श्री महाराज जी की लीला स्थली

यह श्री महाराज जी की लीला स्थली है। किसी साधक ने प्रश्न किया है कि गोलोक धाम के विषय में कुछ बताइएगा। अब यह गोलोक धाम कि वह गोलोक धाम वहां के विषय में तो श्री महाराज जी ही बता सकते हैं। हां, यहां पर जो श्री महाराज जी की लीलाएं हुई हैं, वह भी अनिर्वचनीय है क्योंकि महाराज जी का स्वरूप अनिर्वचनीय है। उनका प्रेम का स्वरूप है। जैसे प्रेम अनिर्वचनीय है, ऐसे ही महाराज जी ने जो लीलाओं के माध्यम से, संकीर्तन के माध्यम से, प्रवचन के माध्यम से जो ब्रज रस वर्षा की है, वह भी शब्दों में बताया नहीं जा सकता। हां, कुछ-कुछ उनकी मधुर स्मृतियां हैं। कुछ-कुछ महाराज जी का तो इतना सादा जीवन रहा है कि उन्होंने कभी यह सोचा ही नहीं कि वह जगत गुरु उत्तम हैं। जगत गुरु उत्तम के हिसाब से वो कभी कहीं गए ही नहीं। छोटे-छोटे घरों में भी रुके हैं। दिल्ली में भी बहुत सी बार श्री महाराज जी का प्रवचन गली में टेंट लगाकर हुआ है। कोई ऐसा नहीं कि बहुत बड़े-बड़े ऑडिटोरियम बुक कराए गए हों या कोई बहुत बड़ा हॉल बुक कराया गया हो। महाराज जी चाहते थे कि कोई एक यहां पर भी केंद्र हो, जहां कि नियमित रूप से सत्संग होता रहे। श्री महाराज जी ने ही राधा गोविंद समिति 1998 में यहां पर एक बनवाई। दिलशाद गार्डन बहुत छोटी सी जगह थी। एलआईजी फ्लैट सोचिएगा, एलआईजी फ्लैट में महाराज जी रहे हैं। फिर उसके बाद पंजाबी बाग में एक थोड़ा सा सेंटर बना। किसी का घर था, कृष्ण कुंज उसका नाम था। वहां भी बहुत वर्षों तक यहां से पहले श्री महाराज जी वहां रहे। नेहरू प्लेस में भी एक सेंटर था, किशोरी कुंज। लेकिन सब छोटी-छोटी ही जगह थी। उसके पश्चात लगभग 2000 से इसका निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ। महाराज जी ने आज्ञा दी और जब 2004 में बनकर कंप्लीट हुआ, श्री महाराज जी के द्वारा ही नाम दिया गया गोलोक धाम। श्री महाराज जी कुछ अस्वस्थ थे। अस्वस्थ होने के कारण श्री महाराज जी अचानक ही दो दिन पहले श्री महाराज जी का फोन आया कि मैं 10 अक्टूबर को आ रहा हूं। उस समय तक नाम नहीं रखा था। श्री महाराज जी ने गोलोक धाम, वो तो यहां आने के बाद ही गोलोक धाम नाम दिया। तो महाराज जी सीधे हॉस्पिटल से यहां पर आए। आए तो फिर वह आंगन में विराजित हुए। आरती महाराज जी की हुई। महाराज जी इधर-उधर देखने लगे। फिर मंदिर में श्री महाराज जी गए। वहां पर ठाकुर जी का स्वरूप महाराज जी उसको निहारते रहे। फिर एक दिन के बाद, यानी 11 अक्टूबर को ही कहना चाहिए, महाराज जी ने मंदिर देखा। मंदिर देखने के बाद फिर श्री महाराज जी बोले कि एक मैंने सुना था कि एक भवन और है, साधना भवन जैसा। तो यह तो छोटा सा मंदिर है। तब जो आसपास सत्संगी थे, महाराज जी तो बड़े प्यार से सभी से बात करते थे। तो वो बोले, महाराज जी नीचे भी है। एक तो महाराज जी नीचे आए बेसमेंट में। और मैं उस समय यहां नहीं थी क्योंकि पंजाबी बाग में काफी सामान उस समय शिफ्टिंग चल रही थी। तो वहां सामान लेने के लिए कुछ गई थी मेरे पीछे ही। फिर महाराज जी ने उद्घोषित किया कि इसका नाम गोलोक धाम होगा। यह मोहल्ला द्वारिका है। इस द्वारिका में गोलोक धाम इसका नाम नहीं रखा गया था अब तक। द्वारिका धाम है, ये मोहल्ला। इसमें इस बिल्डिंग का नाम होगा गोलोक धाम। तो श्री महाराज जी ने इसका नाम गोलोक धाम उद्घोषित किया। और उस समय कोई मिठाई इत्यादि भी नहीं थी क्योंकि अचानक ही महाराज जी ने बोल दिया। खाली एक मिठाई का डिब्बा था, वही महाराज जी के सामने रख दिया। वही सबको महाराज जी ने एक-एक मिठाई दे दी। फिर महाराज जी ने आज्ञा दी कि यहां रोज परिक्रमा होगी। तो 20 दिन तक यहां पर नित्य प्रति श्री महाराज जी के सानिध्य में, हमारी तीनों दीदी के सानिध्य में भक्त मंडली के साथ अन्य भी कुछ प्रचारक यहां पर आ गए थे श्री महाराज जी के दर्शनार्थ। तो 20 दिन तक रोज सुबह परिक्रमा हुई। और श्री महाराज जी ने आज्ञा दी कि कोई भी घर पर नहीं रहेगा। सब परिक्रमा में जाएंगे। और स्वयं बाहर खड़े होकर देखते थे कि कौन-कौन लोग जा रहे हैं। हमारी तीनों दीदी भी परिक्रमा में डेली गई हैं। उसके पश्चात तो फिर महाराज जी एक महीने में दो-तीन बार कम से कम यहां आते ही थे। महाराज जी संकीर्तन कराना, प्रवचन कराना, वह कराते ही थे। महाराज जी यानी यहां के साथ अनंत स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। महाराज जी की वह उनकी जो मधुर स्मृतियां हैं, आज वह हमारे जीवन का आधार है कि किस प्रकार से महाराज जी ने यहां, जहां हम लोग बैठे हुए हैं, साधना भवन कह दीजिएगा इसको, कि यहां पर महाराज जी ने कितना कीर्तन कराया है। कितना कीर्तन कराया है। कोई बच्चा जा रहा है, हाथ मिला रहा है। भक्त आते चले जा रहे हैं। आप लोगों में से कुछ लोगों को याद होगा यह कि किस प्रकार से महाराज जी को माला पहनाते रहते थे। कैसे महाराज जी कीर्तन कराते रहते थे। कैसे भक्त लोग डांस करते रहते थे। श्री महाराज जी के सामने एक जैसे नशा ही था। सुबह घर से दौड़ कर आ रहे हैं। किसी को कुछ होश ही नहीं था। 3:00 बजे घर से चल दिए क्योंकि 4:30 बजे महाराज जी मंदिर में आ जाते थे। और कैसे महाराज जी यहां से उठते थे। अचानक तो सारे बच्चे ऊपर दौड़ते थे कि अब महाराज जी जाएंगे ऊपर। और फिर महाराज जी उनको चिढ़ाने के लिए फिर बैठ जाते थे। फिर बच्चे भागते थे, फिर बैठ जाते थे। तो इस प्रकार से फिर महाराज जी जैसे ही ऊपर पहुंचते तो बच्चे सारे गले महाराज जी सब बच्चों को गले लगाते। फिर सब लोग आंगन में एकत्र हो जाते। सोचिएगा, कितना छोटा सा आंगन है और कितने 200-300 लोग सारे पता नहीं कैसे वहां आ जाते थे। कुछ ऊपर भी बालकनी में खड़े हो जाते थे। और फिर महाराज जी गुड नाइट करने के लिए सबको आते थे। जब भी महाराज जी कहीं जाते थे, मुंबई जाए या जयपुर जाए या कहीं गोवा जाए या और नेपाल जाए, कहीं भी जाए, महाराज जी यहां अवश्य आते थे। और जो इतने वर्षों तक आते जाते रहे, 2004 से सोचिएगा, 2013 तक श्री महाराज जी यहां आते रहे। कितनी बार आए होंगे, सैकड़ों बार श्री महाराज जी आए। कभी एक दिन के लिए, कभी दो दिन के लिए, कभी चार दिन के लिए, आठ-आठ दिन तक भी श्री महाराज जी यहां पर रुके हैं। तो यह एक इस प्रकार से महत्वपूर्ण स्थान है, जहां कण-कण में महाराज जी की यादें हैं। महाराज जी की स्मृतियां हैं। उनकी अकारण करुणा का एक प्रत्यक्ष प्रमाण है। उनके अनंत उपकारों में से यह भी एक उपकार है। बहुत बड़ा हम लोगों के ऊपर कि आज हम उस लीला स्थली में बैठे हुए हैं, जहां हमारे महाराज जी, हमारी अम्मा जी, हमारी तीनों दीदी पुनः पुनः आए हैं। बार-बार आए हैं। इस स्थान को तीर्थ नहीं, महा तीर्थ कहना चाहिए। महा तीर्थ भी नहीं, सभी तीर्थों का फल प्राप्त हो जाता है उस स्थान पर जाने से, जहां महापुरुष के चरण पड़े हों, जहां महापुरुष ने निवास किया हो। तो फिर और क्या बात है कि यहां श्री महाराज जी प्रातः मंदिर में 12:30 बजे से घूमना प्रारंभ कर देते थे। तीन-चार बार दिन में महाराज जी घूमते थे। तो यह वही मंदिर है, जहां श्री गुरुवर घूमते थे। उनके चरण पड़े हैं। उन चरणों का सुखद स्पर्श वहां की भूमि को प्राप्त हुआ है। और साथ ही वहां के जो ठाकुर जी किशोरी जी हैं, श्री महाराज जी के द्वारा ही स्थापित यह श्री विग्रह है। श्री महाराज जी की आज्ञा से ही स्थापित हुए हैं। और उन्हीं के द्वारा स्थापित हुए हैं। और उन्हीं के द्वारा प्राण प्रतिष्ठा हुई है। जब महाराज जी से पूछा कि मूर्ति तो स्थापित करनी होगी, उससे पहले किसी मंदिर में कोई मूर्ति स्थापित नहीं हुई थी। तो महाराज जी ने कहा, "अरे लगवा लो फिर मूर्ति।" फिर महाराज जी ने उस आर्टिस्ट का नाम बताया, जिस आर्टिस्ट ने यह मूर्ति या भगवान का स्वरूप बनाया है। फिर जब यह स्थापित हुए, तब श्री महाराज जी ने उसी आर्टिस्ट से, जिसने यह बनाए थे, भक्ति मंदिर में ठाकुर जी किशोरी जो स्थापित हुए, जो श्री विग्रह आप दर्शन करते हैं। फिर भक्ति मंदिर के बने, प्रेम मंदिर के बने, उसी के द्वारा फिर कीर्ति मंदिर के बने। यानी समय की आवश्यकता के अनुसार फिर महाराज जी ने सहारा लेने के लिए रूप ध्यान में सहारा हो। फिर ये मंदिरों की स्थापना प्रारंभ हो गई। लेकिन पहले यहां पर मूर्ति स्थापित हुई है। फिर महाराज जी से पूछा कि महाराज जी, इसके लिए वैदिक अनुष्ठान किस प्रकार से किया जाए। महाराज जी ने कहा, "अरे मैं ही कर दूंगा इसकी प्राण प्रतिष्ठा।" तो इसकी जो प्राण प्रतिष्ठा है, वह भगवन नाम संकीर्तन से ही हुई। और इसका जो उद्घाटन है, वो भी भगवत नाम संकीर्तन से ही हुआ। और हमारे श्री महाराज जी संकीर्तन आचार्य हैं। अद्वितीय संकीर्तन आचार्य हैं। संकीर्तन को ही उन्होंने युग धर्म के रूप में स्थापित किया। तो यह भी एक विशेष बात है कि यहां जो भी वैदिक अनुष्ठान की आवश्यकता थी, वैदिक अनुष्ठान उस संकीर्तन के माध्यम से ही हरि गुरु के प्रेम से ही श्री महाराज जी की उपस्थिति से ही श्री महाराज जी के द्वारा ही कहिएगा, इसकी प्राण प्रतिष्ठा हुई। इस छोटी सी जगह में महाराज जी ने बड़े-बड़े त्यौहार मनाए हैं। श्री कृष्ण जन्माष्टमी जैसा पर्व भी यहां पर मनाया गया। राधाष्टमी जैसा पर्व भी यहां पर मनाया। गुरु पूर्णिमा जैसा पर्व भी श्री महाराज जी ने यहां पर मनाया। अन्य भी पर्व, बुद्ध जयंती वह भी यहां पर मनाई। यानी बड़े से बड़े त्यौहार भी श्री महाराज जी ने यहां पर मनाए। और श्री कृष्ण जन्माष्टमी की छठी तो अक्सर गोलोक धाम में ही हुई है। राधा अष्टमी की छठी यहीं पर मनाई जाती थी। अनंत चतुर्दशी का पर्व, रक्षाबंधन का पर्व, बहुत वर्षों तक गोलोक धाम में ही मनाया गया। और इतनी छोटी सी जगह होने पर भी महाराज जी ने यहां लीलाएं भी करवा ली। नरसिंह अवतार की लीला यहां पर हुई, जिसमें महाराज जी ने स्वयं नरसिंह अवतार का, यानी नरसिंह भगवान का रूप धारण किया। शबरी लीला भी यहीं पर हुई। भगवान राम के जन्म की लीला भी यहां पर हुई कि किस प्रकार से राजा दशरथ ने वरदान मांगा और कैसे उन्होंने पुत्रष्टि यज्ञ किया। वो सब लीलाएं भी यहां पर हुई। तुलसी लीला भी यहां पर हुई। यानी लीलाओं का रस भी श्री महाराज जी ने दिया। सारे त्यहारों को भी मनाकर हम लोगों को धन्य किया या इस स्थान को धन्य किया। वह तो वही जान सकते हैं। बस हमारे पास तो केवल एक ही शब्द है, कृपा। कृपा, कृपा, कृपा। यह उनकी अकारण कृपा है। तो यानी इसका इतिहास, गोलोक धाम का इतिहास, श्री महाराज जी की कृपा, करुणा, उनके प्रेम का इतिहास है। किस प्रकार से उन्होंने हम लोगों को भक्ति रस में डुबोया है, वह अवर्णनीय है। आज भी अगर हमारी दिव्य आंखें हो, तो हम देख सकते हैं किस प्रकार से यहां का कोना-कोना रस से भीगा हुआ है। लेकिन वह अधिकारी ही कोई हो, तभी देख सकता है। तो ऐसा स्थल यह महाराज जी की कृपा ही है। उनकी करुणा ही है। अकारण करुणा है। किसी का परिश्रम या किसी का संकल्प या किसी की साधना नहीं है। यह केवल उनकी कृपा का स्थान है। कृपा का स्थान ऐसा समझिएगा। गुरु कृपा का प्रत्यक्ष प्रमाण तो उन्हीं सब स्वर्णिम दिनों को याद करते हुए, जब महाराज जी आंगन में भी बैठ जाते थे। किस प्रकार से वहां पर महफिल होती थी। शेरो शायरी मंदिर में भी, आंगन में भी घंटों-घंटों महाराज जी बैठे हुए हैं। बातें हो रही हैं। सब लोग हंसी-मजाक हो रही है। किस प्रकार से बच्चों को अपने स्नेह पाठ में बांधकर महाराज जी ने आत्मीयता दी है। और कैसे उनको अध्यात्म।

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