लोगों की वैल्यूस गड़बड़ है। वो रुपए पैसे को संपत्ति मानते हैं, पोस्ट को संपत्ति मानते हैं, पावर प्रतिष्ठा को संपत्ति मानते हैं। लेकिन यह तो सब छोड़ने पड़ेंगे। इसलिए असली संपत्ति है भगवान की स्मृति। हमने कितनी मात्रा में अपने अंतःकरण को शुद्ध किया। लेकिन वो मन सदा लगा रहे, अव्यावत्त, अव्यावत्त भजनात।
नारद जी कहते हैं कि कुछ समय भजन करने से काम नहीं चलेगा। आपने दिन में एक घंटा भजन किया, मन भगवान में लगा, यह मन की शुद्धि हो गई। आपकी कमाई हुई, शेष समय आप मन को संसार में ले गए, संसार का चिंतन किए, मन मलिन हो गया, गवाही हो गई, लॉस हो गया। तो कमाई कर रहे हैं, साथ में गवाई कर रहे हैं। इससे वृद्धि नहीं होगी। अगर कोई प्रतिदिन ₹1 कमाए और ₹00 गवा दे, तो कहे मेरे तो महीने में 3000 हो गए, लेकिन लॉस कितना हुआ, इसको भी सोचो।
इसलिए श्री कृष्ण ने अर्जुन को कहा है, सर्वेशु कालेशु मा मनुस्मर। यह भजन कुछ कुछ समय नहीं, सर्वेशु कालेशु हर समय करना होगा। जैसे कंपास होता है, मैगनेट, वो हर समय उत्तर की ओर ही रहता है। ऐसे ही आपका मन भी सतत भगवान में लगे। सततम कीर्तयंतो माम योमा माम स्मरति नित्य तस्याह सुलभ पार्थ। नित्य युक्तस योगिन।
एक श्लोक में तीन बार कह रहे हैं कि नित्य अभियुक्त होना होगा, यानी मन भगवान में ही रहे। क्योंकि भगवान को भूले, तो फिर संसार है। और संसार जहां हावी हुआ, वहां पर काम, क्रोध, लोभ, मोह, यह माया के सेनापति, यह तैयार हैं आपके मन को गिरा देने के लिए। अगर आप इनसे बचना चाहते हैं, तो या तो यह झगड़ा करते जाएं, काम ना आए, क्रोध ना आए, लोभ ना आए, मोह ना आए। या तो आप अंधकार से झगड़ा करते रहें, या प्रकाश आ जाए। इस पर फोकस करें। तो आसान कौन सा है? आसान यह है कि प्रकाश आ जाए, अंधकार तो ऑटोमेटिक भागेगा।
अब यह मत सोचो, यह मत सोचो। क्यों नहीं अपने प्राण वल्लभ को सोचो। तो जहां उनको भूले, यही विपत्ति कह। हनुमंत विपत्ति प्रभु सोई, जब तब सुमिरन भजन न होई। हनुमान जी कहते हैं, प्रभु संसार में विपत्ति क्या है संपत्ति क्या है। लोगों की वैल्यूस गड़बड़ है। वह रुपए पैसे को संपत्ति मानते हैं, पोस्ट को संपत्ति मानते हैं, पावर प्रतिष्ठा को संपत्ति मानते हैं। लेकिन यह तो सब छोड़ने पड़ेंगे। असली संपत्ति जो है, हमने कितनी मात्रा में अपने अंतःकरण को शुद्ध किया। इसलिए असली संपत्ति है भगवान की स्मृति।
लेकिन वह मन सदा लगा रहे। सततम तेशाम सतत युक्त नाम भजता प्रीति पूर्वकम अनन्या चिंतयंतो मा जना परपासते। अनन्य चिंतन करना होगा भगवान का। तो तेशाम नित्याभ युक्त नाम योगक्षेम वहाम अहम। भगवान कहते हैं, ऐसे जीव का मैं ठेका लूंगा, ऐसे जीव का मैं योगक्षेम वहन करूंगा। अब श्री कृष्ण ने कहा, सदा मेरा स्मरण करो। नारद जी भी कह रहे हैं कि यह भजन अव्यावत होना चाहिए।
अब कोई कहे, साहब, ऐसा हम स्मरण कैसे करेंगे? हम संसारी कार्य भी करें और भगवान का स्मरण भी चलता रहे। इसके लिए एक सिद्धांत को समझना है और उस सिद्धांत का अभ्यास करना है। अह आत्मा गुेश सर्वभूताशय स्थित अर्जुन, मैं सब जीवों के हृदय में रहता हूं। तो बैठ के आप क्या करते हैं? भगवान जीवों के कर्मों को नोट करता हूं, पूर्व कर्मों का फल प्रदान करता हूं, तत कर्म करने की शक्ति देता हूं, कर्मों का हिसाब रखता हूं और शरणागति के अनुसार कृपा करता हूं। यह भगवान का निवास हमारे अंदर है। यह पहले हम समझें और फिर अभ्यास करते हुए इस स्मृति को अपनी चेतना में स्थापित करें।
यानि हम लोगों ने अभ्यास ये किया, मैं हूं, मैं हूं, मैं हूं। मैं सुखी हूं, मैं दुखी हूं, मैं बोल रहा हूं, मैं सुन रहा हूं, मैं चल रहा हूं, मैं बैठा हूं। मैं की अनुभूति हमको सदा रहती है। लेकिन मैं के पिता भगवान जो अंदर हैं, उनकी अनुभूति हमको नहीं रहती। तो ऑटोमेटिक नहीं आएगी। इसको लाना पड़ेगा, बार-बार सोच के, प्रैक्टिस करके। और जब बहुत कर लेंगे, तो एक दिन भगवान प्रत्यक्ष अनुभूति भी दे देंगे। देखो, मैं तो तुम्हारे साथ में था ही। लेकिन वहां तक पहुंचते-पहुंचते तो हमें प्रैक्टिस, अभ्यास करना। वो अभ्यास यही है कि यह मत सोचो, मैं अकेला हूं। यह सोचो कि मेरे अंशी, मेरे सर्वस्व, मेरे इष्ट देव मेरे साथ में।
तो जहां भी जाएं, ऑफिस जाएं, कुर्सी पर बैठे, सोचें श्री कृष्ण वहां पर हैं, राधा जी वहां पर हैं। एक साइड में अपने इष्ट देव को बिठा दें, दूसरी साइड में अपने गुरुदेव को बिठा दें। और उनको साक्षी मान के, उनको रक्षक मान के, उनको अपने कर्मों का भोगता, यानी सेव्य मान के। अब कर्म भगवत प्रीत्यर्थ करें। हम उनकी खुशी के लिए कर रहे हैं, तो हर कर्म से भक्ति होगी। लेकिन जब आप करेंगे, अभी आप कुशल कर्म योगी तो बने नहीं। इसलिए भगवान की विस्मृति हो जाएगी। तो घबराना नहीं। फिर एक घंटे के बाद फिर याद कर लिए, वह वहां पर है। फिर एक घंटे के बाद फिर याद कर लिए। ऐसे एक-एक घंटे में आप याद करते जाएं। हर फिर उसी अभ्यास को और बढ़ा दें। तो आधे-आधे घंटे में हो जाएं। और बढ़ाएं, तो फिर 20-20 मिनट में हो जाएं। ऐसे हमको अभ्यास करते-करते यहां तक पहुंचना है कि फीलिंग बनी रहे, वो सदा मेरे साथ में रहते।
तो नारद जी ने इसको बताया, अव्यावत्त भजनात भाई। देखो, यह जो तुमको भजन करना है, यह तेल की धारा के समान, वो टूटे नहीं। तब जाके भजन संपन्न होगा।
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