मेरे नैनन तारे जाग रे।
भई भोर चहुँ ओर शोर सुन, बोलत शुक पिक काग रे।
शीतल-मंद-सुगंध पवन बह, चकई पाइ सुहाग रे।
आई भानु-किरन लखु मोहन, चंद्र-किरन गई भाग रे।
उदित-भानु लखि विकसित कमलनि, भ्रमरन पियत पराग रे।
दोउ कर परसि ‘कृपालु’ मातु मुख, चूमति अति अनुराग रे।।
भावार्थ:- सोते हुए श्यामसुन्दर को जगाती हुई मैया कहती है कि हे मेरे आँखों के तारे श्यामसुन्दर! जागो। देखो तो सवेरा हो गया। चारों ओर तोते, कोयल एवं कौवे शोर कर रहे हैं। शीतल, मंद, सुगन्धित वायु बह रही है। रात भर की बिछुड़ी हुई चकई, चकवे से मिल रही है। सूर्य की किरणें फैल रही हैं। चन्द्रमा की किरणें समाप्त हो रही हैं। सूर्योदय होने से खिले हुए कमलों पर गुंजार करते हुए भौंरे पराग रस पी रहे हैं।
‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में मैया इस प्रकार कहती हुई प्रेम विभोर हो कर अपने दोनों हाथों से श्यामसुन्दर का मुख स्पर्श कर चूमकर बार-बार बलिहार जा रही है।
🌷प्रेमरस मदिरा श्रीकृष्णबाललीला-माधुरी🌷
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज🌷🌷
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