नहि बिसरत सखि, छैल बिहारी।
जित देखूँ तित वोही वोही दीखत,
हाय!ये कैसी मोहिनि डारी।
मोर मुकुट सिर पेच रतन को,
हलकैं मुख अलकें घुँघरारी।
चंचल नैन मैन मद गंजन,
तामें अंजन रेखु सँवारी।
कुंडल लोल हलनि श्रवनन में,
अधर धरि मुरली धुनि प्यारी।
नाक बुलाक भृकुटि वर बॉकी,
गोल कपोलनि की छवि प्यारी।
उर विशाल वनमाल विराजत,
गुंजमाल मोतिन माला री।
मणिमय वलय युगल कर सोहे,
कटि किंकिनि पीताम्बर धारी।
गरल सुधा मदमइ दृग चितवनि,
करत फिरत जादू टोना री।
बजत चरन छूम छ्ननन नूपुर,
ताहू पर मुसकावति भारी।
अब 'कृपालु' मम लगत न पलकें,
देखि अनूपम रूप बिहारी।
🌷ब्रज रस माधुरी-१🌷
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज🌷🌷
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