जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज जी की कथा : Raseshwari Devi Ji

 महाराज जी ने क्लास फोर तक गांव में पढ़ाई की। वो पढ़ते कम थे, खेलते ज्यादा थे। महाराज जी के बड़े भाई वह महू के संस्कृत विद्यालय के प्रिंसिपल थे। तो भगवती मैया ने महाराज जी को कहा कि मैं नहीं चाहती कि तुम पढ़ाई छोड़ो, इसीलिए तुमको मैं तुम्हारे बड़े भाई के पास भेज रही हूं। तुम वहां पढ़ाई करोगे और महाराज जी वहां चले गए। क्लास में पढ़ाई कर रहे थे, उस समय महाराज जी की उम्र थी 12 साल। पढ़ रहे थे कक्षा में, लेकिन मन नहीं लगता था। तो कुछ सहपाठी उनके कुछ दोस्त बने। तो उन दोस्तों में वह यह कहते थे कि यह असली विद्या नहीं है, यह पेट पालू विद्या है। इस विद्या से क्या होगा? मुझे असली विद्या पानी है। और फिर एक-दो दोस्तों को कहते थे कि असली विद्या है उपासना भजन। मुझे कृष्ण को पाना है और मुझे कृष्ण का भजन करना है।

तो एक दोस्त को मना लिया और उसको बोले कि चलो, अपन चलते हैं पहाड़ी पर। तो अपने दोस्त को ले गए और साथ में थोड़ा नाश्ता बांध के दोस्त ले गया। जबकि दोस्त को इन्होंने कहा कि हरि भजन के लिए चल रहे हो मेरे साथ, साथ में कुछ मत लेना। लेकिन दोस्त ने सोचा कि नहीं, थोड़ा सा कुछ ले लेता हूं खाने के लिए। तो वो पोटली बांध के वो चल पड़े। इसी बीच 11-12 साल जो है, महाराज जी के उस समय तक महाराज जी का विवाह हो चुका था क्योंकि उस समय बाल विवाह की रीति थी। तो अम्मा जो थी, वो छह साल की थी और महाराज जी 11 साल के थे और पढ़ाई कर रहे थे। अम्मा अपने गांव में थी, छोटी सी छह साल की। तो इधर महाराज जी अपने दोस्त के साथ पहाड़ी पर चले गए।

उसको लेकर और पहाड़ी से नीचे तलहटी पर एक शिव मंदिर था। और उस शिव मंदिर में तीन कुंड थे। तो सबसे बड़ा कुंड जो था, वह आकंठ पानी से भरा हुआ था। कंठ तक महाराज जी ने क्या किया, उस कुंड में चले गए और एक पैर पर खड़े होकर अपने मित्र से कहते हैं कि मैं अब तपस्या में जा रहा हूं और तुम प्रतीक्षा करो। तो दोस्त ने सोचा थोड़ी देर में निकल आएगा, खेल कर रहा है। लेकिन महाराज जी एक पैर पर खड़े होकर तपस्या करने लगे। रात्रि हो गई, अब तो डर लगे उसको। जंगल पूरा तो डर के मारे वह जो सहपाठी, जो दोस्त था, उसने टांगा, वह खाने की पोटली टांगी और भाग के चला गया। महाराज जी वहां अकेले रहे। तीन दिन बीत गए। अब तीन दिन के बाद महाराज जी के जो भाई, वो देखते हैं कि क्लास में राम कृपाल नहीं दिखता। तो दोस्तों से पूछा, तो एक ही दोस्त को पता था। वह कतरा रहा है, पिटाई पड़ जाएगी। तो उन्हीं से पूछा, सच-सच बताओ, कहां है राम कृपाल? तो बता दिया उसने सच-सच कि हम ऐसे गए थे और वह वहां पर हैं।

तो महाराज जी के बड़े भाई ने कहा कि तुम खुद जाओ और उसको बुलाकर लाओ। उसने कहा, मेरे कहने से वह नहीं आने वाले। ये खुद गए गए और श्री महाराज जी को आवाज लगाई, कुछ नहीं सुन रहे। फिर उन्होंने कहा, अच्छा राम कृपाल, तू अपनी यह समाधि को तोड़। तुझे क्या पता नहीं है, तेरा विवाह हो गया है, तेरे कुछ कर्तव्य हैं, तेरे को जाना है गांव। जब बार-बार बोले, तो महाराज जी की समाधि टूटी, बाहर आए। तो महाराज जी ने अपने बड़े भाई से कहा, मैं अपने कर्तव्य ठीक-ठीक करूंगा। लेकिन अम्मा का नाम लेकर बोले कि उनके पिता से कह दो कि मैं जगत के खातिर जो करना चाहूंगा, उसमें बाधा नहीं बनेंगे। इन्होंने कहा, अच्छा बाबा, उनकी तरफ से मैं हां कहता हूं। तू बाहर तो आ। तो बाहर आए। लेकिन अम्मा के जो पिताजी के पिताजी, यानी नाना, अम्मा के जो नाना थे, वो एस्ट्रोलॉजर थे, बहुत बड़े। तो उन्होंने महाराज जी के उस जातक कहते हैं ना पत्रिका जो होती है, उसको देख लिया था। और उन्होंने उस पत्रिका को देखकर यह कह दिया था कि यह देव पुरुष है, साधारण नहीं है।

तो इसीलिए बड़े भाई को पता था कि वह मान जाएंगे क्योंकि उनको पता था। और वह मान भी गए। पूरी लाइफ, पूरी लाइफ अम्मा और अम्मा के परिवार वालों ने महाराज जी के आध्यात्मिक किसी कार्य में किसी प्रकार की बाधा नहीं डाली। तो इस प्रकार से महाराज जी को वापस ले आए, जहां समाधि में वह गए थे, वहां से वापस लाए। और बड़े भाई ने कहा कि तुम पढ़ाई आगे करो। एक दिन रात के 2 बजे महाराज जी पढ़ाई कर रहे थे। बड़े भाई टॉयलेट के लिए उठे, तो देखा कि राम कृपाल पढ़ रहा है। तो उन्होंने कहा, अरे अब पढ़ाई बंद कर दो। इतना ही कहा। तो वो मीन कर रहे थे कि अभी रात 2 बज गए, पढ़ाई बंद करो, सो जाओ। महाराज जी ने पता क्या किया, उन्होंने परमानेंट बंद कर दिया। उन्होंने कहा, अब पढ़ाई बंद कर दो। अब पढ़ाई बंद कर दो। उन्होंने कहा, ठीक है। वह किताब बंद की और जो शर्ट टंगी थी, पहने बैग लिया और घर से निकल गए। घर छोड़ दिया, महू से निकले और चित्रकूट आ गए।

अचानक से एक व्यक्ति आया सामने। तो वह व्यक्ति जो है, महाराज जी के सामने ही देखते-देखते विशाल काय हो गया। इतना ऊंचा, लंबा, बड़े-बड़े हाथ उसके और वह विराट सा। और महाराज जी को डराने लगा। उसके रोम ऐसे खड़े थे पूरा और महाराज जी को डराने लगा। महाराज जी शांत पेड़ के नीचे बैठे हैं और महाराज जी को डरा रहा है। महाराज जी पर कोई असर नहीं। रात्रि हो गई, अब वो डरा-भरा के उसने देखा इन पर तो कोई असर नहीं हो रहा। वह वापस चला गया, अपने गुरु के पास गया। तो उसके गुरु को उसने जब सारी चीजें बताई, तो गुरु ने कहा, अरे वह तो कोई बहुत पहुंचा हुआ है। तूने तो अपराध कर दिया। ऐसा कर, दोबारा जा, जा उनके पास और उनसे दंड प्रणाम करके क्षमा मांग ले। और कोई उपाय नहीं है। फिर आया, साष्टांग हुआ और महाराज जी से क्षमा मांगी। 15 साल के महाराज जी हैं और यह व्यक्ति साष्टांग करके क्षमा मांग रहा है। महाराज जी ने कहा, देखो, तुम्हारे गुरु ने तुम्हें सही कहा है। और मैं तुम्हें यह आज्ञा देता हूं कि यह तंत्र विद्या आदि को त्यागो। यह सारी विद्याओं से तुम्हें परम सुख नहीं मिलेगा। यह विद्या तुम्हारा ही नाश कर देंगी। इसलिए यदि मुझे मानते हो, तो मैं यह आज्ञा देता हूं कि अभी तुरंत इसी समय उल्टे पांव वृंदावन की ओर चले जाओ। हां, जब कभी मेरी सहायता की आवश्यकता पड़ेगी, तो मैं हमेशा तुम्हारे लिए उपस्थित हूं। लेकिन वृंदावन जाना तो अपने यह तांत्रिक विद्याओं को फेंक कर जाना। और वृंदावन में दैन्य भाव से हरि को पुकारना। और वृंदावन में यह भाव रखना कि वृंदावन स्वयं श्याम सुंदर है। यह वह भूमि है, पावन भूमि, जहां श्याम सुंदर ने नंगे पांव ब्रह्म ने नंगे पांव गाय चराई है। इसलिए ब्रजधाम की धूली में अभिषिक्त होना लौटना, यह मेरी आज्ञा।

और वह व्यक्ति चला गया। इसके बाद महाराज जी वहां से उठे, आगे बढ़े। आगे बढ़ते-बढ़ते सरभ मुनि के आश्रम की ओर पहुंच गए। उन दिनों सरभ मुनि के आश्रम के आसपास शेर-चीते हुआ करते थे। अब तो रास्ता है। आप लोग को कभी मैं चित्रकूट लेकर जाऊं, तो उस सरभ मुनि के आश्रम के पास में एक छोटी सी कुटिया है। अब तो वह सीमेंटेड हो गई है। उसमें लिखा हुआ है कृपालु जी महाराज की साधना स्थली। व सरभ मुनि के आश्रम के आसपास थे। वहीं पर उहे छोटी सी कुटिया के बाहर एक बाबा मिला और बड़ा विचित्र बाबा। वह क्या कर रहा था? उसके पास एक टूटी हुई कंगी थी और एक टूटा हुआ दर्पण था। टूटे हुए दर्पण से वह केवल अपने आप को कंघी करता था, संवारता था। और उसके पश्चात रोने लगता था। महाराज जी पहुंचे और देखने लगे, ये तो बड़ी विचित्र साधना है। यह कर क्या रहा है? तो महाराज जी चुपचाप बैठ के देखने लगे। फिर पूछा, जब उसका रुदन बंद हुआ, तो बाबा से पूछा कि बाबा, तुम रो क्यों रहे हो? थोड़ी दूर बैठे थे महाराज जी। तो वह कहता है, रो-रोकर। महाराज जी ने पूछा, अरे ये टूटे कंग से और यह टूटे शीशे दर्पण से क्या कर रहे हो? तो बोले, देखो, वो मेरा प्रियतम जो है ना, पता नहीं कब आ जाए। और वह आए और मैं उनको मैली कुचली मिलू। यह अच्छी बात थोड़ी है। इसीलिए मैं हमेशा अपने आप को संवार रहती हूं ताकि वो जब आए, तो उसको सुख मिले। लेकिन क्या बताऊं, प्राकृत कर-कर के हार गई हूं। अभी तक श्याम सुंदर नहीं आए, कब आएंगे, कब आएंगे। ऐसे करते-करते चीखा वो बाबा। चीखा और उसने महाराज जी को पकड़ लिया। अब जब महाराज जी को पकड़ा, तो चिपट-चिपटा लिया महाराज जी को। अब कहने लगा, मिल गए, मिल गए, मिल गए। महाराज जी ने ना धीरे से नीचे से खिसक के दौड़ के चले गए महाराज जी। और जब उसको होश आई, तो खोजने लगा। लेकिन महाराज जी वहां नहीं थे।

इसके बाद बस इसी घटना के बाद महाराज जी उस कुटिया में प्रवेश कर गए। दो दिन तक बिना कुछ खाए-पिए सोए। क्या हुआ, कुछ नहीं मालूम। जो अंदर गए, तो दो दिन के बाद जब बाहर आए, तो एक बहुत बड़ा परिवर्तन, एक महान परिवर्तन, एक महान ट्रांसफॉर्मेशन। अब वो महाराज जी नहीं थे। अब तो यह महाप्रभु के स्वरूप में थे। घुंघराले केश, शरीर पर मात्र कहने को वस्त्र परिधान और अजान लंबित भुजाएं, ऊंचे लंबे दुबले-पतले। बस चेहरा देदीप्यमान और वाणी से केवल वो मधुर स्त्रावी वाणी, "हा कृष्ण, हा कृष्ण" और महाराज जी एक ही कीर्तन गाते थे, "भजो गिरिधर गोविंद गोपाला, भजो मुरली मनोहर नंदलाला।" यही कीर्तन श्री महाराज जी अपने साधना अवस्था में गाया करते थे। और फिर बीच-बीच में "हा कृष्ण, हा कृष्ण" कह के मूर्छित होकर गिर जाते थे। यह अवस्था से निकले और इस अवस्था के बाद फिर मैंने आप लोगों को बताया ही था। फिर श्री महाराज जी वृंदावन पहुंचे। फिर वृंदावन से मथुरा के कुछ लोग श्री महाराज जी को मथुरा ले गए। फिर मथुरा में जब पहुंचे, तो श्री महाराज जी को स्नान वगैरह कराया गया। महाराज जी की मूछें थीं, लंबे लंबे केश थे। तो उन सबने महाराज जी को पहले तो स्नान कराया और एक नाई बुलाया। तो जब नाई को बुलाया, तो पता नहीं था। नाई ने पूछ लिया महाराज जी से, "कैसा काटू बाल?" तो महाराज जी को बोले, "तेरी जैसी इच्छा।" अब उस समय जैसे आजकल आप लोग का है ना, ये इंग्लिश कटिंग। अंग्रेजों के जमाने से यही कटिंग चल रही है। तो उस समय वो नाई ने कह दिया, "अंग्रेजी कटिंग कर दूं।" तो महाराज जी को क्या अंग्रेजी और क्या देसी। और कुछ महाराज जी ने कहा, "तेरी जो इच्छा।" तो इतने-इतने बाल काट दिए। सारे लंबे बाल काट दिए। महाराज जी के इतने-इतने बाल। और उतने बालों में ही श्री महाराज जी ने अपना प्रचार "हरे राम" कीर्तन गाना शुरू किया। महाराज जी सफेद कपड़े पहनते थे, कुर्ता और धोती। उस समय लोग उनको पंडित जी कहते थे क्योंकि बंगाली कुर्ता और बंगाली धोती बहुत पसंद थी श्री महाराज जी को। तो उस समय लोग उनको पंडित जी कहते थे और महाराज जी "हरे राम" का संकीर्तन कराते थे। और जब संकीर्तन कराते थे, तो भाव-वेश में आ जाते थे। महाराज जी महाप्रभु के ही अवतार हैं। इसका प्रमाण यहां से मिलता है कि जब श्री महाराज जी को आवेश आता था, अष्ट सात्विक भाव, तो उस समय महाराज जी "हरेराम" गाना भी छोड़ देते थे। और दोनों अपनी भुजाओं को उठा के "हरि हरि बोल बोल हरि बोल" यह कहना शुरू करते। तो "हरि हरि बोल" जो है, यह गौरांग महाप्रभु जी ने उनका ही अवदान है। यह "हरि बोल" वैसे तो वह संकीर्तन के प्रवर्तक हैं। इससे पहले।

source : Raseshwari Devi Ji Youtube Channel





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