के लिए, यह है अधिकार भोग और कर्तव्य परता उनके सुख के लिए। यह है प्रेम।

तो काम प्रेम में बहुत अंतर होता है। काम अपने सुख के लिए, प्रेम उनके सुख के लिए। प्रभु कर्तव्य परायणता को जोर दे रहे हैं, अधिकार को कम प्राधान्य दे रहे हैं। व्यक्ति हो, परिवार हो, समाज हो, प्रांत हो, राष्ट्र हो, विश्व हो, समस्या तो यहीं पर है। हम सुसुख वासना अधिक रखते हैं, यानी अधिकार के संबंध में हम अधिक सचेत हैं और कर्तव्य प्रणता भूल जाते हैं। अगर हम कर्तव्य प्रणत को ध्यान रखेंगे, जिससे उनको सुख मिलेगा, अधिकार के ऊपर ध्यान कम होता जाएगा, जिससे हमको सुख मिलना मिलेगा। इसलिए प्रभु राम का जीवन आदर्श हम लोगों को ऐसी प्रेरणा देती है।

प्रभु संसार में आए, जगत में साधारण मनुष्य के समान कुछ लीलाएं करके गए ताकि हम साधारण मनुष्य उनकी संभावता, उनकी स्थिति, प्रज्ञता, उनकी कर्तव्य निष्ठा से हमको प्रेरित करें और हम प्रभु राम के आदर्श में अनुप्राणित होकर भगवत चिंतन, गुरु चिंतन से हम भवसागर से उत्तीर्ण हो जाएं। प्रभु राम अवतार लेकर यही शिक्षा दे रहे हैं।

Source : Swami Yugal Sharan_Hindi


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