जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज जी की कथा : Raseshwari Devi Ji

 महाराज जी ने क्लास फोर तक गांव में पढ़ाई की। वो पढ़ते कम थे, खेलते ज्यादा थे। महाराज जी के बड़े भाई वह महू के संस्कृत विद्यालय के प्रिंसिपल थे। तो भगवती मैया ने महाराज जी को कहा कि मैं नहीं चाहती कि तुम पढ़ाई छोड़ो, इसीलिए तुमको मैं तुम्हारे बड़े भाई के पास भेज रही हूं। तुम वहां पढ़ाई करोगे और महाराज जी वहां चले गए। क्लास में पढ़ाई कर रहे थे, उस समय महाराज जी की उम्र थी 12 साल। पढ़ रहे थे कक्षा में, लेकिन मन नहीं लगता था। तो कुछ सहपाठी उनके कुछ दोस्त बने। तो उन दोस्तों में वह यह कहते थे कि यह असली विद्या नहीं है, यह पेट पालू विद्या है। इस विद्या से क्या होगा? मुझे असली विद्या पानी है। और फिर एक-दो दोस्तों को कहते थे कि असली विद्या है उपासना भजन। मुझे कृष्ण को पाना है और मुझे कृष्ण का भजन करना है।

तो एक दोस्त को मना लिया और उसको बोले कि चलो, अपन चलते हैं पहाड़ी पर। तो अपने दोस्त को ले गए और साथ में थोड़ा नाश्ता बांध के दोस्त ले गया। जबकि दोस्त को इन्होंने कहा कि हरि भजन के लिए चल रहे हो मेरे साथ, साथ में कुछ मत लेना। लेकिन दोस्त ने सोचा कि नहीं, थोड़ा सा कुछ ले लेता हूं खाने के लिए। तो वो पोटली बांध के वो चल पड़े। इसी बीच 11-12 साल जो है, महाराज जी के उस समय तक महाराज जी का विवाह हो चुका था क्योंकि उस समय बाल विवाह की रीति थी। तो अम्मा जो थी, वो छह साल की थी और महाराज जी 11 साल के थे और पढ़ाई कर रहे थे। अम्मा अपने गांव में थी, छोटी सी छह साल की। तो इधर महाराज जी अपने दोस्त के साथ पहाड़ी पर चले गए।

उसको लेकर और पहाड़ी से नीचे तलहटी पर एक शिव मंदिर था। और उस शिव मंदिर में तीन कुंड थे। तो सबसे बड़ा कुंड जो था, वह आकंठ पानी से भरा हुआ था। कंठ तक महाराज जी ने क्या किया, उस कुंड में चले गए और एक पैर पर खड़े होकर अपने मित्र से कहते हैं कि मैं अब तपस्या में जा रहा हूं और तुम प्रतीक्षा करो। तो दोस्त ने सोचा थोड़ी देर में निकल आएगा, खेल कर रहा है। लेकिन महाराज जी एक पैर पर खड़े होकर तपस्या करने लगे। रात्रि हो गई, अब तो डर लगे उसको। जंगल पूरा तो डर के मारे वह जो सहपाठी, जो दोस्त था, उसने टांगा, वह खाने की पोटली टांगी और भाग के चला गया। महाराज जी वहां अकेले रहे। तीन दिन बीत गए। अब तीन दिन के बाद महाराज जी के जो भाई, वो देखते हैं कि क्लास में राम कृपाल नहीं दिखता। तो दोस्तों से पूछा, तो एक ही दोस्त को पता था। वह कतरा रहा है, पिटाई पड़ जाएगी। तो उन्हीं से पूछा, सच-सच बताओ, कहां है राम कृपाल? तो बता दिया उसने सच-सच कि हम ऐसे गए थे और वह वहां पर हैं।

तो महाराज जी के बड़े भाई ने कहा कि तुम खुद जाओ और उसको बुलाकर लाओ। उसने कहा, मेरे कहने से वह नहीं आने वाले। ये खुद गए गए और श्री महाराज जी को आवाज लगाई, कुछ नहीं सुन रहे। फिर उन्होंने कहा, अच्छा राम कृपाल, तू अपनी यह समाधि को तोड़। तुझे क्या पता नहीं है, तेरा विवाह हो गया है, तेरे कुछ कर्तव्य हैं, तेरे को जाना है गांव। जब बार-बार बोले, तो महाराज जी की समाधि टूटी, बाहर आए। तो महाराज जी ने अपने बड़े भाई से कहा, मैं अपने कर्तव्य ठीक-ठीक करूंगा। लेकिन अम्मा का नाम लेकर बोले कि उनके पिता से कह दो कि मैं जगत के खातिर जो करना चाहूंगा, उसमें बाधा नहीं बनेंगे। इन्होंने कहा, अच्छा बाबा, उनकी तरफ से मैं हां कहता हूं। तू बाहर तो आ। तो बाहर आए। लेकिन अम्मा के जो पिताजी के पिताजी, यानी नाना, अम्मा के जो नाना थे, वो एस्ट्रोलॉजर थे, बहुत बड़े। तो उन्होंने महाराज जी के उस जातक कहते हैं ना पत्रिका जो होती है, उसको देख लिया था। और उन्होंने उस पत्रिका को देखकर यह कह दिया था कि यह देव पुरुष है, साधारण नहीं है।

तो इसीलिए बड़े भाई को पता था कि वह मान जाएंगे क्योंकि उनको पता था। और वह मान भी गए। पूरी लाइफ, पूरी लाइफ अम्मा और अम्मा के परिवार वालों ने महाराज जी के आध्यात्मिक किसी कार्य में किसी प्रकार की बाधा नहीं डाली। तो इस प्रकार से महाराज जी को वापस ले आए, जहां समाधि में वह गए थे, वहां से वापस लाए। और बड़े भाई ने कहा कि तुम पढ़ाई आगे करो। एक दिन रात के 2 बजे महाराज जी पढ़ाई कर रहे थे। बड़े भाई टॉयलेट के लिए उठे, तो देखा कि राम कृपाल पढ़ रहा है। तो उन्होंने कहा, अरे अब पढ़ाई बंद कर दो। इतना ही कहा। तो वो मीन कर रहे थे कि अभी रात 2 बज गए, पढ़ाई बंद करो, सो जाओ। महाराज जी ने पता क्या किया, उन्होंने परमानेंट बंद कर दिया। उन्होंने कहा, अब पढ़ाई बंद कर दो। अब पढ़ाई बंद कर दो। उन्होंने कहा, ठीक है। वह किताब बंद की और जो शर्ट टंगी थी, पहने बैग लिया और घर से निकल गए। घर छोड़ दिया, महू से निकले और चित्रकूट आ गए।

अचानक से एक व्यक्ति आया सामने। तो वह व्यक्ति जो है, महाराज जी के सामने ही देखते-देखते विशाल काय हो गया। इतना ऊंचा, लंबा, बड़े-बड़े हाथ उसके और वह विराट सा। और महाराज जी को डराने लगा। उसके रोम ऐसे खड़े थे पूरा और महाराज जी को डराने लगा। महाराज जी शांत पेड़ के नीचे बैठे हैं और महाराज जी को डरा रहा है। महाराज जी पर कोई असर नहीं। रात्रि हो गई, अब वो डरा-भरा के उसने देखा इन पर तो कोई असर नहीं हो रहा। वह वापस चला गया, अपने गुरु के पास गया। तो उसके गुरु को उसने जब सारी चीजें बताई, तो गुरु ने कहा, अरे वह तो कोई बहुत पहुंचा हुआ है। तूने तो अपराध कर दिया। ऐसा कर, दोबारा जा, जा उनके पास और उनसे दंड प्रणाम करके क्षमा मांग ले। और कोई उपाय नहीं है। फिर आया, साष्टांग हुआ और महाराज जी से क्षमा मांगी। 15 साल के महाराज जी हैं और यह व्यक्ति साष्टांग करके क्षमा मांग रहा है। महाराज जी ने कहा, देखो, तुम्हारे गुरु ने तुम्हें सही कहा है। और मैं तुम्हें यह आज्ञा देता हूं कि यह तंत्र विद्या आदि को त्यागो। यह सारी विद्याओं से तुम्हें परम सुख नहीं मिलेगा। यह विद्या तुम्हारा ही नाश कर देंगी। इसलिए यदि मुझे मानते हो, तो मैं यह आज्ञा देता हूं कि अभी तुरंत इसी समय उल्टे पांव वृंदावन की ओर चले जाओ। हां, जब कभी मेरी सहायता की आवश्यकता पड़ेगी, तो मैं हमेशा तुम्हारे लिए उपस्थित हूं। लेकिन वृंदावन जाना तो अपने यह तांत्रिक विद्याओं को फेंक कर जाना। और वृंदावन में दैन्य भाव से हरि को पुकारना। और वृंदावन में यह भाव रखना कि वृंदावन स्वयं श्याम सुंदर है। यह वह भूमि है, पावन भूमि, जहां श्याम सुंदर ने नंगे पांव ब्रह्म ने नंगे पांव गाय चराई है। इसलिए ब्रजधाम की धूली में अभिषिक्त होना लौटना, यह मेरी आज्ञा।

और वह व्यक्ति चला गया। इसके बाद महाराज जी वहां से उठे, आगे बढ़े। आगे बढ़ते-बढ़ते सरभ मुनि के आश्रम की ओर पहुंच गए। उन दिनों सरभ मुनि के आश्रम के आसपास शेर-चीते हुआ करते थे। अब तो रास्ता है। आप लोग को कभी मैं चित्रकूट लेकर जाऊं, तो उस सरभ मुनि के आश्रम के पास में एक छोटी सी कुटिया है। अब तो वह सीमेंटेड हो गई है। उसमें लिखा हुआ है कृपालु जी महाराज की साधना स्थली। व सरभ मुनि के आश्रम के आसपास थे। वहीं पर उहे छोटी सी कुटिया के बाहर एक बाबा मिला और बड़ा विचित्र बाबा। वह क्या कर रहा था? उसके पास एक टूटी हुई कंगी थी और एक टूटा हुआ दर्पण था। टूटे हुए दर्पण से वह केवल अपने आप को कंघी करता था, संवारता था। और उसके पश्चात रोने लगता था। महाराज जी पहुंचे और देखने लगे, ये तो बड़ी विचित्र साधना है। यह कर क्या रहा है? तो महाराज जी चुपचाप बैठ के देखने लगे। फिर पूछा, जब उसका रुदन बंद हुआ, तो बाबा से पूछा कि बाबा, तुम रो क्यों रहे हो? थोड़ी दूर बैठे थे महाराज जी। तो वह कहता है, रो-रोकर। महाराज जी ने पूछा, अरे ये टूटे कंग से और यह टूटे शीशे दर्पण से क्या कर रहे हो? तो बोले, देखो, वो मेरा प्रियतम जो है ना, पता नहीं कब आ जाए। और वह आए और मैं उनको मैली कुचली मिलू। यह अच्छी बात थोड़ी है। इसीलिए मैं हमेशा अपने आप को संवार रहती हूं ताकि वो जब आए, तो उसको सुख मिले। लेकिन क्या बताऊं, प्राकृत कर-कर के हार गई हूं। अभी तक श्याम सुंदर नहीं आए, कब आएंगे, कब आएंगे। ऐसे करते-करते चीखा वो बाबा। चीखा और उसने महाराज जी को पकड़ लिया। अब जब महाराज जी को पकड़ा, तो चिपट-चिपटा लिया महाराज जी को। अब कहने लगा, मिल गए, मिल गए, मिल गए। महाराज जी ने ना धीरे से नीचे से खिसक के दौड़ के चले गए महाराज जी। और जब उसको होश आई, तो खोजने लगा। लेकिन महाराज जी वहां नहीं थे।

इसके बाद बस इसी घटना के बाद महाराज जी उस कुटिया में प्रवेश कर गए। दो दिन तक बिना कुछ खाए-पिए सोए। क्या हुआ, कुछ नहीं मालूम। जो अंदर गए, तो दो दिन के बाद जब बाहर आए, तो एक बहुत बड़ा परिवर्तन, एक महान परिवर्तन, एक महान ट्रांसफॉर्मेशन। अब वो महाराज जी नहीं थे। अब तो यह महाप्रभु के स्वरूप में थे। घुंघराले केश, शरीर पर मात्र कहने को वस्त्र परिधान और अजान लंबित भुजाएं, ऊंचे लंबे दुबले-पतले। बस चेहरा देदीप्यमान और वाणी से केवल वो मधुर स्त्रावी वाणी, "हा कृष्ण, हा कृष्ण" और महाराज जी एक ही कीर्तन गाते थे, "भजो गिरिधर गोविंद गोपाला, भजो मुरली मनोहर नंदलाला।" यही कीर्तन श्री महाराज जी अपने साधना अवस्था में गाया करते थे। और फिर बीच-बीच में "हा कृष्ण, हा कृष्ण" कह के मूर्छित होकर गिर जाते थे। यह अवस्था से निकले और इस अवस्था के बाद फिर मैंने आप लोगों को बताया ही था। फिर श्री महाराज जी वृंदावन पहुंचे। फिर वृंदावन से मथुरा के कुछ लोग श्री महाराज जी को मथुरा ले गए। फिर मथुरा में जब पहुंचे, तो श्री महाराज जी को स्नान वगैरह कराया गया। महाराज जी की मूछें थीं, लंबे लंबे केश थे। तो उन सबने महाराज जी को पहले तो स्नान कराया और एक नाई बुलाया। तो जब नाई को बुलाया, तो पता नहीं था। नाई ने पूछ लिया महाराज जी से, "कैसा काटू बाल?" तो महाराज जी को बोले, "तेरी जैसी इच्छा।" अब उस समय जैसे आजकल आप लोग का है ना, ये इंग्लिश कटिंग। अंग्रेजों के जमाने से यही कटिंग चल रही है। तो उस समय वो नाई ने कह दिया, "अंग्रेजी कटिंग कर दूं।" तो महाराज जी को क्या अंग्रेजी और क्या देसी। और कुछ महाराज जी ने कहा, "तेरी जो इच्छा।" तो इतने-इतने बाल काट दिए। सारे लंबे बाल काट दिए। महाराज जी के इतने-इतने बाल। और उतने बालों में ही श्री महाराज जी ने अपना प्रचार "हरे राम" कीर्तन गाना शुरू किया। महाराज जी सफेद कपड़े पहनते थे, कुर्ता और धोती। उस समय लोग उनको पंडित जी कहते थे क्योंकि बंगाली कुर्ता और बंगाली धोती बहुत पसंद थी श्री महाराज जी को। तो उस समय लोग उनको पंडित जी कहते थे और महाराज जी "हरे राम" का संकीर्तन कराते थे। और जब संकीर्तन कराते थे, तो भाव-वेश में आ जाते थे। महाराज जी महाप्रभु के ही अवतार हैं। इसका प्रमाण यहां से मिलता है कि जब श्री महाराज जी को आवेश आता था, अष्ट सात्विक भाव, तो उस समय महाराज जी "हरेराम" गाना भी छोड़ देते थे। और दोनों अपनी भुजाओं को उठा के "हरि हरि बोल बोल हरि बोल" यह कहना शुरू करते। तो "हरि हरि बोल" जो है, यह गौरांग महाप्रभु जी ने उनका ही अवदान है। यह "हरि बोल" वैसे तो वह संकीर्तन के प्रवर्तक हैं। इससे पहले।

source : Raseshwari Devi Ji Youtube Channel





माइंड मैनेजमेंट लाइफ ट्रांसफॉर्मेशन

मन को मजा पसंद है जो श्रेष्ठ कार्य पर हमें ध्यान केंद्रित करना उसमें बोरियत लगती है और जो लो वैल्यू गतिविधि है उसमें मजा आता। तो मन कहता, "अरे, यह ऑफिस का प्रोजेक्ट रिपोर्ट, इस पर क्या ध्यान दें? हम उस चीज का चिंतन करें तो मजा आएगा।" और दूसरी है हमारे मस्तिष्क का नॉवेल्टी बायस। इसका मतलब क्या? जब हम एक चीज से दूसरी चीज की ओर जाते हैं तो मस्तिष्क को एक किक मिलता है, एक छोटा सा मजा आता है। अब आप एक कार्य कर रहे हैं, वहां आपके ईमेल की घंटी बजी, "अजी साहब, एक नया ईमेल आया है।" मन कहता है, "पढ़ लो ना, उसमें मजा आएगा।" तो वो जो मजा पाने की प्रवृत्ति है, वह हमारे ध्यान को भंग कर देती है।

संसार के कोलाहल में मन की एकाग्रता को बनाए रखना दिन प्रतिदिन कठिन होता चला जा रहा है क्योंकि संसार का स्वरूप ऐसा बन गया। आपको एक मीटिंग के बाद दूसरे में जाना पड़ता है, एक ईमेल के बाद दूसरे का उत्तर देना पड़ता है, एक WhatsApp मैसेज के बाद दूसरे को पढ़ना पड़ता है। परिणाम स्वरूप हमारा मन बिखर जाता है। तो कोई कार्य करने का श्रेष्ठ तरीका नहीं है। जी हां, यह है अपने फोकस की वृद्धि करना।

एक आश्रम में एक जैन मास्टर था, वो अपने विद्यार्थियों को आध्यात्मिक ट्रेनिंग भी देता था और साथ में शस्त्र विद्या भी सिखाता था। उसके विद्यार्थियों में एक था जो अभिमान से युक्त था क्योंकि उसको तीर कमान में इतनी कला प्राप्त थी कि एक तीर छोड़ के दूसरे तीर को पहले के पूंछ में मार पाता था और उसको दो भाग में कर देता था। तो गुरुजी विद्यार्थी को कहे, "चलो मेरे साथ।" पहाड़ की दो चोटियों के बीच में एक वृक्ष गिरा हुआ था। वे उस वृक्ष पर कूद गए। विद्यार्थी को कहा, "तुम भी आओ।" अब बैलेंस बताते हुए विद्यार्थी आता गया। गुरुजी हाथ में तीर कमान लिए और एक तीर छोड़ के दूसरे को उसकी पूंछ में मार के उसके दो भाग कर दिए। शिष्यों को कहा, "तू तो करता है, अब कर।" शिष्य पसीना-पसीना हो गया। उसने ट्राई तो किया किंतु सफलता नहीं मिली। गुरुजी ने कहा, "बात क्या है? कारण यह है कि यहां पर अब तेरा ध्यान भंग हो गया है। एक ओर मन इस बात पर विचार कर रहा है, 'कहीं गिर ना जाऊं।' दूसरी ओर निशाने पर।"

तो एकाग्रता का मतलब हम अपने मन को वांछित विषय पर एक्सटेंडेड समय तक रख सकें। हम जिस चीज का ध्यान करते हैं और जिस क्वालिटी का ध्यान करते हैं, इस पर हमारे जीवन की क्वालिटी निर्भर करती है। ध्यान के बारे में तो हमें अर्जुन से ही प्रेरणा लेनी चाहिए। गुरु द्रोणाचार्य ने जब कौरवों-पांडवों की परीक्षा ली, सबको लाइन से लगा दिया एवं कहा, "देखो, वह वृक्ष पर एक पक्षी बैठा है, उसकी आंख पर निशाना बांधो।" सब ने निशाना बांधा। द्रोणाचार्य ने पूछा, "भीमसेन, क्या दिख रहा है?" उसने कहा, "गुरुदेव, वृक्ष, पक्षी और उसकी आंख।" युधिष्ठिर, तुमको क्या दिख रहा है? युधिष्ठिर ने कहा, "गुरुदेव, पक्षी और उसकी आंख।" दुर्योधन, क्या देख रहे हो? दुर्योधन ने कहा, "गुरुदेव, वह पक्षी तो दिखता, बीच-बीच में भीमसेन भी दिख जाता।" वो द्वेष से भरा हुआ था। अर्जुन, तुझे क्या दिख रहा है? अर्जुन ने कहा, "गुरुवर, आंख, आंख, आंख।" अर्जुन जीत गया, उसका मन इतना एकाग्र था।

तो यह एकाग्रता हम क्यों नहीं बना पाते? इसमें दो प्रमुख समस्याएं आती हैं। एक तो हमारे मन की भोग प्रवृत्ति। मन को मजा पसंद है जो श्रेष्ठ कार्य पर हमें ध्यान केंद्रित करना उसमें बोरियत लगती है और जो लो वैल्यू गतिविधि है उसमें मजा आता। तो मन कहता, "अरे, यह ऑफिस का प्रोजेक्ट रिपोर्ट, इस पर क्या ध्यान दें? हम उस चीज का चिंतन करें तो मजा आएगा।" और दूसरी है हमारे मस्तिष्क का नोवेल्टी बायस। इसका मतलब क्या? जब हम एक चीज से दूसरी चीज की ओर जाते हैं तो मस्तिष्क को एक किक मिलता है, एक छोटा सा मजा आता है। अब आप एक कार्य कर रहे हैं, वहां आपके ईमेल की घंटी बजी, "अजी साहब, एक नया ईमेल आया है।" मन कहता है, "पढ़ लो ना, उसमें मजा आएगा।" तो वो जो मजा पाने की प्रवृत्ति है, वह हमारे ध्यान को भंग कर देती है।

और आजकल के संसार के डिजिटल एज में हम लोग बोरियत को तो भूल ही गए हैं क्योंकि मजा हमारे हाथ के निकट, वो मोबाइल में, वो कंप्यूटर में। जहां बोर होने लगे, एक क्लिक करो और आपको एंटरटेनमेंट मिल जाता है। लेकिन याद रखें, जब आप लो वैल्यू गतिविधि को हां बोलते हैं, तो आप हाई वैल्यू गतिविधि को ना बोल रहे हैं क्योंकि समय तो आपके पास इतना ही है।

एक बार स्वामी विवेकानंद एक योगी के साथ परामर्श करते हुए चल रहे थे। सामने नदी आई। योगी के पास सिद्धि थी, उसने अपने पैर नदी के जल पर रखे और चलता गया। कुछ कदम लेकर पीछे मुड़ा और स्वामी जी से कहा, "आइए।" स्वामी जी ने कहा, "नहीं।" वहां पर एक नाव खड़ी थी। वे नाविक को दो पैसे दिए और उसने पार करा दिया। दूसरी ओर जब पहुंचे, योगी ने कहा, "आपने क्या साधना की? आप पानी पर चल नहीं पाते।" स्वामी जी ने कहा, "इस सिद्धि के लिए तुमने कितना समय खर्च किया?" योगी ने कहा, "15 वर्ष।" स्वामी जी ने कहा, "तुमने जो 15 वर्ष लगाए, उसी कार्य को मैंने दो पैसे में कर दिया। नाविक को 2 पैसे देकर। तो उसका लाभ क्या हुआ?" इसी प्रकार से अगर कोई आपका समय व्यर्थ गवाना चाहे, आप सावधान हो जाइए। क्यों? मान लो कि आप एक महीने में ₹1 लाख कमाते हैं। इसका मतलब अगर प्रतिदिन 8 घंटे काम कर रहे हैं, एक मास तो 1 घंटे में आपकी कमाई है ₹600। इसका मतलब 1 मिनट में आपकी कमाई है ₹10। किसी ने आके निरर्थक आपसे बातचीत कर ली, 10 मिनट खर्च कर लिए, तो उसने आपके ₹1 आपसे ले लिए। क्यों? निरर्थक इस प्रकार से बर्बाद करें। अतः अपने समय के बारे में कंजूस बने। इसी प्रकार से अपनी एकाग्रता को बनाए रखें और बीच-बीच में थोड़ा सा डिटॉक्स भी कर लीजिए।

क्या मतलब? अब मोबाइल तो साथ में रहता ही है, किंतु रात्रि 8:00 बजे से सुबह 8:00 बजे तक उसे फ्लाइट मोड में डाल दीजिए। आप संसार आपको डिस्टर्ब ना कर पाए। उस समय आप अपनी एकाग्रता को उपार्जित करते चले जाएं। तो याद रखें, जितना आप अपने मन को एकाग्र कर पाएंगे और जिस विषय पर आप अपना ध्यान केंद्रित करेंगे, उसके आधार पर आपके जीवन की क्वालिटी, आपकी सफलता और आपके भीतर का आनंद निर्भर करेगा। तो अपने जीवन को स्वर्णिम बनाने हेतु कुछ उपयोगी बातें हम समझ रहे हैं इस श्रृंखला "गोल्डन रूल्स फॉर लिविंग योर बेस्ट लाइफ" के अंतर्गत।

संसार में विपत्ति क्या है संपत्ति क्या है | Swami Mukundananda Ji

लोगों की वैल्यूस गड़बड़ है। वो रुपए पैसे को संपत्ति मानते हैं, पोस्ट को संपत्ति मानते हैं, पावर प्रतिष्ठा को संपत्ति मानते हैं। लेकिन यह तो सब छोड़ने पड़ेंगे। इसलिए असली संपत्ति है भगवान की स्मृति। हमने कितनी मात्रा में अपने अंतःकरण को शुद्ध किया। लेकिन वो मन सदा लगा रहे, अव्यावत्त, अव्यावत्त भजनात।

नारद जी कहते हैं कि कुछ समय भजन करने से काम नहीं चलेगा। आपने दिन में एक घंटा भजन किया, मन भगवान में लगा, यह मन की शुद्धि हो गई। आपकी कमाई हुई, शेष समय आप मन को संसार में ले गए, संसार का चिंतन किए, मन मलिन हो गया, गवाही हो गई, लॉस हो गया। तो कमाई कर रहे हैं, साथ में गवाई कर रहे हैं। इससे वृद्धि नहीं होगी। अगर कोई प्रतिदिन ₹1 कमाए और ₹00 गवा दे, तो कहे मेरे तो महीने में 3000 हो गए, लेकिन लॉस कितना हुआ, इसको भी सोचो।

इसलिए श्री कृष्ण ने अर्जुन को कहा है, सर्वेशु कालेशु मा मनुस्मर। यह भजन कुछ कुछ समय नहीं, सर्वेशु कालेशु हर समय करना होगा। जैसे कंपास होता है, मैगनेट, वो हर समय उत्तर की ओर ही रहता है। ऐसे ही आपका मन भी सतत भगवान में लगे। सततम कीर्तयंतो माम योमा माम स्मरति नित्य तस्याह सुलभ पार्थ। नित्य युक्तस योगिन।

एक श्लोक में तीन बार कह रहे हैं कि नित्य अभियुक्त होना होगा, यानी मन भगवान में ही रहे। क्योंकि भगवान को भूले, तो फिर संसार है। और संसार जहां हावी हुआ, वहां पर काम, क्रोध, लोभ, मोह, यह माया के सेनापति, यह तैयार हैं आपके मन को गिरा देने के लिए। अगर आप इनसे बचना चाहते हैं, तो या तो यह झगड़ा करते जाएं, काम ना आए, क्रोध ना आए, लोभ ना आए, मोह ना आए। या तो आप अंधकार से झगड़ा करते रहें, या प्रकाश आ जाए। इस पर फोकस करें। तो आसान कौन सा है? आसान यह है कि प्रकाश आ जाए, अंधकार तो ऑटोमेटिक भागेगा।

अब यह मत सोचो, यह मत सोचो। क्यों नहीं अपने प्राण वल्लभ को सोचो। तो जहां उनको भूले, यही विपत्ति कह। हनुमंत विपत्ति प्रभु सोई, जब तब सुमिरन भजन न होई। हनुमान जी कहते हैं, प्रभु संसार में विपत्ति क्या है संपत्ति क्या है। लोगों की वैल्यूस गड़बड़ है। वह रुपए पैसे को संपत्ति मानते हैं, पोस्ट को संपत्ति मानते हैं, पावर प्रतिष्ठा को संपत्ति मानते हैं। लेकिन यह तो सब छोड़ने पड़ेंगे। असली संपत्ति जो है, हमने कितनी मात्रा में अपने अंतःकरण को शुद्ध किया। इसलिए असली संपत्ति है भगवान की स्मृति।

लेकिन वह मन सदा लगा रहे। सततम तेशाम सतत युक्त नाम भजता प्रीति पूर्वकम अनन्या चिंतयंतो मा जना परपासते। अनन्य चिंतन करना होगा भगवान का। तो तेशाम नित्याभ युक्त नाम योगक्षेम वहाम अहम। भगवान कहते हैं, ऐसे जीव का मैं ठेका लूंगा, ऐसे जीव का मैं योगक्षेम वहन करूंगा। अब श्री कृष्ण ने कहा, सदा मेरा स्मरण करो। नारद जी भी कह रहे हैं कि यह भजन अव्यावत होना चाहिए।

अब कोई कहे, साहब, ऐसा हम स्मरण कैसे करेंगे? हम संसारी कार्य भी करें और भगवान का स्मरण भी चलता रहे। इसके लिए एक सिद्धांत को समझना है और उस सिद्धांत का अभ्यास करना है। अह आत्मा गुेश सर्वभूताशय स्थित अर्जुन, मैं सब जीवों के हृदय में रहता हूं। तो बैठ के आप क्या करते हैं? भगवान जीवों के कर्मों को नोट करता हूं, पूर्व कर्मों का फल प्रदान करता हूं, तत कर्म करने की शक्ति देता हूं, कर्मों का हिसाब रखता हूं और शरणागति के अनुसार कृपा करता हूं। यह भगवान का निवास हमारे अंदर है। यह पहले हम समझें और फिर अभ्यास करते हुए इस स्मृति को अपनी चेतना में स्थापित करें।

यानि हम लोगों ने अभ्यास ये किया, मैं हूं, मैं हूं, मैं हूं। मैं सुखी हूं, मैं दुखी हूं, मैं बोल रहा हूं, मैं सुन रहा हूं, मैं चल रहा हूं, मैं बैठा हूं। मैं की अनुभूति हमको सदा रहती है। लेकिन मैं के पिता भगवान जो अंदर हैं, उनकी अनुभूति हमको नहीं रहती। तो ऑटोमेटिक नहीं आएगी। इसको लाना पड़ेगा, बार-बार सोच के, प्रैक्टिस करके। और जब बहुत कर लेंगे, तो एक दिन भगवान प्रत्यक्ष अनुभूति भी दे देंगे। देखो, मैं तो तुम्हारे साथ में था ही। लेकिन वहां तक पहुंचते-पहुंचते तो हमें प्रैक्टिस, अभ्यास करना। वो अभ्यास यही है कि यह मत सोचो, मैं अकेला हूं। यह सोचो कि मेरे अंशी, मेरे सर्वस्व, मेरे इष्ट देव मेरे साथ में।

तो जहां भी जाएं, ऑफिस जाएं, कुर्सी पर बैठे, सोचें श्री कृष्ण वहां पर हैं, राधा जी वहां पर हैं। एक साइड में अपने इष्ट देव को बिठा दें, दूसरी साइड में अपने गुरुदेव को बिठा दें। और उनको साक्षी मान के, उनको रक्षक मान के, उनको अपने कर्मों का भोगता, यानी सेव्य मान के। अब कर्म भगवत प्रीत्यर्थ करें। हम उनकी खुशी के लिए कर रहे हैं, तो हर कर्म से भक्ति होगी। लेकिन जब आप करेंगे, अभी आप कुशल कर्म योगी तो बने नहीं। इसलिए भगवान की विस्मृति हो जाएगी। तो घबराना नहीं। फिर एक घंटे के बाद फिर याद कर लिए, वह वहां पर है। फिर एक घंटे के बाद फिर याद कर लिए। ऐसे एक-एक घंटे में आप याद करते जाएं। हर फिर उसी अभ्यास को और बढ़ा दें। तो आधे-आधे घंटे में हो जाएं। और बढ़ाएं, तो फिर 20-20 मिनट में हो जाएं। ऐसे हमको अभ्यास करते-करते यहां तक पहुंचना है कि फीलिंग बनी रहे, वो सदा मेरे साथ में रहते।

तो नारद जी ने इसको बताया, अव्यावत्त भजनात भाई। देखो, यह जो तुमको भजन करना है, यह तेल की धारा के समान, वो टूटे नहीं। तब जाके भजन संपन्न होगा।



श्री महाराज जी की लीला स्थली

यह श्री महाराज जी की लीला स्थली है। किसी साधक ने प्रश्न किया है कि गोलोक धाम के विषय में कुछ बताइएगा। अब यह गोलोक धाम कि वह गोलोक धाम वहां के विषय में तो श्री महाराज जी ही बता सकते हैं। हां, यहां पर जो श्री महाराज जी की लीलाएं हुई हैं, वह भी अनिर्वचनीय है क्योंकि महाराज जी का स्वरूप अनिर्वचनीय है। उनका प्रेम का स्वरूप है। जैसे प्रेम अनिर्वचनीय है, ऐसे ही महाराज जी ने जो लीलाओं के माध्यम से, संकीर्तन के माध्यम से, प्रवचन के माध्यम से जो ब्रज रस वर्षा की है, वह भी शब्दों में बताया नहीं जा सकता। हां, कुछ-कुछ उनकी मधुर स्मृतियां हैं। कुछ-कुछ महाराज जी का तो इतना सादा जीवन रहा है कि उन्होंने कभी यह सोचा ही नहीं कि वह जगत गुरु उत्तम हैं। जगत गुरु उत्तम के हिसाब से वो कभी कहीं गए ही नहीं। छोटे-छोटे घरों में भी रुके हैं। दिल्ली में भी बहुत सी बार श्री महाराज जी का प्रवचन गली में टेंट लगाकर हुआ है। कोई ऐसा नहीं कि बहुत बड़े-बड़े ऑडिटोरियम बुक कराए गए हों या कोई बहुत बड़ा हॉल बुक कराया गया हो। महाराज जी चाहते थे कि कोई एक यहां पर भी केंद्र हो, जहां कि नियमित रूप से सत्संग होता रहे। श्री महाराज जी ने ही राधा गोविंद समिति 1998 में यहां पर एक बनवाई। दिलशाद गार्डन बहुत छोटी सी जगह थी। एलआईजी फ्लैट सोचिएगा, एलआईजी फ्लैट में महाराज जी रहे हैं। फिर उसके बाद पंजाबी बाग में एक थोड़ा सा सेंटर बना। किसी का घर था, कृष्ण कुंज उसका नाम था। वहां भी बहुत वर्षों तक यहां से पहले श्री महाराज जी वहां रहे। नेहरू प्लेस में भी एक सेंटर था, किशोरी कुंज। लेकिन सब छोटी-छोटी ही जगह थी। उसके पश्चात लगभग 2000 से इसका निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ। महाराज जी ने आज्ञा दी और जब 2004 में बनकर कंप्लीट हुआ, श्री महाराज जी के द्वारा ही नाम दिया गया गोलोक धाम। श्री महाराज जी कुछ अस्वस्थ थे। अस्वस्थ होने के कारण श्री महाराज जी अचानक ही दो दिन पहले श्री महाराज जी का फोन आया कि मैं 10 अक्टूबर को आ रहा हूं। उस समय तक नाम नहीं रखा था। श्री महाराज जी ने गोलोक धाम, वो तो यहां आने के बाद ही गोलोक धाम नाम दिया। तो महाराज जी सीधे हॉस्पिटल से यहां पर आए। आए तो फिर वह आंगन में विराजित हुए। आरती महाराज जी की हुई। महाराज जी इधर-उधर देखने लगे। फिर मंदिर में श्री महाराज जी गए। वहां पर ठाकुर जी का स्वरूप महाराज जी उसको निहारते रहे। फिर एक दिन के बाद, यानी 11 अक्टूबर को ही कहना चाहिए, महाराज जी ने मंदिर देखा। मंदिर देखने के बाद फिर श्री महाराज जी बोले कि एक मैंने सुना था कि एक भवन और है, साधना भवन जैसा। तो यह तो छोटा सा मंदिर है। तब जो आसपास सत्संगी थे, महाराज जी तो बड़े प्यार से सभी से बात करते थे। तो वो बोले, महाराज जी नीचे भी है। एक तो महाराज जी नीचे आए बेसमेंट में। और मैं उस समय यहां नहीं थी क्योंकि पंजाबी बाग में काफी सामान उस समय शिफ्टिंग चल रही थी। तो वहां सामान लेने के लिए कुछ गई थी मेरे पीछे ही। फिर महाराज जी ने उद्घोषित किया कि इसका नाम गोलोक धाम होगा। यह मोहल्ला द्वारिका है। इस द्वारिका में गोलोक धाम इसका नाम नहीं रखा गया था अब तक। द्वारिका धाम है, ये मोहल्ला। इसमें इस बिल्डिंग का नाम होगा गोलोक धाम। तो श्री महाराज जी ने इसका नाम गोलोक धाम उद्घोषित किया। और उस समय कोई मिठाई इत्यादि भी नहीं थी क्योंकि अचानक ही महाराज जी ने बोल दिया। खाली एक मिठाई का डिब्बा था, वही महाराज जी के सामने रख दिया। वही सबको महाराज जी ने एक-एक मिठाई दे दी। फिर महाराज जी ने आज्ञा दी कि यहां रोज परिक्रमा होगी। तो 20 दिन तक यहां पर नित्य प्रति श्री महाराज जी के सानिध्य में, हमारी तीनों दीदी के सानिध्य में भक्त मंडली के साथ अन्य भी कुछ प्रचारक यहां पर आ गए थे श्री महाराज जी के दर्शनार्थ। तो 20 दिन तक रोज सुबह परिक्रमा हुई। और श्री महाराज जी ने आज्ञा दी कि कोई भी घर पर नहीं रहेगा। सब परिक्रमा में जाएंगे। और स्वयं बाहर खड़े होकर देखते थे कि कौन-कौन लोग जा रहे हैं। हमारी तीनों दीदी भी परिक्रमा में डेली गई हैं। उसके पश्चात तो फिर महाराज जी एक महीने में दो-तीन बार कम से कम यहां आते ही थे। महाराज जी संकीर्तन कराना, प्रवचन कराना, वह कराते ही थे। महाराज जी यानी यहां के साथ अनंत स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। महाराज जी की वह उनकी जो मधुर स्मृतियां हैं, आज वह हमारे जीवन का आधार है कि किस प्रकार से महाराज जी ने यहां, जहां हम लोग बैठे हुए हैं, साधना भवन कह दीजिएगा इसको, कि यहां पर महाराज जी ने कितना कीर्तन कराया है। कितना कीर्तन कराया है। कोई बच्चा जा रहा है, हाथ मिला रहा है। भक्त आते चले जा रहे हैं। आप लोगों में से कुछ लोगों को याद होगा यह कि किस प्रकार से महाराज जी को माला पहनाते रहते थे। कैसे महाराज जी कीर्तन कराते रहते थे। कैसे भक्त लोग डांस करते रहते थे। श्री महाराज जी के सामने एक जैसे नशा ही था। सुबह घर से दौड़ कर आ रहे हैं। किसी को कुछ होश ही नहीं था। 3:00 बजे घर से चल दिए क्योंकि 4:30 बजे महाराज जी मंदिर में आ जाते थे। और कैसे महाराज जी यहां से उठते थे। अचानक तो सारे बच्चे ऊपर दौड़ते थे कि अब महाराज जी जाएंगे ऊपर। और फिर महाराज जी उनको चिढ़ाने के लिए फिर बैठ जाते थे। फिर बच्चे भागते थे, फिर बैठ जाते थे। तो इस प्रकार से फिर महाराज जी जैसे ही ऊपर पहुंचते तो बच्चे सारे गले महाराज जी सब बच्चों को गले लगाते। फिर सब लोग आंगन में एकत्र हो जाते। सोचिएगा, कितना छोटा सा आंगन है और कितने 200-300 लोग सारे पता नहीं कैसे वहां आ जाते थे। कुछ ऊपर भी बालकनी में खड़े हो जाते थे। और फिर महाराज जी गुड नाइट करने के लिए सबको आते थे। जब भी महाराज जी कहीं जाते थे, मुंबई जाए या जयपुर जाए या कहीं गोवा जाए या और नेपाल जाए, कहीं भी जाए, महाराज जी यहां अवश्य आते थे। और जो इतने वर्षों तक आते जाते रहे, 2004 से सोचिएगा, 2013 तक श्री महाराज जी यहां आते रहे। कितनी बार आए होंगे, सैकड़ों बार श्री महाराज जी आए। कभी एक दिन के लिए, कभी दो दिन के लिए, कभी चार दिन के लिए, आठ-आठ दिन तक भी श्री महाराज जी यहां पर रुके हैं। तो यह एक इस प्रकार से महत्वपूर्ण स्थान है, जहां कण-कण में महाराज जी की यादें हैं। महाराज जी की स्मृतियां हैं। उनकी अकारण करुणा का एक प्रत्यक्ष प्रमाण है। उनके अनंत उपकारों में से यह भी एक उपकार है। बहुत बड़ा हम लोगों के ऊपर कि आज हम उस लीला स्थली में बैठे हुए हैं, जहां हमारे महाराज जी, हमारी अम्मा जी, हमारी तीनों दीदी पुनः पुनः आए हैं। बार-बार आए हैं। इस स्थान को तीर्थ नहीं, महा तीर्थ कहना चाहिए। महा तीर्थ भी नहीं, सभी तीर्थों का फल प्राप्त हो जाता है उस स्थान पर जाने से, जहां महापुरुष के चरण पड़े हों, जहां महापुरुष ने निवास किया हो। तो फिर और क्या बात है कि यहां श्री महाराज जी प्रातः मंदिर में 12:30 बजे से घूमना प्रारंभ कर देते थे। तीन-चार बार दिन में महाराज जी घूमते थे। तो यह वही मंदिर है, जहां श्री गुरुवर घूमते थे। उनके चरण पड़े हैं। उन चरणों का सुखद स्पर्श वहां की भूमि को प्राप्त हुआ है। और साथ ही वहां के जो ठाकुर जी किशोरी जी हैं, श्री महाराज जी के द्वारा ही स्थापित यह श्री विग्रह है। श्री महाराज जी की आज्ञा से ही स्थापित हुए हैं। और उन्हीं के द्वारा स्थापित हुए हैं। और उन्हीं के द्वारा प्राण प्रतिष्ठा हुई है। जब महाराज जी से पूछा कि मूर्ति तो स्थापित करनी होगी, उससे पहले किसी मंदिर में कोई मूर्ति स्थापित नहीं हुई थी। तो महाराज जी ने कहा, "अरे लगवा लो फिर मूर्ति।" फिर महाराज जी ने उस आर्टिस्ट का नाम बताया, जिस आर्टिस्ट ने यह मूर्ति या भगवान का स्वरूप बनाया है। फिर जब यह स्थापित हुए, तब श्री महाराज जी ने उसी आर्टिस्ट से, जिसने यह बनाए थे, भक्ति मंदिर में ठाकुर जी किशोरी जो स्थापित हुए, जो श्री विग्रह आप दर्शन करते हैं। फिर भक्ति मंदिर के बने, प्रेम मंदिर के बने, उसी के द्वारा फिर कीर्ति मंदिर के बने। यानी समय की आवश्यकता के अनुसार फिर महाराज जी ने सहारा लेने के लिए रूप ध्यान में सहारा हो। फिर ये मंदिरों की स्थापना प्रारंभ हो गई। लेकिन पहले यहां पर मूर्ति स्थापित हुई है। फिर महाराज जी से पूछा कि महाराज जी, इसके लिए वैदिक अनुष्ठान किस प्रकार से किया जाए। महाराज जी ने कहा, "अरे मैं ही कर दूंगा इसकी प्राण प्रतिष्ठा।" तो इसकी जो प्राण प्रतिष्ठा है, वह भगवन नाम संकीर्तन से ही हुई। और इसका जो उद्घाटन है, वो भी भगवत नाम संकीर्तन से ही हुआ। और हमारे श्री महाराज जी संकीर्तन आचार्य हैं। अद्वितीय संकीर्तन आचार्य हैं। संकीर्तन को ही उन्होंने युग धर्म के रूप में स्थापित किया। तो यह भी एक विशेष बात है कि यहां जो भी वैदिक अनुष्ठान की आवश्यकता थी, वैदिक अनुष्ठान उस संकीर्तन के माध्यम से ही हरि गुरु के प्रेम से ही श्री महाराज जी की उपस्थिति से ही श्री महाराज जी के द्वारा ही कहिएगा, इसकी प्राण प्रतिष्ठा हुई। इस छोटी सी जगह में महाराज जी ने बड़े-बड़े त्यौहार मनाए हैं। श्री कृष्ण जन्माष्टमी जैसा पर्व भी यहां पर मनाया गया। राधाष्टमी जैसा पर्व भी यहां पर मनाया। गुरु पूर्णिमा जैसा पर्व भी श्री महाराज जी ने यहां पर मनाया। अन्य भी पर्व, बुद्ध जयंती वह भी यहां पर मनाई। यानी बड़े से बड़े त्यौहार भी श्री महाराज जी ने यहां पर मनाए। और श्री कृष्ण जन्माष्टमी की छठी तो अक्सर गोलोक धाम में ही हुई है। राधा अष्टमी की छठी यहीं पर मनाई जाती थी। अनंत चतुर्दशी का पर्व, रक्षाबंधन का पर्व, बहुत वर्षों तक गोलोक धाम में ही मनाया गया। और इतनी छोटी सी जगह होने पर भी महाराज जी ने यहां लीलाएं भी करवा ली। नरसिंह अवतार की लीला यहां पर हुई, जिसमें महाराज जी ने स्वयं नरसिंह अवतार का, यानी नरसिंह भगवान का रूप धारण किया। शबरी लीला भी यहीं पर हुई। भगवान राम के जन्म की लीला भी यहां पर हुई कि किस प्रकार से राजा दशरथ ने वरदान मांगा और कैसे उन्होंने पुत्रष्टि यज्ञ किया। वो सब लीलाएं भी यहां पर हुई। तुलसी लीला भी यहां पर हुई। यानी लीलाओं का रस भी श्री महाराज जी ने दिया। सारे त्यहारों को भी मनाकर हम लोगों को धन्य किया या इस स्थान को धन्य किया। वह तो वही जान सकते हैं। बस हमारे पास तो केवल एक ही शब्द है, कृपा। कृपा, कृपा, कृपा। यह उनकी अकारण कृपा है। तो यानी इसका इतिहास, गोलोक धाम का इतिहास, श्री महाराज जी की कृपा, करुणा, उनके प्रेम का इतिहास है। किस प्रकार से उन्होंने हम लोगों को भक्ति रस में डुबोया है, वह अवर्णनीय है। आज भी अगर हमारी दिव्य आंखें हो, तो हम देख सकते हैं किस प्रकार से यहां का कोना-कोना रस से भीगा हुआ है। लेकिन वह अधिकारी ही कोई हो, तभी देख सकता है। तो ऐसा स्थल यह महाराज जी की कृपा ही है। उनकी करुणा ही है। अकारण करुणा है। किसी का परिश्रम या किसी का संकल्प या किसी की साधना नहीं है। यह केवल उनकी कृपा का स्थान है। कृपा का स्थान ऐसा समझिएगा। गुरु कृपा का प्रत्यक्ष प्रमाण तो उन्हीं सब स्वर्णिम दिनों को याद करते हुए, जब महाराज जी आंगन में भी बैठ जाते थे। किस प्रकार से वहां पर महफिल होती थी। शेरो शायरी मंदिर में भी, आंगन में भी घंटों-घंटों महाराज जी बैठे हुए हैं। बातें हो रही हैं। सब लोग हंसी-मजाक हो रही है। किस प्रकार से बच्चों को अपने स्नेह पाठ में बांधकर महाराज जी ने आत्मीयता दी है। और कैसे उनको अध्यात्म।