मन को मजा पसंद है जो श्रेष्ठ कार्य पर हमें ध्यान केंद्रित करना उसमें बोरियत लगती है और जो लो वैल्यू गतिविधि है उसमें मजा आता। तो मन कहता, "अरे, यह ऑफिस का प्रोजेक्ट रिपोर्ट, इस पर क्या ध्यान दें? हम उस चीज का चिंतन करें तो मजा आएगा।" और दूसरी है हमारे मस्तिष्क का नॉवेल्टी बायस। इसका मतलब क्या? जब हम एक चीज से दूसरी चीज की ओर जाते हैं तो मस्तिष्क को एक किक मिलता है, एक छोटा सा मजा आता है। अब आप एक कार्य कर रहे हैं, वहां आपके ईमेल की घंटी बजी, "अजी साहब, एक नया ईमेल आया है।" मन कहता है, "पढ़ लो ना, उसमें मजा आएगा।" तो वो जो मजा पाने की प्रवृत्ति है, वह हमारे ध्यान को भंग कर देती है।
संसार के कोलाहल में मन की एकाग्रता को बनाए रखना दिन प्रतिदिन कठिन होता चला जा रहा है क्योंकि संसार का स्वरूप ऐसा बन गया। आपको एक मीटिंग के बाद दूसरे में जाना पड़ता है, एक ईमेल के बाद दूसरे का उत्तर देना पड़ता है, एक WhatsApp मैसेज के बाद दूसरे को पढ़ना पड़ता है। परिणाम स्वरूप हमारा मन बिखर जाता है। तो कोई कार्य करने का श्रेष्ठ तरीका नहीं है। जी हां, यह है अपने फोकस की वृद्धि करना।
एक आश्रम में एक जैन मास्टर था, वो अपने विद्यार्थियों को आध्यात्मिक ट्रेनिंग भी देता था और साथ में शस्त्र विद्या भी सिखाता था। उसके विद्यार्थियों में एक था जो अभिमान से युक्त था क्योंकि उसको तीर कमान में इतनी कला प्राप्त थी कि एक तीर छोड़ के दूसरे तीर को पहले के पूंछ में मार पाता था और उसको दो भाग में कर देता था। तो गुरुजी विद्यार्थी को कहे, "चलो मेरे साथ।" पहाड़ की दो चोटियों के बीच में एक वृक्ष गिरा हुआ था। वे उस वृक्ष पर कूद गए। विद्यार्थी को कहा, "तुम भी आओ।" अब बैलेंस बताते हुए विद्यार्थी आता गया। गुरुजी हाथ में तीर कमान लिए और एक तीर छोड़ के दूसरे को उसकी पूंछ में मार के उसके दो भाग कर दिए। शिष्यों को कहा, "तू तो करता है, अब कर।" शिष्य पसीना-पसीना हो गया। उसने ट्राई तो किया किंतु सफलता नहीं मिली। गुरुजी ने कहा, "बात क्या है? कारण यह है कि यहां पर अब तेरा ध्यान भंग हो गया है। एक ओर मन इस बात पर विचार कर रहा है, 'कहीं गिर ना जाऊं।' दूसरी ओर निशाने पर।"
तो एकाग्रता का मतलब हम अपने मन को वांछित विषय पर एक्सटेंडेड समय तक रख सकें। हम जिस चीज का ध्यान करते हैं और जिस क्वालिटी का ध्यान करते हैं, इस पर हमारे जीवन की क्वालिटी निर्भर करती है। ध्यान के बारे में तो हमें अर्जुन से ही प्रेरणा लेनी चाहिए। गुरु द्रोणाचार्य ने जब कौरवों-पांडवों की परीक्षा ली, सबको लाइन से लगा दिया एवं कहा, "देखो, वह वृक्ष पर एक पक्षी बैठा है, उसकी आंख पर निशाना बांधो।" सब ने निशाना बांधा। द्रोणाचार्य ने पूछा, "भीमसेन, क्या दिख रहा है?" उसने कहा, "गुरुदेव, वृक्ष, पक्षी और उसकी आंख।" युधिष्ठिर, तुमको क्या दिख रहा है? युधिष्ठिर ने कहा, "गुरुदेव, पक्षी और उसकी आंख।" दुर्योधन, क्या देख रहे हो? दुर्योधन ने कहा, "गुरुदेव, वह पक्षी तो दिखता, बीच-बीच में भीमसेन भी दिख जाता।" वो द्वेष से भरा हुआ था। अर्जुन, तुझे क्या दिख रहा है? अर्जुन ने कहा, "गुरुवर, आंख, आंख, आंख।" अर्जुन जीत गया, उसका मन इतना एकाग्र था।
तो यह एकाग्रता हम क्यों नहीं बना पाते? इसमें दो प्रमुख समस्याएं आती हैं। एक तो हमारे मन की भोग प्रवृत्ति। मन को मजा पसंद है जो श्रेष्ठ कार्य पर हमें ध्यान केंद्रित करना उसमें बोरियत लगती है और जो लो वैल्यू गतिविधि है उसमें मजा आता। तो मन कहता, "अरे, यह ऑफिस का प्रोजेक्ट रिपोर्ट, इस पर क्या ध्यान दें? हम उस चीज का चिंतन करें तो मजा आएगा।" और दूसरी है हमारे मस्तिष्क का नोवेल्टी बायस। इसका मतलब क्या? जब हम एक चीज से दूसरी चीज की ओर जाते हैं तो मस्तिष्क को एक किक मिलता है, एक छोटा सा मजा आता है। अब आप एक कार्य कर रहे हैं, वहां आपके ईमेल की घंटी बजी, "अजी साहब, एक नया ईमेल आया है।" मन कहता है, "पढ़ लो ना, उसमें मजा आएगा।" तो वो जो मजा पाने की प्रवृत्ति है, वह हमारे ध्यान को भंग कर देती है।
और आजकल के संसार के डिजिटल एज में हम लोग बोरियत को तो भूल ही गए हैं क्योंकि मजा हमारे हाथ के निकट, वो मोबाइल में, वो कंप्यूटर में। जहां बोर होने लगे, एक क्लिक करो और आपको एंटरटेनमेंट मिल जाता है। लेकिन याद रखें, जब आप लो वैल्यू गतिविधि को हां बोलते हैं, तो आप हाई वैल्यू गतिविधि को ना बोल रहे हैं क्योंकि समय तो आपके पास इतना ही है।
एक बार स्वामी विवेकानंद एक योगी के साथ परामर्श करते हुए चल रहे थे। सामने नदी आई। योगी के पास सिद्धि थी, उसने अपने पैर नदी के जल पर रखे और चलता गया। कुछ कदम लेकर पीछे मुड़ा और स्वामी जी से कहा, "आइए।" स्वामी जी ने कहा, "नहीं।" वहां पर एक नाव खड़ी थी। वे नाविक को दो पैसे दिए और उसने पार करा दिया। दूसरी ओर जब पहुंचे, योगी ने कहा, "आपने क्या साधना की? आप पानी पर चल नहीं पाते।" स्वामी जी ने कहा, "इस सिद्धि के लिए तुमने कितना समय खर्च किया?" योगी ने कहा, "15 वर्ष।" स्वामी जी ने कहा, "तुमने जो 15 वर्ष लगाए, उसी कार्य को मैंने दो पैसे में कर दिया। नाविक को 2 पैसे देकर। तो उसका लाभ क्या हुआ?" इसी प्रकार से अगर कोई आपका समय व्यर्थ गवाना चाहे, आप सावधान हो जाइए। क्यों? मान लो कि आप एक महीने में ₹1 लाख कमाते हैं। इसका मतलब अगर प्रतिदिन 8 घंटे काम कर रहे हैं, एक मास तो 1 घंटे में आपकी कमाई है ₹600। इसका मतलब 1 मिनट में आपकी कमाई है ₹10। किसी ने आके निरर्थक आपसे बातचीत कर ली, 10 मिनट खर्च कर लिए, तो उसने आपके ₹1 आपसे ले लिए। क्यों? निरर्थक इस प्रकार से बर्बाद करें। अतः अपने समय के बारे में कंजूस बने। इसी प्रकार से अपनी एकाग्रता को बनाए रखें और बीच-बीच में थोड़ा सा डिटॉक्स भी कर लीजिए।
क्या मतलब? अब मोबाइल तो साथ में रहता ही है, किंतु रात्रि 8:00 बजे से सुबह 8:00 बजे तक उसे फ्लाइट मोड में डाल दीजिए। आप संसार आपको डिस्टर्ब ना कर पाए। उस समय आप अपनी एकाग्रता को उपार्जित करते चले जाएं। तो याद रखें, जितना आप अपने मन को एकाग्र कर पाएंगे और जिस विषय पर आप अपना ध्यान केंद्रित करेंगे, उसके आधार पर आपके जीवन की क्वालिटी, आपकी सफलता और आपके भीतर का आनंद निर्भर करेगा। तो अपने जीवन को स्वर्णिम बनाने हेतु कुछ उपयोगी बातें हम समझ रहे हैं इस श्रृंखला "गोल्डन रूल्स फॉर लिविंग योर बेस्ट लाइफ" के अंतर्गत।
No comments:
Post a Comment