भारतीयों के यहां हजारों पर्व हैं, बल्कि 365 दिनों में सभी दिन पर्व हैं। हर त्यहार में हम लोगों ने बिगाड़ा कर लिया त्यहार का, और क्या करते हैं? हम माल टाल खाते हैं। आज तो त्यहार है। यह त्यहार नहीं है, ये तो और उल्टा है। सर्व पर्व, सर्व पर्व लक्ष्य एक गोविंद राधे पर। लक्ष गोविंद, सर्व पर्व लक्ष्य एक गोविंद राधे। पार्वक्ष जग से हटा के मन हरी में लगा से लगा।
ये जो हमारे भारतीयों के यहां हजारों पर्व हैं, बल्कि 365 दिनों में सभी दिन पर्व हैं, क्योंकि सारे अवतार यही होते हैं और बड़े-बड़े सब महापुरुष भी यही होते हैं। तो उन अवतारों का जन्म, यानी अवतार का दिन और अवतारों का फिर स्वधाम गमन का दिन, ऐसे ही महापुरुषों के अवतार का दिन और महापुरुषों का भी भगवत धाम गमन का दिन। इस प्रकार अनंत महापुरुष हुए, दिन तो 360 ही होते हैं साल में। तो हर दिन पर्व है।
लेकिन बाहरी कारण कुछ भी हो, तत्वज्ञों की दृष्टि में प्रत्येक पर्व का एक ही लक्ष्य है कि तुम जिस कारण दुखी हो, अशांत हो, अतृप्त हो, अपूर्ण हो, उस कारण को मिटाने का इलाज करो, दवा करो, औषधि करो। संसार से मन हटाकर भगवान में लगाओ। सारे त्योहारों का यह उद्देश्य है, और बाकी उद्देश्य सब बनावटी है, नकली है। जैसे हर त्यहार में हम लोगों ने बिगाड़ा कर लिया त्यौहार का, और क्या करते हैं? लाल टाल खाते हैं। आज तो त्यहार है। हां, गुजिया बनेगी, पूरी बनेगी, हलवा बनेगा। हां, बड़ी खुशी हो रही है सबको। नाग पंचमी आ रही है, होली आ रही है, दिवाली आ रही है। गरीबों को इन्हीं पर्वों पर थोड़ा अच्छा खाना मिल जाता है, चाहे कर्जा करके वह लोग अच्छा खाना बनाते हैं। पकवान ये त्यहार नहीं है, ये तो और उल्टा है। मन को और खराब करना वैराग्य नहीं है, ये तो राग है। रसना, इंद्रिय को और मन बढ़कर देना, ये उल्टा करते हैं हम लोग।
अब बड़े-बड़े बाबा लोग दाढ़ी रखकर व्रत रहते हैं। तब सब पर्वों पर व्रत, व्रत क्यों रहते हैं? आज तो रबड़ी, मलाई और मिठाई। हां, मालटा मिलेगा। हां, एकादशी है, पूर्णिमा है, राम नवमी है, जन्माष्टमी है। यह रसना, इंद्रियों को और बढ़ावा देना, यह व्रत नहीं है। वेद में उपवास शब्द का अर्थ लिखा है। वेद में बराहो उपनिषद के दूसरे अध्याय का 39वां मंत्र है, उसमें लिखा है: उपसमीपे योवासो जीवात्म परमात्मा उपवास सविो नातु कास्य शोषणम। काया को, शरीर को सुखाना, विटामिन, प्रोटीन ढंग से ना देना, यह उपवास नहीं है। उप माने समीप और बास माने जीवात्मा का परमात्मा के पास जाना। यानी मन को भगवान में लगाना, यह उपवास है।
रूप समीप यो भासो जीवात्म परमात्मनो। जीवात्मा परमात्मा के पास अपने मन का वास करावे, ले जाए। ये उपवास है। ये तो हम करते नहीं। आज तो माल टाल खाएंगे। ये पर्व मनाते, हम लोगों ने बिगाड़ दिया। हमारे आचार्यों ने तो बताया था कि देखो, इतने पर्व हम बना रहे हैं। इसका मतलब कि अगर तुम पूरे 360 दिन भगवान की भक्ति ना करो, तो कम से कम 100 दिन तो करो, जो व्रत के दिन हैं, पर्व के दिन हैं। लेकिन हम लोग भी अपनी बुद्धि से काम करते हैं। शास्त्र, वेद बोला करें कुछ। हां, सब गड़बड़ झाला कर दिया हम लोगों ने। इसलिए सिद्धांत समझ लो, प्रत्येक पर्व का, त्यहार का लक्ष्य है भगवान में मन लगाना।
No comments:
Post a Comment