स्वास्थ्य और मन की स्थिति

स्वास्थ्य केवल शरीर नहीं, मन भी है। मन ठीक नहीं, तो शरीर गड़बड़। शरीर ठीक नहीं, तो मन गड़बड़। तो जब यह दोनों एक दूसरे से संबद्ध हैं और भगवान को मन चाहिए, गुरु को मन चाहिए, तो मन यदि चिंताजनक स्थिति में रहेगा, तो वह साधना आराधना नहीं कर पाएगा। इसलिए जहां-जहां मन बाधक बनता है, उस स्थिति को, उस समय को, उस वातावरण को हमें शुद्ध करना है। जो अशुद्ध वातावरण आपके अंदर तमोगुण, गलत विचार, बुरे विचार पैदा करें, उस कंडीशंस को हटाइए। उस सिचुएशन को हटाइए। यहां मन पूरी तरह डूब जाता है और जहां मन डूबता है, जिसके लिए डूबता है, उसकी छाप हमारे हृदय में बन जाती है और उसी का फल मिलता है।

तो इसीलिए आप सब से मेरा अनुरोध है, मन को जितना पावन बनाएंगे, पवित्र बनाएंगे, उतना जीवन पवित्र होगा और शरीर भी स्वस्थ रहेगा। अपने चिंतन को शुद्ध रखिए। सांसारिक चीजें जो आती हैं आपके जीवन में, जो समस्याएं हों या परेशानियां हों, उसको जीवन का एक भाग मानना है। उससे घबराना नहीं है। वह सबके जीवन में आएंगी। सबके जीवन में आपको देखने में ऐसा लगता है, वह तो बड़ा खुशमिजाज है, उसको कोई परेशानी नहीं, वह तो बड़ी मस्ती में रहता है, सुखी है। ऐसा नहीं। ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है, जिसके जीवन में यह दोनों चीजें ना हो। वरना वह जीवन नहीं, लाइफ नहीं। लाइफ के दो पहलू हैं। जहां द्वंद है, यदि आप मृत्यु लोक में आए हैं, तो आपको द्वंद दिखाई देगा। दिन-रात, अच्छा-बुरा, यह दो चीजें होंगी। इसके बिना जीवन नहीं हो सकता। जहां गड़बड़ है, वहां समाधान अवश्य है। तो समाधान को खोजना है। अपनी एनर्जी को समाधान में लगाइए, ना कि ऐसा हुआ, वैसा हुआ, यह क्यों हुआ, ऐसा तो मेरे जीवन में नहीं होना चाहिए था, ये होना चाहिए था, नहीं होना चाहिए था। आप जीवन दाता थोड़े ही हैं। जीवन के अंतर्गत जो बातें हैं, उसको बनाने या बिगाड़ने वाले आप थोड़े ही हैं। कर्म फल दाता तो आप हैं नहीं। आप कर्म करने वाले हैं।

तो इसीलिए क्वेश्चन मार्क इतना लगाकर अपने चिंतन को नहीं बिगाड़ना, अपितु समाधान पर जाइए। प्रतिदिन प्रसन्न रहिए। हर दिन को नया दिन मानिए और नई उमंग के साथ कार्य कीजिए। और हर कार्य प्रभु को, गुरु को समर्पित करके कि प्रभु, जब तक जीवित हूं, आपके लिए कर रहा हूं। जो संसार दिया है, वह भी और परमार्थ तो मेरी पूंजी है। तो जगत के प्रति जितना आपका व्यवहार, जो आपकी ड्यूटीज हैं, कीजिए। लेकिन इस बात का हमेशा यह ध्यान रखिए, गीता की फिलॉसफी यत करोशी यदसीदास यश दर्पणम। श्री कृष्ण गीता में कह रहे हैं अर्जुन, यत करो, जो कर रहे हो, जो सोच रहे हो, जो दे रहे हो, जो ले रहे हो, जो कुछ भी कर रहे हो, हमेशा याद रखना कि तुम्हारी नजरों के सामने मैं रहना चाहिए। यानी मुझे सामने रख के काम करो। जगत का मैं सदा सामने रहूं। मुझे छोड़कर यदि तुमने कार्य किए, एक तो वह पाप और उसका फल भी सर्वनाश, तुम्हारा पतन। फिर मैं संभालने भी नहीं आऊंगा, क्योंकि तुमने मुझे छोड़ दिया।

इसलिए जो कुछ करते हो, हमेशा लक्ष्य यही रहना चाहिए, उनकी खातिर। मेरे खातिर भी नहीं, अपनी खातिर भी मत करो। पतन उनके खातिर। जब उनके खातिर सोचकर हम काम करेंगे, तो हम जगत से अनासक्त होकर काम करेंगे। जब हम आसक्त हो जाते हैं, ना, तो हम देखते हैं कितनी उपलब्धि हुई, कितने हम सफल हुए। यह तो हमने किया था, तो मिला क्यों नहीं। यह सब बाधाएं आने लगती हैं। लेकिन अपने को जब निमित्त मान लेते हैं और जब सफलता मिलती है, तो उस समय आप उतने विभोर भी नहीं होते। क्यों? क्योंकि आपने अपनी सफलता को उनकी कृपा मानी है। स्वयं तो आप निमित्त हैं।

इसलिए हर स्थिति में एक समान रहना। दुख है, कोई बात नहीं। जीवन का एक भाग है। सुख है, कोई बात नहीं। कर्म है, किए होंगे हमने पिछले जन्म में, फल मिल रहा है। या वर्तमान में अच्छा किया है, तो उसका फल मिल रहा है। लेकिन यह सुख-दुख, यह कर्म मेरे लिए कोई इंपॉर्टेंस नहीं रखते। क्यों? क्योंकि यह असली कर्म है ही नहीं। इन सब कर्मों से मेरे लक्ष्य की प्राप्ति तो होनी नहीं। मुझे भगवान तो मिलेंगे नहीं, उनका प्रेम तो मिलेगा नहीं। तो यह मेरे लिए इंपॉर्टेंट नहीं है। जगत में आया हूं, करना है, करूंगा। सो न्यूट्रलिटी मेंटेन करके रहेंगे। अनासक्त भाव से रहेंगे, तो यह संसार भी आपके मन को अपनी ओर विचित्र रूप में नहीं खींचेगा और मन भी आपका हरि गुरु के चरणों में लगा रहेगा।


Source : Raseshwari Devi Ji

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