कुसंग से कैसे बचें? सत्संग का असली महत्त्व | Swami Mukundananda

 जो संग हमारे मन को सत में ले जाए, भगवान में ले जाए, ये सत्संग। और वो संग जो हमारे मन को संसार में ले जाए, ये कुसंग। तो सत्संग में कमाई होगी, कुसंग में गवाई होगी। आपने साधना की, दो घंटा अपने मन को शुद्ध कर दिया, लेकिन बाद में लापरवाही कर दिए, अब बैठ के न्यूज़ सुनने लग गए। अरे ठीक है, 10 मिनट न्यूज़ सुन लेते हैं। तो दो घंटे की साधना को 10 मिनट के कुसंग ने खत्म कर दिया। दुसंग का सर्वथा ही त्याग करना चाहिए, दुसंग यानी कुसंग। त्याग दो। डॉक्टर भी तो दो चीजें बोलता है ना, यह दवा लेना और यह परहेज रखना। डायबिटीज का मरीज गया, डॉक्टर कहता है कि हम इंसुलिन की गोली दे रहे हैं और मीठा मत खाना, यह परहेज बता दिया। अब मरीज ने गोली तो नियमानुसार ले ली, लेकिन उसकी शुगर बढ़ती चली गई। तो डॉक्टर के पास वापस गया, डॉक्टर साहब आपकी दवाई तो काम कर नहीं रही। डॉक्टर ने कहा, मीठा खाया था क्या? खाए थे कलाकंद और जलेबी और रसगुल्ला, डेली उसका आस्वादन करते थे, फिर दवाई कैसे काम करेगी? ऐसे ही हम सत्संग करें और कुसंग से बच के रहे, वरना वो कुसंग हमारी साधना को खा जाएगा।


सत्संग क्या, कुसंग क्या? संग एक में उपसर्ग सत है, एक में उपसर्ग कु है। सुसंग और कुसंग। यानी वो संग जो हमारे मन को सत में ले जाए, भगवान में ले जाए, ये सत्संग। और वो संग जो हमारे मन को संसार में ले जाए, एक कुसंग। तो सत्संग में कमाई होगी, कुसंग में गवाई होगी। अब कमाई तो धीरे-धीरे होती, और गवाही बहुत जल्दी हो जाती। आपने साधना की, दो घंटा अपने मन को शुद्ध कर दिया, लेकिन बाद में लापरवाही कर दी, आप बैठ के न्यूज़ सुनने लग गए। अरे ठीक है, 10 मिनट न्यूज़ सुन लेते तो दो घंटे की साधना को 10 मिनट के कुसंग ने खत्म कर दी। तो फिर हम कैसे सोचे कि हम आगे चलेंगे?


एक व्यक्ति घास फूस की रस्सी बना रहा था। वो रस्सी घास को ऐसे बांधना पड़ता, वो बांधता चला जा रहा था, मेहनत करते हुए। 1 घंटे के बाद उसने सोचा, पसीना पसीना हो गए हैं, अब 50 गज तो हो गई होगी। उसने हाथ ऐसे पीछे किया तो पांच फुट की रस्सी है केवल, और बाकी को क्या हो गया? बाकी वो पीछे भैंसा खड़ा था, वो रस्सी खाता जा रहा था। तुम बना रहे थे, वो खा रहा था। तो यही कुसंग है। वो कुसंग आपकी साधना को खा लेगा। तो सत्संग करने से श्रद्धा बढ़ेगी। अब आप किसका संग करते हैं? संसारी का संग करेंगे, वो आपकी श्रद्धा को नष्ट कर देगा।


दो भिखारी बाजार में बैठे हुए थे, उदास, जीवन विफल हो गया। एक भिखारी ने दूसरे से पूछा, भाई क्यों तुम्हारी यह दुर्दशा हुई? उसने कहा, मैंने किसी की सलाह ली नहीं, अपनी बुद्धि से कार्य करता गया, इसीलिए यह दुर्दशा हो गई। तुम बताओ तुम्हारी हालत फटीचर कैसे हुई? उसने कहा, मैंने सबसे सलाह ले ली, इसलिए यह हालत हो गई। तो किसी से सलाह ना लेना यह भी डेंजरस है, सबकी सलाह लेना यह भी डेंजरस है। अरे भी, सबकी सलाह कैसे लोगे? एक ऊंट जो है, वो नदी में खड़ा था। अब ऊंट तो लंबा चौड़ा है ना। लोमड़ी ने तट से पूछा, ऊंट भाई, यह पानी गहरा है क्या? ऊंट ने कहा, बिल्कुल भी नहीं। तो लोमड़ी ने कहा, ठीक है, मैं भी आती हूं। अब वो आई और डूबने लगी। उसने कहा, तुम तो कह रहे थे कि पानी गहरा नहीं है! ऊंट ने कहा, मैं बोल रहा हूं पानी गहरा नहीं। तो इसी प्रकार से आप अगर संसारी लोगों से राय लेने लग जाएंगे, वो कहेंगे, ये कोई एज थोड़ी है भक्ति करने की, जब शरीर बेकार हो जाए, बूढ़े हो जाओ, संसार में कोई पूछे नहीं, उस समय राधे-राधे करो। ये क्या अभी से तुम राधे-राधे करने लग गए हो? तो आप सबकी सुनेंगे, एक तो आपका मन सांसारिक हो जाएगा, और दूसरा आपका जो निश्चय है वो हिल जाएगा। इसीलिए हम सत्संग करें और कुसंग से अपने आप को बचा के रखें। तो कुसंग मतलब संसार का संग।


अब साथ ही साथ कुछ ऐसे-ऐसे इनडायरेक्ट कुसंग होते हैं, महाराज जी उसका डिटेल अपने प्रेम रस सिद्धांत में किए। जैसे कि तमाम संतों का प्रवचन सुनना। अब यह कोई कुसंग तो नहीं है? तो अच्छी बात बताते हैं, इसमें क्या समस्या? आपके लिए समस्या है, क्योंकि सब संतों के मार्ग अलग-अलग हैं, वह अपने-अपने ढंग से जीव का कल्याण कर रहे हैं, वास्तविक संत भी। लेकिन आपके पास इतना सामर्थ्य नहीं है कि उसका समाधान कर सके। तो आप कहेंगे, अरे हमारा क्या, कोई फर्क नहीं पड़ेगा, कोई बाल बांका नहीं होगा, हम सुन लेते हैं, ये भी सुन लेते हैं, वो भी सुन लेते हैं, ये भी सुन लेते हैं। परिणाम क्या होगा? अंदर डाउट आ जाएगा। अब डाउट आ गया, अब गुरु जी की वेट करो। गुरु जी, हमारे अंदर डाउट आ गया, आपसे मिले, इसका समाधान हो, शंका समाधान हो। आप तो बोले कि दैन्य भाव बढ़ाओ, और हम एक दूसरे संत को मिले, उन्होंने कहा, तुम तो ब्रह्म हो, तुम ही भगवान हो, दीनता क्या बढ़ाते हो? तो हमने यह भी सुना, यह भी सुना, यह भी सुना, सब खिचड़ी बना दिए। तो यह इनडायरेक्ट कुसंग हो गया।


ऐसे ही एक भयंकर कुसंग है दूसरों में दोष देखना, दूसरे के दोष पर विचार करना, यह भयंकर कुसंग। अब उसको मुंह से बोलने लग जाना, यह तो सबसे बड़ा कुसंग है। यह तो सर्वनाश करने वाला, पाप इकट्ठा करने वाला। लेकिन हमने अपना टाइम वेस्ट क्यों किया दूसरे के दोष देखने के लिए? क्या हमारे अंदर कोई कम दोष है? हम उस पर क्यों नहीं ध्यान दिए? वो कविता आती है ना, कि तू जो औरों की ओर करता है अंगुस्ते नुमाई, हम जब किसी की ओर उंगली करते हैं, देख यह तीन झुकी है तेरी ओर। एक उंगली हम दूसरे की तरफ करते हैं, तीन हमारी तरफ रहती हैं। तो महाराज जी ने इस पर निषेध कर दिया है:


लखहु जनी पर दोष कबहु दोष निज लखु प्यारे।

लखहु जनी पर दोष कबहु दोष निज लखु प्यारे।

दोष निज लखु प्यारे।


भाई, दूसरों के दोष मत देखो। अगर देखने ही है दोष तो अपने मन को अपने सब दोष दिखा दो, और बाकी सब में टाइम वेस्ट मत करो। और इससे आगे है चुगली करना, किसी का दोष दूसरे को बताना। यह तो बहुत ही बुरा कर्म हो जाता है। इसमें तो हम मात्र पाप कमाते हैं। दूसरे का दोष तीसरे को बताना, इससे हम पाप के भागी बन जाते।


एक राजा ने साधु भोज किया। साधुओं को अपने महल में बुलाकर भोजन करा रहा था, तो खिचड़ी इत्यादि तैयार हो रही थी। अब उसको तो पता नहीं, आकाश में एक चील मरे हुए सांप को उठाकर ले जा रहा था, उस सांप तो








क्लास में अनुभव

के साथ क्लास करने गए थे इतना अतिसार हुआ कि हालत खराब हो गई। चलना-फिरना मुश्किल था। तो एक लड़की आई, 14 वर्ष, और उसने कहा, "शंकराचार्य, क्या शास्त्रार्थ करोगे?" तो उन्होंने कहा, "इस समय तो मेरी शक्ति नहीं है, बहना। इस समय मैं शास्त्रार्थ नहीं कर सकता।" तो उन्होंने कहा, "तुम शक्ति को मानते हो क्या? तुमने तो अपने भाष में लिखा है, 'ब्रह्म शक्ति रहित है।'" इतना कह के शक्ति ही थी, साक्षात गायब हो गई। अब शंकराचार्य को फीलिंग हुई कि हां, इतनी बड़ी चीज हमको मिली, हमने पहचाना नहीं। तो जब कोई खाना नहीं खाएगा, तो शक्ति नहीं रहेगी। शक्ति नहीं रहेगी, तो प्यार नहीं कर सकेगा। और जब प्यार नहीं कर सकेगा, तो पत्थर हो जाएगा। इसलिए मैं खाता हूं।

और फिर कोई आदमी को एक से कचरी उठाना होता है, किसी को पांच से। हमको इतने से प्यार करना है। बहुत बड़ा पोजा है। हमारे खाना चाहिए। योगो ज्यादा खाना भी हानिकारक है, ना खाना भी हानिकारक है। युक्तहार विहारस। ये देखो, ये सब वक्ता लोग हैं। पूछ लो, मैं गीता का कोशन दे रहा हूं। मन ग्रहण नहीं बोल रहा हूं। इनहीं से तो आप सीखे हैं। हां, आप समझी तो बिना सफेद बाल हुए कोई नहीं समझ सकता। समझने के लिए सफेद बाल आवश्यक है। हां, भाई, तुम लोगों से सीखे नहीं, तो पढ़ के सीखा है। नहीं, कुछ सुन के सीखा है। जो सीखा है, उसी का होके सीखा है। अरे, खाना देखो, झका एक्सपर्ट है। कि देखते रहते हैं और तरफ देख रहा है कि ले लिया चश्मा। उतार ले जाते हैं। और क्या कहे, अपनी बीवी के लिए नहीं लगाते हो, ना खुद नहीं लगाओ। सब लोग याद रखो, किसी भी क्षण कोई जा सकता है। यमराज भी बोले, "आप यमराज, दो चले गए अपने पार्टी के।" फिर भी जो बचे हैं, वो कहते हैं, "वो चले गए होंगे, हम छोड़ जाएंगे।" परम सोच रही हूं कि मैं कल जा सकती हूं। बोलो, लेकिन फीलिंग में ये नहीं है कि मैं कल चली जाऊंगी। हो सकता है। तो सभी बोलेंगे, लेकिन होगा ऐसा नहीं। निश्चय है, किसी का निश्चय होना चाहिए। तब प्रगति हो।

कर लो आज और रात भर में करना है। एक मिनट में सब कुछ हो जाता है। अरे, सब कुछ ना होगा, तो कुछ तो हो जाएगा। नहीं, हम कहते हैं, कोई अगर हलवा पूरी ना खाए, खाली मत ही पी ले, तो जिंदा तो रहेगा। नथिंग से समथिंग अच्छा है। अपने कम से कम मानव देह मिल जाए। इतनी तैयारी तो कर ले। अब देखो, एक कुत्ता नेमा है। बचपन से सत्संग करते हैं। हमारा ये बचपन से नाबालिक पिता, छोटी उम्र से कितने लेक्चर सुने, ने सत्संग किया। और उसके बाद सब बेकार है। क्या भगवान, क्या महाराज जी, हटाओ चक्कर। अपना अपना संसार में मस्त। शादी भी नहीं किया, गृहस्ती का प्रपंच भी नहीं। एक बुढ़िया मां को लेकर के अब बस बैकुंठ जाएंगी। कभी शक्ल देखा है इनके सत्संग में? लेकिन महसूस करता है आदमी तब आता है, लाभ लेता है। और जब भगवान को किनारे फेंक देता है, बुद्धि दे है, तो बुद्धि ये सर्वनाश करती है। मनुष्य लोगों को उसने ये कह दिया, मारा पीटा भी नहीं, खाली कह दिया। उसी की फीलिंग हो रही है। इस पर बहुत ध्यान देना चाहिए। सबको अभ्यास करना चाहिए। लेकिन आप लोग सुनते नहीं। संकल्प दृढ़ हो, तो ये मनुष्य भगवान को गोलोक से बुला लेता है। यही बड़ी बात है कि बिना मट्टा पी, मट्ठा खाली मट्ठा पी के हम रह नहीं सकते। तब क्यों? तब क्यों? तो खाली दूध पी के रहती थी कि नहीं? याद ही नहीं। दुनिया में देखा तो है। सब बच्चे दूध पीते हैं, मां का या वो भी फीका। ये जितना जबान की बीमारी लगाया है, तो अब बाद में लगाया। पहले कहां थी ये बीमारी? नमक भी हो उसमें, मिर्चा भी हो उसमें। पिलाने वालों की ना कमी है, ना खाने की कमी है। और मैं चार बार मट्ठा पीता हूं, तो समझ लो, अपने आप को कि हम बहुत गरीब हो गए। ध्यान कर लो। ऐसे ही तो खाली मट्ठा पी के रहना है। एक-दो महीने ढलने का समय है। अब प्रोग्रेस नहीं होगी, पतन होगा धीरे-धीरे। इसलिए शरीर पर केयर करना है। अभी तक परवाह नहीं किया, काम चलता गया। अब करना पड़ेगा। हां, बहुत बड़ा प्रारब्ध खतरनाक। तुम्हारा कोड़े में कट गया। जिन लोगों ने एक्सीडेंट की हालत गाड़ी देखा है, वो लोगों ने कहा है कि कैसे बच गए। इसमें कुछ लोग, इसमें किसी को बचना नहीं चाहिए था। सबको आश्चर्य हो रहा है। ये भगवत कृपा है, जिसके कारण तुम्हारा जीवन सुरक्षित रहा। वैसे तो प्रदीप वगैरह जो संसार से चले गए, उनका टाइम हो गया। तो टाइम हो जाने पर, तो चाहे कोई अपने ड्राइंग रूम में बैठा रहे, वो तो जाएगा ही। वो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। लेकिन तुमको मुन्नी को जो जीवन दान मिला है, ये बहुत बड़ी बात है। हंसते रहो। बस डॉक्टर जब कह देगा कि हां, तुम बिलकुल क्वाइट राइट हो, तब फिर हम तुमको यहां जिंदा बनाने की परमिशन देंगे। हंसती रहो। बस राधे-हे। विश्वास से बोलती रहो। गोविंदा, नटवर, नागर, नंदा। भजो रे मन गोविंदा। आई खोपड़ा। यू क्यों, क्यों, क्यों बनाया जाए? जो पहले लाया गया है, वो पहले जलेगा। उसको सुनते हैं, तो ऐसा ईर्ष्या होती है हम लोगों को कि हमको छोड़ के आप रेडियो सुन रहे हैं। वो बचपन में एक क्वेश्चन करेगी, तो हम लंबा 101 वाक्य लगातार बोल गए। और बोल के फोन रख दिए। चाहे एक्सीडेंट में जाए, चाहे हाथ पर लेटे जाएगा। वो ना नारायणी नहीं गई। लेटे कौन सा एक्सीडेंट हुआ था? उनका बोलते-बोलते चली गई। सहस्त्र मूर्त बोलो। सह नमोताय। सहस्र मूर्तय नमोताय। नमोस्तु अनताय। माने हे अनंत भगवान, आपको नमस्कार है। आप कैसे हैं? सहस्त्र मूर्त अनंत रूप हैं। आपके एक साथ अनंत रूप वाले आप हैं। नमो तताय। सहस्र मूर्त नमोताय। सह सहस्र पादा। सहस्र पादा सुरो अक्षी। माने आंख हजारों। आपके अनंत पैर हैं, अनंत आंखें हैं। पाद माने चरण, अक्ष माने आंख और सिर अनंत है। और वक्षस्थल अनंत है। शुरू सिर उ और बाहु भुजाएं अनंत हैं। अनंत पादा शिशु रुबावे। अनंत पावे। अनंत नाम में अनंत नाम पुरुषाय शास्वते। पुरुषायते आपके नाम भी अनंत हैं। और आप शाश्वत पुरुष हैं। अनादि काल से आप भगवान हैं। अनंत नाम में पुरुषाय शासते। अनंत नाम पुरुषाय शासते। अनंत कोटि युग धण नमः। अनंत कोटि युग। अनंत कोटि युग धारणी नमः। अनंत कोटि नमः। संस्कृत के श्लोक बुलवा लेता हूं गधों से। अरे भाई, आंख बंद करने की किसी की इच्छा है? तू भी तो याद रहनी चाहिए। भाई, अपने मुख चंद्र को तुम छुपाती हो। हाथ ऐसे तो कहो, छुपेगो चंद हाथन दुराईबो। यह रस खान दिन द्व में बात फैली ज है। दो उनको दो, उन मृद मुस्कबो। दो पड़े पया। दो लेत है बलैया। उन्हें भूल गई। उन्हें गागर उठाईबो। मोहब्बत सुनो, दिल का कहीं तसवुर होता है। तसवुर तो साकार वस्तु का होता है। दिल तो निराकार है, उसका तसवुर कैसे होगा? करो फिर नवधा भक्ति करो। विष्णु भगवान को अपने मन बुद्धि को समर्पित करो। शरणागत होकर के नौधा भक्ति करो। कानून में कोई गड़बड़ नहीं कर सकता। राम जिनके लड़के थे, दशरथ जी को भी मरना था। मरे, उसको कोई कुछ नहीं कर सकता। वहां तो मजबूरी है। जिसके मामा श्री कृष्ण भगवान, बाप अर्जुन, गीता ज्ञानी महापुरुष। तो अभिमन्यु मारा गया। दूसरा कौन दावा करे? बहन भी हो। और वैसा जैसा दृश्य था नेहा का, देखे चक्कर आ जाए। तब भूल जाए कौन है, हमारा कांप जाए। अरे, कितनी खून की धार निकल रही होगी जब सर कटा है उसका। वो दृश्य देखा जाता। किसी पता नहीं कौन सी ईश्वरीय शक्ति ने इनको सब करवा दिया। इनसे अकेले ऐसा केस देख कर के इधर आ कर लेते हैं। कौन झगड़े में पड़े? इनके कहा है, तुम ले जा रहे हो। तुम अपने रिस्क ले जाओ। इनका हम ले जाएंगे। अपने गाड़ी वाले ने कहा है। दो बार में होता है कि भगवान हेल्प करते हैं। शक्ति वहीं से आती है। किसी की मारफत नहीं आती। अपने को पावर हाउस से मतलब। किसी के थ्रू आवे, थ्रू आई। उसका पता लगाओ। दुनिया यहां पे नाटक कौन करे? इन लोगों ने बाद में देखा है। बताया है कि गाड़ी का ऐसा भुर्ता हुआ है कि ये ये दोनों बच कैसे गए। ये तीन-तीन बच गए। कैसे बच गए? ये हमारा ड्राइवर गया था। जीवन तो कहा कि मैंने जिंदगी भर में गाड़ी चलाई है। ऐसा बड़ा एक्सीडेंट मैंने नहीं देखा है। फिर तीन-तीन बच गए। हम भी कहते महाराज जी, ऐसा हो। क्या कह दिया? हमने प्रदीप हो गए। मतलब आप झूठ भी नहीं बोल पाए। और अपना भी बचाव कर गए। और अपना बचाव कर है। या कोई भी पाप है, उसके लिए शास्त्र का आदेश है कि मन निमित्तम कृतम पापम मत धर्माय कल्पते। अगर उद्देश्य सही है, सही है, तो वो अधर्म भी धर्म हो जाता है। संकटे प्राण का संकट आवे, तो वहां झूठ भी बोल सकते हो। सब प्रकार के फ्रीडम है। शास्त्रों में बड़ी बात तो ये हुई कि ये सब कांड में तुमने जो हेल्प किया, वो सारे सत्संगियों के तुम बड़े प्रिय बन गए। और हमारे तो बन ही गए। ये संजोग ये भी तो बन गया ना। और सारे जीवन तुमको अपने आत्मा में संतोष रहेगा। सुख मिलेगा सोच करके कि मेरे हाथ से कितना बड़ा अच्छा काम हो गया। कभी सोचा नहीं था मैंने किया। इतना बड़ा काम मैं इस लाइफ में कर सकूंगा। और बिना किसी प्लान के सब ऑटोमेटिक हो गया। और सब तुम्हारे मुआफिक होते गए। डॉक्टर भी बहु बात व्यवहार की। तमाम बातें सुनना या बोलना टाइम खराब हो, तो मन खराब हो। काम की बात करना चाहिए। चाहे सगी बहन हो, सगा भाई हो, कोई हो। हमारे देश में बीमारी है। दो आदमी बैठे हैं। अरे, बोलती क्यों नहीं? बोलती नहीं। अरे, अनावश्यक क्या बोले? कोई बात हो, तो बोले। नारायण हरि भजन में ये पांचो न सुहा विषय: भोग, निद्रा, हंसी, जगत, प्रीत। बहु बात ये पांच चीजें। दोनों परदेश जा रहे थे। रुपया कमाए। गांव उस जमाने में कोई और था नहीं। पैदल चलते थे। एक जगह कम हो गई। भूखे दोनों। एक के पास धान था और एक के पास सत्तू था। लेकिन धान वाला बड़ा चालाक था। दोस्त और सत्तू वाला बेचारा। गोला बना। तो धान वाले ने सत्तू वाले से कहा, "अरे, तुम्हारे पास सत्तू है। सत्तू क्या लाए हो? सत्तू लपेटू तो तब घबे, तो तब खावे, तो तब चल। बड़ा टाइम लगेगा।" और धान बेचारा भला कूटा खा चला। संक्षेप में बोल दिया कि धान तो बहुत आसान है। उसको कूट लिया और उसको खा लिया। और चल दिए। और सत्तू लपेटू तो कब घबे, तो कब खावे, तो कब चलबे। उसको लंबा करके काम। सत्तू वाला बेवकूफ बन गया। उसने बदल लिया। "भैया, हमको धान दे दो। तुम सत्तू दे दो।" तो सत्तू को उसने अपना पानी पानी डाला और खाया। तैयार हो गया। ये ढूंढ रहे हैं कहां कूदने का। मूसल मिले। मशीन बाकायदा मंगा के हॉस्पिटल से रखी गई थी। कि अगर 100 ग्राम भी कम हो जाएगा, पैराबेट तो उस दिन खा लेंगे। और कमी नहीं हुआ। 52 दिन तक। और साथ घेर के खड़े हो। जब तौलने लगे, सवेरे शाम दो बार तोले। कानपुर में आए उनके यहां प्रेमानंद के घर। तो हमने कहा, "अच्छा, लाओ भाई। अब तो लखनऊ छोड़ दिया। हमने अब खाएंगे। खुद डाट के खाया। लोगों ने कहा, 52 दिन का अनशन चो किया हुआ। पहले मौसम का रस लीजिए, फिर ये लीजिए, वो लीजिए। हमने खाया है सब कुछ। नहीं, पूरा खाना खाया। अब हुई बात कैसे हुई थी? मंजरी है ना, बहुत मोटी। जो हां, तो उन्होंने कहा कि मैंने 10 दिन में अपना 5 किलो वेट कम कर दिया। हमने कहा, "बकवास करती। गलत मशीन में ना पाए। 10 दिन में 5 किलो कम हो जाएगा।" और उन्होंने कहा था, "देख, मैं करता हूं। कह सबका कम होगा।" कहा, "अच्छा, देख लो। प्रत्यक्ष बस ऐसे बातें बाद में शुरू।

भगवान की कृपा और धर्म : Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

सोई जान जेह देहु जनाई जानत तुम ही तुम ही होई जाई राम कृपा बिनु सुन खगराई जान न जाई राम प्रभु ताई ठीक तो अब भगवान की कृपा आ गई। बीच में हमारी छुट्टी अब पहले भगवान की कृपा हो तब हम भगवान को जाने तब विश्वास हो तब प्रेम हो। फिर शास्त्र वेद आए। ना छुट्टी नहीं है यह कृपा किस पर होती है यह तो समझ लो किस पर होती है। हां, जिन जीवों पर हुई है, क्यों हुई है और हमारे ऊपर क्यों नहीं हुई। हां, यह बात तो है। हम कोई भगवान के दुश्मन तो नहीं हैं। हम भी संतान हैं। एक अनंत महापुरुषों पर कृपा हुई, वे लोग भगवान के लोक में परमानंद का उपभोग कर रहे हैं और हम 84 लाख का चक्कर काट रहे हैं। कोई ना कोई बात तो है। पता लगाना है तो वेदों ने कहा कि मैं इसीलिए तो आया हूं तुमको यह बताने कि कृपा कैसे होगी। तुमको कुछ करना है तब कृपा होगी। हमको क्या करना है तो वेद कहता है।

वेदा ब्रह्मा विषया त्रिकांड विषय में वेद में तीन कांड हैं, तीन मार्ग हैं कृपा के लिए कर्म, ज्ञान, भक्ति। क्यों तीन ही क्यों है? इसलिए कि भगवान का स्वरूप है सच्चित आनंद। सच्चिदानंद भगवान है। ना, हम उनके अंश हैं तो हम भी तीन काम कर सकते हैं: कर्म, ज्ञान और प्रेम। यही तीन हम भी करते हैं। रोज गलत एरिया में करें, वह अलग बात है। तो इसीलिए तीन मार्ग हैं भगवान के ओर जाने के लिए भी कर्म, ज्ञान, भक्ति। भागवत में भी कहा योगायो मया प्रोक्ता नणाम श्रे विधित सया ज्ञानम कर्म च भक्तिश्च तीन मार्ग। अब पहले मार्ग को लीजिए कर्म। कर्म माने धर्म। धर्म माने धारण करने योग्य। धारण करने योग्य जैसे आप खाना खाते हैं तो क्या खाना चाहिए, ये समझ कर खाते हैं ना? गोबर तो नहीं खाते। कोई अगर परस दे गोबर, ये क्या है? गाय का गोबर है। ये क्यों परसा है खाने के लिए? पागल हो गया। ये खाने की चीज थोड़ी है। ये खाने की चीज है आटा, दाल, चावल वगैरह के सामान, तरकारी है, फल है। ऐसे ही आत्मा के लिए धारण करने वाला सामान जो हो, उसको धर्म कहते हैं। वो कौन बताएगा? तो वेद प्रणहितो धर्म भागवत छ एक 40। जो वेद बतावे, यह धर्म है, यह अधर्म है। उसको कहते हैं विधि निषेध। यह करो, यह धर्म है। यह ना करो, पाप अधर्म।

तो जब वेदों ने तीन मार्ग बताया 11 21 35 में वेदा ब्रह्मात्म विषय त्रिकांड विषय में, तो उसने फिर बताया कि धर्म संपदते सज भी रधस्त विपरजया 11 21 15। छह शर्तें पूरी करें तो उसका नाम धर्म। जैसे जैसे यज्ञ करना है, आपको हवन करना है तो छह शर्त है। नंबर एक कहां यज्ञ किया जाए? कहां यज्ञ किया जाए? हमारे पंडित जी तो अपने आंगन में ही कर देते हैं। उसका नियम है शास्त्र में। तब यज्ञ शुरू किया जाए, वो भी नियम है। यज्ञ करने वाला शुद्ध अंतःकरण वाला हो, छल कपट अविश्वास युक्त नहीं। द्रव्य जिससे यज्ञ हो रहा है, वो सामान सही कमाई का हो, वर्णाश्रम धर्म के अनुसार और विधि जो वेद में विधि बताई है, उसके अनुसार यज्ञ हो और मंत्र जिस मंत्र से यज्ञ हो रहा है, वह मंत्र का उच्चारण सही सही हो।

पतंजलि भाष्य में कहा गया कि दुष्ट शब्द स्वरतो वर्णतो मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमा सबाजो जजमानम हनस्त यथेंद्र शत्रु स्वरतो पराधात। एक राक्षस था, उसने यज्ञ कराया कि हमसे इंद्र मार मारा जाए और मंत्र था इंद्र शत्रु विवर्धस्व। यज्ञ करने वाले मुनियों ने कहा, ये मेरा इष्ट देव है इंद्र और मैं ही यज्ञ करूं। और राक्षस ने कहा, नहीं करोगे तो मैं सबको मार दूंगा। और डर के मारे बेचारे तो मुनियों ने आपस में मीटिंग की कि इसको वेद मंत्र तो आता नहीं राक्षस को अपन चालाकी करो। अक्षर वही रहेंगे लेकिन आदात को अंतदात कर दिया। उदात कहते हैं ऊंचे स्वर से बोलना। तो वेद में तीन होते हैं: उदात, अनुदात, स्वरित। ऊंचे स्वर से बोलना इंद्र, ये इ पर जोर देना और अनुदात इंद्र नीचे ले आना। तो आददात का मतलब था इंद्र का शत्रु बढ़े, माने राक्षस बढ़े, इंद्र मारा जाए। उसको अंत्योदात कर दिया तो उसका मतलब हो गया कि इंद्र से राक्षस मारा जाए। उल्टा हो गया और यज्ञ हुआ और वत्रासुर मारा गया। मरते समय उसने भगवान से कहा, हम भी तुम्हारी औलाद हैं। तुमने वचन दिया था कि यज्ञ का जैसा मंत्र है, वैसे ही वरदान दिया। तो भगवान ने कहा, यही तो मंत्र का अर्थ है अंतोदात में। और ये तो ऋषि मुनियों की गलती है। ये तुम्हारे ही तो हैं। ऋषि मुनि बुलाए हुए, मैं क्या करूं? अरे, ब्रह्मा ने यज्ञ किया पुत्र पैदा करने के लिए, उसके इला लड़की हुई, पुत्र नहीं हुआ। विधि में गलती हो गई। काशी नरेश मारा गया, विधि में गलती हो गई। प्रह्लाद को मारने के लिए प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यपु के गुरु, उनके पुत्रों ने यज्ञ किया, विधि में गलती हो गई। तो प्रह्लाद नहीं मरा, गुरु पुत्र मर गए। एक स्वर में गलती हो जाए तो इतना कठिन है धर्म। इसलिए मुंडकोपनिषद कहता है, प्लवा हेते अदृढ़ यज्ञ रूपा अष्टाद वरम जे अविद्या मंत्र वर्तमान स्वयं धीरा पंडितम्य माना ज्यमाना परंत मूढ़ा अंधाना यथा अविद्याया बहुधा वर्तना भयं कृत्था बाला। यत कर्मणो न प्रद रागा तेना लोका इष्टा पूम मन माना। एक दो सात, एक दो आठ, एक दो नौ, एक दो 10, एक दो 12 परिक्ष लोकान कर्मचान्या। तक मुंडकोपनिषद ने कहा कि ये कर्म धर्म अगर कोई कर भी ले सही सही तो उसका फल है स्वर्ग। वह है नश्वर। वहां भी माया है, वहां भी काम, क्रोध, लोभ, मोह, राग, द्वेष। सब यहां के सुख से वहां का सुख करोड़ों गुना बड़ा है। ये ठीक है लेकिन एक तो वो लिमिटेड है, दूसरे नश्वर है, तीसरे दुख का मिक्सचर है। जैसे आप लोग मोटरसाइकिल पर जाते हैं, एक गरीब आदमी पहली बार आगे कार देखा। कार होती तो अब कार मिल गई। Maruti कार से जा रहे हैं। आप उधर से BMW देखा, एक करोड़ की यह गाड़ी है। हमारी गाड़ी क्या? यानी वो वर्तमान सुख गया अपने से आगे वाले को देख के। अपने एरिया में तहसीलदार, एक सब इंस्पेक्टर हैं, खराब है। एसपी साहब आए, एसपी के आगे आईजी आए, सब दुखी हैं। वो सुख दुख से युक्त है। ये स्वर्ग का हाल है। कठोपनिषद कहता है, हमारी भी सुन लो शोभा मतसदंत तत सर्वेणा जरती तेजा। एक एक एक 26। कठोपनिषद पुण्यजितो लोकक्षयते। छंदोग्य उपनिषद आठ 11 कोटियां बताई स्वर्ग के सुखों की। शशानंदस मीमानसा भवती तैत उपनिषद दो आठ। सर्वत्र माया का अधिपत प्रश्नोपनिषद पुण्यन पुण्यम लोकम नति पापेन पापम उभा्या मनुष्य लोकम। प्रश्नोपनिषद तीन सात न ध्रुव प्राप्तते ही ध्रुवं तत। कठोपनिषद एक दो 10। भागवत में देख लीजिए, दुख दकाम निष्ठा शद्रंदा सुचारिता आदंतवंत एव स्वर्ग में दुख है, अशांति है, अतृप्ति है, अपूर्णता है। आिचाद मंगलम कर्मणाम परिणामित्वा। ये भागवत कह रही है, तावत प्रमोदते स्वर्ग जावत पुण्यम समाप्यत। जब तक पुण्य है, स्वर्ग में रह लीजिए। पुण्य समाप्त हो गया, अब कुत्ते, बिल्ली, गधे की योनियों में डाल दिया गया। हीन तरंबा विष जजा बिरिंच निरया चकार 9 5 25। भागवत ब्रह्मलोक को भी वहां के सुख को भी नरक के समान मानते हैं जो परमानंद पा चुके। और गीता देख लीजिए, तेतम भक्त स्वर्ग लोकम विशालम छने पुण्य मृत लोकम 92। या देवता देवा जानता भूतान जान भूते 925। देवा देव जजो जानती मद भक्त जानती माप सात 23। आ ब्रह्म भोका पुनरावर्तन अर्जुन आठ 16। उधम गच्छती सतस्था मध्य तष् राजसा जघन्य गुण वृत्तस्था अधो गच्छती तामसा। गीता 14 18। स्वर्ग की सर्वत्र निंदा एवंम लोकम परम विद्या नश्वरम कर्म निर्मितम। भागवत 11 तीन 20। सत्व प्रलीना स्वरती नररोकम रजोलया तमोलयास्तु निरयम जानमाव निर्गुणा 11 25 22। स्वर्ग स्वप्पंत दुखदाई। तो कर्म धर्म का फल स्वर्ग है, वह यह है नश्वर, माया के अंडर में है। वहां भी दुख, अशांति है।

विरह का भाव

ये श्रेष्ठ भाव बताया गया है। मिलन से भी श्रेष्ठ विरह भाव रसिक लोग कहते हैं कि मिलन भाव में प्रियतम एक ही स्थान पर दिखाई पड़ते हैं, लेकिन जब विरह का भाव हो तो प्रियतम हर जगह दिखाई पड़ते हैं। इसलिए श्रेष्ठ भाव और प्रेम का बढ़ना भी वो विरह में अधिक होता है, मिलन से भी अधिक। क्योंकि मिलन में एक चीज ये भी होती है कि जब प्रियतम सामने है तो उनमें दोष भी दिखाई दे जाएंगे। वे हमारे अनुरूप नहीं हैं, हमारे अनुकूल नहीं हैं। यह दोष की प्रवृत्ति भी आ सकती है, दोष बुद्धि भी आ सकती है। लेकिन विरह में दोष बुद्धि नहीं आती, वहां केवल प्रेम बढ़ता ही जाता है। इसलिए रसिकों ने विरह को श्रेष्ठ बताया मिलन से भी।

तो ये भी जो पद हम लोग अभी गाएंगे, यह विरह माधुरी का पद है। और आप लोगों ने यदि ध्यान दिया हो तो श्री महाराज जी ने प्रेम रस मदिरा में 21 माधुरिया बनाई हैं। और उन 21 माधुरियों में विरह माधुरी में ही सबसे अधिक पद है। सबसे अधिक पद विर विरह मा। क्योंकि विरह ही हमारे प्रेम को बढ़ाता है। प्रेम हमारा कब बढ़ेगा? जब ये हृदय प्रियतम की याद में व्याकुल होगा, तड़पेगा तभी तो प्रेम बढ़ेगा। और भीतर कोई व्याकुलता ही नहीं, मिलन की ऐसी कोई तड़प ही पैदा नहीं हो रही कि श्याम सुंदर से मिलन हो जाए, उनका दर्शन हो जाए। तो फिर ऐसे प्रेम का भी क्या लाभ? उस प्रेम में तो वृद्धि ही नहीं होगी कभी।

और प्रेम किसे कहते हैं? प्रतिक्षण वर्धमानम। प्रेम का स्वरूप क्या है? जो प्रतिक्चर बढ़ता जाए, उसको प्रेम कहते हैं। हम लोग भी प्रेम तो करते हैं हरि गुरु से, लेकिन हमारा प्रेम एक ही लेवल पर बना हुआ है, बढ़ नहीं रहा। आप लोग कभी अपने आप को ध्यान से देखिए, क्या हमारा प्रेम बढ़ रहा है? घट भले ही रहा हो, बढ़ता हुआ नहीं दिखाई पड़ रहा। क्योंकि अगर बढ़ता हुआ दिखाई पड़ता, तो उसके लक्षण होते कि हां, अब तो उनसे मिले बिना रहा नहीं जा रहा, भीतर तड़प पैदा हो रही है। ये सांसारिक चीजें अच्छी नहीं लग रही, सब सांसारिक प्रपंच व्यर्थ रखता है। सांसारिक लोग व्यर्थ रखते हैं, सांसारिक कार्य व्यर्थ लगते हैं। सब व्यर्थ लगता है। क्या ऐसी अवस्था हो रही है हमारी? अभी तो नहीं हो रही, अभी तो संसार का सब कुछ अच्छा लग रहा है।

तुलसीदास जी ने बड़ा सुंदर कहा है विनय पत्रिका में: "जो मोहि राम लागते मीठे, तू शट रस नवरस अन रस रस है जाते।" सब फीके जो मोह राम लागते मीठे। कितना सुंदर कहा कि अगर राम अच्छे लग रहे होते, मीठे लग रहे होते, तो अपने आप संसार के सारे रस फीके लगते। अभी सांसारिक रसों में आनंद मिल रहा है, तो इसका अर्थ है कि अभी राम मीठे नहीं लग रहे। तो हम अपने आप को स्वयं ही तोल सकते हैं कि हमारा प्रेम बढ़ रहा है या घट रहा है, या एक ही जगह पर स्थिर हो गया है। स्थिर हो गया है तो भी प्रेम नहीं, और घटना तो प्रेम का स्वरूप ही नहीं है। प्रेम का स्वरूप तो केवल बढ़ना है। जो प्रतििक्षण बढ़ता जाए।

तो हमारे भीतर वो विरह का भाव आए, बहुत आवश्यक है। विरह मांगना चाहिए हमें श्याम सुंदर से कि हमें विरह दे दीजिए। श्री महाराज जी ने अपने एक संकीर्तन में भी लिखा: "ना दे दो ऐसी विह वेद ना मिट जाए मम अहम चेतना। ऐसी विह वेदना दे दीजिए हमारे इस हृदय में कि जो अहम भरा हुआ है भीतर, वो उस विरह अग्नि से वो अहम जल जाए। ऐसा विरह प्रदान कीजिए।" तो विरह मांगना चाहिए हमें। जितना जितना हमारा विरह बढ़ेगा, हम आगे बढ़ेंगे। इस हृदय में वो उत्कंठा, वो व्याकुलता, वो तड़प पैदा होगी, तब हम आगे बढ़ते जाएंगे। हमारी साधना आगे बढ़ेगी, प्रेम आगे बढ़ेगा। यानी हम जिस मार्ग की ओर चल रहे हैं, अभी हम रुक गए हैं। भीतर वो व्याकुलता नहीं आ रही, इसलिए आगे नहीं बढ़ पा रहे। हमें ये तो पता है कि हमारा लक्ष्य क्या होना चाहिए, भगवत प्राप्ति। ये तो पता चल गया, लेकिन भगवत प्राप्ति कैसे होगी? वो ठाकुर जी से मिलन कैसे होगा? यह जानते हुए भी आगे नहीं बढ़ रहे। जानते हैं कि हां, ठाकुर जी से मिलन प्रेम से ही होगा। जब जैसे जैसे हमारा प्रेम बढ़ेगा, जैसे जैसे हम तड़पेंगे उनकी याद में, वो भी तड़पेंगे फिर हमारी याद में। जब हमारी ये स्थिति हो जाएगी कि अब उनसे मिले बिना एक क्षण भी रहा नहीं जा रहा, तो उनकी भी वैसी स्थिति होगी।

श्री महाराज जी ने बताया है ना कि अगर हम यह जानना चाहें कि हरि गुरु हमसे कितना प्रेम करते हैं, तो अपने हृदय पर हाथ रख के सोचो, हम कितना करते हैं। क्योंकि हम जितना करते हैं, उतना उनको भी करना पड़ेगा। अगर हम उनके लिए व्याकुल होते हैं, ऐसा नहीं कि हम आंसू बहाते जाएं और ये सोचें, अरे, उनको तो कुछ पड़ी नहीं हमारी। हम ही आंसू बहाते रहते हैं, उनके लिए व्याकुल होते रहते हैं। ऐसा नहीं। जब हम आंसू बहाते हैं, हम व्याकुल होते हैं उनके लिए, तो वे भी व्याकुल होते हैं हमारे लिए। बस हमें अपनी वो व्याकुलता बढ़ानी है, अपनी तड़प बढ़ानी है। तभी तो वे भी उधर से दौड़ के आएंगे। ये जीव अब मेरे बिना रह नहीं सकता। अब तो इससे मिलन करना ही होगा, इसको मिलन का प्रेम देना ही होगा। तब वो दौड़ के आएगी। इसलिए मिलन से भी ज्यादा वो विरह भाव अपने भीतर लेकर के आओ। वो विरह भी तो क्या चाहता है? मिलन ही तो चाहता है ना। विरह में हम क्या चाहते हैं? विरह हमें परेशान करता है, हमारे प्रेम को बढ़ाता है। उस विरह में भी तो हम मिलन ही तो चाहते हैं। तो विरह से मिलन की स्थिति उत्पन्न होगी। इसलिए विरह को उड़ाना वो आवश्यक है। पहले इसलिए विह मांगा करिए हरि गुरु से। रोरो करके दे दो ऐसी वेदना, जिसमें हमारे शरीर का, मन का, बुद्धि का सबका अहंकार जलकर भस्म हो जाए। ऐसी वेदना प्रदान कीजिए।

यहां ये जो पद श्री महाराज जी ने लिखा, इस पद में भी एक गोपी का विरह भाव है। श्याम सुंदर मथुरा चले गए। अब गोपियां, वो तो प्रेम की आचार्य रहीं। उनसे अधिक प्रेम तो आज तक कोई कर नहीं पाया। अब उस गोपी की कैसी अवस्था है? वो कहती है: "ओ रसिया, कस सुरति बिल आप चले गए मुझे छोड़कर। तो मेरी तो सुरति ही मिसार दी आपने। अब आपको मेरा कोई स्मरण ही नहीं, मुझे भूल गए। वहां जाकर के आप। मैं तो लोक वेद कुलकानी आ सब तज आई पिय शरण तहारी। मैं तो ये संसार सारे लोक वेद की सब मर्यादा आदि सबको छोड़ के, सबका त्याग करके बस आपकी शरण में आई थी। और आप मेरा ही त्याग करके चले गए मथुरा। कैसे आपने भुला लिया मुझे?"

मग जोहत अखिया पतराई हारी, हे विपिन बनवारी। हर दिन, हर क्षण ये आंखें आपकी की प्रतीक्षा करती हैं, आपका रास्ता देखती हैं। तो यही भाव रहता हृदय में, किसी क्षण तो प्रियतम आएंगे। वन वन में घूम घूम कर आपको ढूंढते ढूंढते मैं हार गई हूं। आप कहां हैं? तारे गिनत जात सब यामिनी पलक एक युग सम लगारी। अब तो रातें भी कैसे कटती हैं? तारे गिनगिन कर इन आंखों में नींद भी नहीं आती। आपके विरह में केवल दिन रात ये आंखें बहती हैं। और रात को भी तारे गिनगिन के रात कटती हैं। तो आपका आगमन कब होगा? आपसे मिलन कब होगा? अब तो एक एक पल भी युग के समान भारी लग रहा है।

निर्मोही कस मोह मोह अब तड़पावत बेतीर मुरारी। आप तो निर्मोही हो गए। मुझे पहले तो मोह लिया। या तो मुझसे प्रेम ही ना करते, तो भी हमारी आज ये अवस्था तो ना होती। हम आपके लिए ऐसे बेचैन तो ना होते, ऐसे तड़प तो ना रहे होते। तो पहले तो मुझे मोह लिया, मेरे मन को, मेरी बुद्धि को सब मोह लिया। और अब बेर हो गए। अब आपको कोई फर्क नहीं पड़ रहा कि मैं कैसे तड़प रही हूं। यहां हम आपके बिना कैसे रह रहे हैं? अब आपको इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा। ऐसे बेतीर हो गए आप। जत लेत नहीं प्राण दुभा अति विपत्त हमारी। और ऐसी अवस्था हो गई है कि ना तो जिया जा रहा है और ना ही प्राण ही निकल रहे हैं इस शरीर से।

देखिए गोपियों की अवस्था ऐसी थी। इतना विरह था उनके भीतर जब ठाकुर जी से गए। लेकिन किसी गोपी ने शरीर का त्याग नहीं किया उस भाव में भी। क्योंकि उनके भीतर ये एक भाव था, ये शरीर भी श्याम सुंदर की धरोहर है। निष्काम प्रेम किया था ना, अपना सब कुछ नछावर कर दिया श्याम सुंदर को। समर्पण कर दिया। शरीर भी उनकी धरोहर है। तो उनके अनुपस्थिति में शरीर से प्राण भी कैसे निकल जाए? वे कभी आ गए और उन्होंने ढूंढा हमें, तो फिर क्या होगा? उनको कष्ट होगा। ये भाव इसलिए प्राण भी नहीं निकल रहे। प्राण भी नहीं त्यागती वो गोपियां। ऐसा प्रेम। वो कहती है: "अब ना तो जिया जा रहा है, ना ही प्राण ही निकलते हैं शरीर से। दोनों तरफ से हमारी मुसीबत हो गई। ऐसी अवस्था में पड़े हैं हम। अब कृपाल मोक तज माधव उबरी वर निज उ करी उ धारी।" तो वो सखी अंत में कहती है: "गोपी, लगता है अब हमारा त्याग करके जो मथुरा गए हैं ठाकुर जी श्याम सुंदर, वहां उनको कुवरी वो मन भा गई है। उससे प्रेम कर लिया उन्होंने। इसलिए अब उनको हमारी याद नहीं आ रही है। उमरी से मन लगा लिया। वो मन भा रही है।" ये उलहाना दे रही है प्रेम में। गोपी तो जैसा इस गोपी का भाव है कि प्रियतम ब्रज छोड़कर गए हैं, हमारा त्याग करके चले गए। और वो जो उसकी अवस्था है, वैसी अवस्था अपने भीतर भी हमको लेकर के आनी है कि प्रियतम कब आपसे मिलन होगा।

तो वही विरह का भाव लेकर के तब इस पद का गान करें, रूप ध्यान सहित। और रूप ध्यान करते हुए आंसू बहाते हुए। ये जरूर प्रयास किया करिए कि अश्रु तो बहे इन आंखों से। ऐसे सूखा सूखा कीर्तन नहीं करना है। अभी भी हम प्रवचन सुन रहे थे, उसमें श्री महाराज ने क्या कहा? पहले स्मरण, फिर कीर्तन। इसलिए रूप ध्यान आवश्यक है। और रूप ध्यान करते हुए आंसू बहाना भी उतना ही आवश्यक है। आंसू कब आएंगे? जब सच में रूप ध्यान करते हुए उस भाव में डूबेंगे, तभी तो आंसू आएंगे। और केवल आंख बंद कर लिए और आंख बंद करके मन यहां वहां विचरण करने गया, तो फिर तो आंसू नहीं आएंगे। इसलिए उस रस में डूबिए, अपने मन को डूबाइए उस भाव में लेकर जाइए। तब इन आंखों से आंसू बहेंगे। तब कीर्तन करना, पद गायन करना, साधना करना हमारा सार्थक होगा। इसलिए आंसू बहाने का विशेष प्रयास करो। रूप ध्यान में जाओ, भीतर उस भाव के उतरो। ना आंसू आए, तो धिक्कारो अपने आप को कि मन, तुझे किस बात का अहंकार है? किस बात का? क्या है तेरे पास जो प्रियतम के मिलन की उत्कंठा लेकर के भी इन आंखों से आंसू नहीं बह सकते? धिकारी अपने आप को, अपने मन को डांटिए। ना आंसू आए। और ये सोचिए, यदि आंसू बहा के हमने साधना न करी, तो फिर शिव महाराज जी को भी तो प्रसन्नता कैसे होगी? भला, वे भी तो उसी से प्रसन्न होते हैं। यहां जिन जीवों के साथ इतना परिश्रम मैंने किया, इनको बारंबार इतना समझाया, आंसू बहाओ, आंसू बहाओ। अभ्यास करो। हां, ये जीव अभ्यास कर रहे हैं, आंसू बहा रहे हैं। खूब आंसू बहाना पड़ेगा। बिना आंसू बहाए तो उनसे मिलन होगा नहीं। और तब तक आंसू बहाने होंगे। श्री महाराज ने लिखा है ना, तब तक आंसू बहाओ जब तक श्याम सुंदर स्वयं आकर अपने पीतांबर से तुम्हारे आंसू ना पहुंच दे। तब तक उन आंसुओं को सच्चा भी मत मानना जब तक श्याम सुंदर स्वयं आ के ना पूछ ले अपने पितांबर से। इसलिए आंसू बहाओ, आंसू बहाओ। धीरे-धीरे, धीरे आंसू भी हमारे सच्चे।

Source : SUSHREE NIKUNJESHWARI DEVI JI


Significance of Navratri and the Purpose of Celebrations

Ramlila and Durga Puja

During Navratri, Ramlila enactments take place across North India, culminating in Dussehra (Vijayadashami) to celebrate the victory of virtue over evil. Concurrently, Goddess Durga is worshipped in her various forms.

Material vs. Devotional Worship

Most people (99.99%) worship Goddess Durga or participate in celebrations like Garba for selfish material desires or entertainment. Only a rare fraction (1%) prays to the Divine Mother with tears of love, asking her to connect them with Lord Krishna ("Mohe Shyam se mila de Durge Maa").

Unity of Divine Forms

Goddess Sita, Radha, and Durga are non-different forms of the single Supreme Divine Mother.

Core Spiritual Goal

Quoting Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj, Sushri Gopeshwari Devi Ji stresses that any festival or celebration is meaningful only if its exclusive purpose is to attain divine love (prema/bhakti) for God; otherwise, it is a waste of time.

The Value of Human Birth and the Forgotten Promise

Rarity of Human Life

After soul transmigrations through millions of species (Janmantah sahasreshu manushyatvam durlabham), God mercifully grants a human birth.

Divine Knowledge in the Womb

While in the mother's womb (around the 7th–9th month), God grants the soul complete divine wisdom (Deen Gyan). Experiencing the distress inside the womb, the soul folds its hands and promises God: "Bhajiho Nand Kumar" ("I will remember and worship You once released").

Forgetting the Promise

Upon birth, due to the intense pain of delivery and growing attachments to the material world (Maya), the soul forgets its promise.

Unique Human Capacities: Gyan Shakti and Karma Shakti

Human beings are endowed with two special powers not possessed by animals or celestial beings:

  • Gyan Shakti: A highly developed power of reasoning, discrimination, and spiritual understanding.
  • Karma Shakti: The capacity to perform intentional actions (karma) and reap their spiritual or karmic results (Karma Pradhan). While animals and celestial beings only experience past karma, humans have the freedom to choose actions that lead to liberation and God-realization.

Lord Ram’s Three Prerequisites for Devotion

Quoting Lord Ramachandra Ji from the Ramayana ("Kaho bhakti path kavan prayasa..."), she explains that Bhakti does not require difficult physical rituals, austerities, or complex vows (yog, jap, tap, makha, upavasa). Instead, Lord Ram emphasizes three core internal qualities needed to begin devotion:

Saral Svabhav (Simplicity and Guilelessness of Nature)

Developing an inner nature as plain and honest as an innocent child, free from split personalities, secrecy, or deceit.

Illustrated through Yudhishthira’s unyielding honesty in the Mahabharata and a personal anecdote with her Guru, Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj, highlighting the importance of speaking without artifice or pretense.

Na Man Kutilai (Absence of Deceit or Cunning in the Mind)

Maintaining a mind free from internal calculation, tricks, or crookedness, as exemplified by pure devotees like Shabari and Vidurani.

Jatha Labh Santosh Sada (Everlasting Contentment)

Remaining satisfied with whatever situation or spiritual progress one receives, avoiding envy or harmful comparisons with others.

Conclusion of Day 1

Day 1 lays down the qualifying mindset required for a practitioner of devotion. The detailed explanation of the nine individual forms of Navadha Bhakti is set to continue on Day 2.

The discourse concludes with the singing of the Ram Aarti (Shri Ramachandra Kripalu Bhajman).

नवरात्रि में मां दुर्गा की उपासना


नवरात्रि उत्सव पर मां दुर्गा से हम क्या मांगे जो गोपियों ने मांगा था। गोपियों ने मां दुर्गा से यही वरदान मांगा था: कात्यायनी दुर्गे देवी। कात्यायनी दुर्गे देवी गोविंद राधे, तू श्याम की सखी, श्याम से मिला दे। नवरात्रि की उपासना इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए होनी चाहिए।

यहां पर साधक के शब्दों में: हे मां दुर्गे, हे कात्यायनी देवी, तुम तो श्याम सुंदर की सखी हो और सखी की अनुकंपा से श्याम सुंदर मिलते हैं। हे मां, मुझे श्याम सुंदर से मिला दो। गोपी प्रेम की प्राप्ति दुर्गा पूजा का सर्वोच्च लक्ष्य है। जिस गोपी प्रेम की याचना स्वयं नारद जी कहते हैं।

यथा ब्रज गोपी का नाम, जिस गोपी प्रेम को पाने के लिए स्वयं शंकर जी महाराज के समय में नारी शरीर धारण करके ब्रज में प्रवेश किए थे। राधा रानी की कृपा से उनको रास में प्रवेश मिला। तो नवरात्रि में हम सर्वोच्च सामान गोपी प्रेम मांगे मां दुर्गा से।

मां दुर्गा की उपासना सांसारिक सुख, स्वच्छंद्य, सांसारिक विषयों की प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि उनकी कृपा से हमको भक्ति मिल जाए। इसीलिए मां दुर्गा की उपासना होनी चाहिए। शक्ति की उपासना, भक्ति की प्राप्ति के लिए यही नवरात्रि का उद्देश्य होना चाहिए।


कैसे मनाएँ नवरात्रि - कैसे उपवास का मिलता है सर्वश्रेष्ठ फल?

 भारतीयों के यहां हजारों पर्व हैं, बल्कि 365 दिनों में सभी दिन पर्व हैं। हर त्यहार में हम लोगों ने बिगाड़ा कर लिया त्यहार का, और क्या करते हैं? हम माल टाल खाते हैं। आज तो त्यहार है। यह त्यहार नहीं है, ये तो और उल्टा है। सर्व पर्व, सर्व पर्व लक्ष्य एक गोविंद राधे पर। लक्ष गोविंद, सर्व पर्व लक्ष्य एक गोविंद राधे। पार्वक्ष जग से हटा के मन हरी में लगा से लगा।

ये जो हमारे भारतीयों के यहां हजारों पर्व हैं, बल्कि 365 दिनों में सभी दिन पर्व हैं, क्योंकि सारे अवतार यही होते हैं और बड़े-बड़े सब महापुरुष भी यही होते हैं। तो उन अवतारों का जन्म, यानी अवतार का दिन और अवतारों का फिर स्वधाम गमन का दिन, ऐसे ही महापुरुषों के अवतार का दिन और महापुरुषों का भी भगवत धाम गमन का दिन। इस प्रकार अनंत महापुरुष हुए, दिन तो 360 ही होते हैं साल में। तो हर दिन पर्व है।

लेकिन बाहरी कारण कुछ भी हो, तत्वज्ञों की दृष्टि में प्रत्येक पर्व का एक ही लक्ष्य है कि तुम जिस कारण दुखी हो, अशांत हो, अतृप्त हो, अपूर्ण हो, उस कारण को मिटाने का इलाज करो, दवा करो, औषधि करो। संसार से मन हटाकर भगवान में लगाओ। सारे त्योहारों का यह उद्देश्य है, और बाकी उद्देश्य सब बनावटी है, नकली है। जैसे हर त्यहार में हम लोगों ने बिगाड़ा कर लिया त्यौहार का, और क्या करते हैं? लाल टाल खाते हैं। आज तो त्यहार है। हां, गुजिया बनेगी, पूरी बनेगी, हलवा बनेगा। हां, बड़ी खुशी हो रही है सबको। नाग पंचमी आ रही है, होली आ रही है, दिवाली आ रही है। गरीबों को इन्हीं पर्वों पर थोड़ा अच्छा खाना मिल जाता है, चाहे कर्जा करके वह लोग अच्छा खाना बनाते हैं। पकवान ये त्यहार नहीं है, ये तो और उल्टा है। मन को और खराब करना वैराग्य नहीं है, ये तो राग है। रसना, इंद्रिय को और मन बढ़कर देना, ये उल्टा करते हैं हम लोग।

अब बड़े-बड़े बाबा लोग दाढ़ी रखकर व्रत रहते हैं। तब सब पर्वों पर व्रत, व्रत क्यों रहते हैं? आज तो रबड़ी, मलाई और मिठाई। हां, मालटा मिलेगा। हां, एकादशी है, पूर्णिमा है, राम नवमी है, जन्माष्टमी है। यह रसना, इंद्रियों को और बढ़ावा देना, यह व्रत नहीं है। वेद में उपवास शब्द का अर्थ लिखा है। वेद में बराहो उपनिषद के दूसरे अध्याय का 39वां मंत्र है, उसमें लिखा है: उपसमीपे योवासो जीवात्म परमात्मा उपवास सविो नातु कास्य शोषणम। काया को, शरीर को सुखाना, विटामिन, प्रोटीन ढंग से ना देना, यह उपवास नहीं है। उप माने समीप और बास माने जीवात्मा का परमात्मा के पास जाना। यानी मन को भगवान में लगाना, यह उपवास है।

रूप समीप यो भासो जीवात्म परमात्मनो। जीवात्मा परमात्मा के पास अपने मन का वास करावे, ले जाए। ये उपवास है। ये तो हम करते नहीं। आज तो माल टाल खाएंगे। ये पर्व मनाते, हम लोगों ने बिगाड़ दिया। हमारे आचार्यों ने तो बताया था कि देखो, इतने पर्व हम बना रहे हैं। इसका मतलब कि अगर तुम पूरे 360 दिन भगवान की भक्ति ना करो, तो कम से कम 100 दिन तो करो, जो व्रत के दिन हैं, पर्व के दिन हैं। लेकिन हम लोग भी अपनी बुद्धि से काम करते हैं। शास्त्र, वेद बोला करें कुछ। हां, सब गड़बड़ झाला कर दिया हम लोगों ने। इसलिए सिद्धांत समझ लो, प्रत्येक पर्व का, त्यहार का लक्ष्य है भगवान में मन लगाना।

स्वास्थ्य और मन की स्थिति

स्वास्थ्य केवल शरीर नहीं, मन भी है। मन ठीक नहीं, तो शरीर गड़बड़। शरीर ठीक नहीं, तो मन गड़बड़। तो जब यह दोनों एक दूसरे से संबद्ध हैं और भगवान को मन चाहिए, गुरु को मन चाहिए, तो मन यदि चिंताजनक स्थिति में रहेगा, तो वह साधना आराधना नहीं कर पाएगा। इसलिए जहां-जहां मन बाधक बनता है, उस स्थिति को, उस समय को, उस वातावरण को हमें शुद्ध करना है। जो अशुद्ध वातावरण आपके अंदर तमोगुण, गलत विचार, बुरे विचार पैदा करें, उस कंडीशंस को हटाइए। उस सिचुएशन को हटाइए। यहां मन पूरी तरह डूब जाता है और जहां मन डूबता है, जिसके लिए डूबता है, उसकी छाप हमारे हृदय में बन जाती है और उसी का फल मिलता है।

तो इसीलिए आप सब से मेरा अनुरोध है, मन को जितना पावन बनाएंगे, पवित्र बनाएंगे, उतना जीवन पवित्र होगा और शरीर भी स्वस्थ रहेगा। अपने चिंतन को शुद्ध रखिए। सांसारिक चीजें जो आती हैं आपके जीवन में, जो समस्याएं हों या परेशानियां हों, उसको जीवन का एक भाग मानना है। उससे घबराना नहीं है। वह सबके जीवन में आएंगी। सबके जीवन में आपको देखने में ऐसा लगता है, वह तो बड़ा खुशमिजाज है, उसको कोई परेशानी नहीं, वह तो बड़ी मस्ती में रहता है, सुखी है। ऐसा नहीं। ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है, जिसके जीवन में यह दोनों चीजें ना हो। वरना वह जीवन नहीं, लाइफ नहीं। लाइफ के दो पहलू हैं। जहां द्वंद है, यदि आप मृत्यु लोक में आए हैं, तो आपको द्वंद दिखाई देगा। दिन-रात, अच्छा-बुरा, यह दो चीजें होंगी। इसके बिना जीवन नहीं हो सकता। जहां गड़बड़ है, वहां समाधान अवश्य है। तो समाधान को खोजना है। अपनी एनर्जी को समाधान में लगाइए, ना कि ऐसा हुआ, वैसा हुआ, यह क्यों हुआ, ऐसा तो मेरे जीवन में नहीं होना चाहिए था, ये होना चाहिए था, नहीं होना चाहिए था। आप जीवन दाता थोड़े ही हैं। जीवन के अंतर्गत जो बातें हैं, उसको बनाने या बिगाड़ने वाले आप थोड़े ही हैं। कर्म फल दाता तो आप हैं नहीं। आप कर्म करने वाले हैं।

तो इसीलिए क्वेश्चन मार्क इतना लगाकर अपने चिंतन को नहीं बिगाड़ना, अपितु समाधान पर जाइए। प्रतिदिन प्रसन्न रहिए। हर दिन को नया दिन मानिए और नई उमंग के साथ कार्य कीजिए। और हर कार्य प्रभु को, गुरु को समर्पित करके कि प्रभु, जब तक जीवित हूं, आपके लिए कर रहा हूं। जो संसार दिया है, वह भी और परमार्थ तो मेरी पूंजी है। तो जगत के प्रति जितना आपका व्यवहार, जो आपकी ड्यूटीज हैं, कीजिए। लेकिन इस बात का हमेशा यह ध्यान रखिए, गीता की फिलॉसफी यत करोशी यदसीदास यश दर्पणम। श्री कृष्ण गीता में कह रहे हैं अर्जुन, यत करो, जो कर रहे हो, जो सोच रहे हो, जो दे रहे हो, जो ले रहे हो, जो कुछ भी कर रहे हो, हमेशा याद रखना कि तुम्हारी नजरों के सामने मैं रहना चाहिए। यानी मुझे सामने रख के काम करो। जगत का मैं सदा सामने रहूं। मुझे छोड़कर यदि तुमने कार्य किए, एक तो वह पाप और उसका फल भी सर्वनाश, तुम्हारा पतन। फिर मैं संभालने भी नहीं आऊंगा, क्योंकि तुमने मुझे छोड़ दिया।

इसलिए जो कुछ करते हो, हमेशा लक्ष्य यही रहना चाहिए, उनकी खातिर। मेरे खातिर भी नहीं, अपनी खातिर भी मत करो। पतन उनके खातिर। जब उनके खातिर सोचकर हम काम करेंगे, तो हम जगत से अनासक्त होकर काम करेंगे। जब हम आसक्त हो जाते हैं, ना, तो हम देखते हैं कितनी उपलब्धि हुई, कितने हम सफल हुए। यह तो हमने किया था, तो मिला क्यों नहीं। यह सब बाधाएं आने लगती हैं। लेकिन अपने को जब निमित्त मान लेते हैं और जब सफलता मिलती है, तो उस समय आप उतने विभोर भी नहीं होते। क्यों? क्योंकि आपने अपनी सफलता को उनकी कृपा मानी है। स्वयं तो आप निमित्त हैं।

इसलिए हर स्थिति में एक समान रहना। दुख है, कोई बात नहीं। जीवन का एक भाग है। सुख है, कोई बात नहीं। कर्म है, किए होंगे हमने पिछले जन्म में, फल मिल रहा है। या वर्तमान में अच्छा किया है, तो उसका फल मिल रहा है। लेकिन यह सुख-दुख, यह कर्म मेरे लिए कोई इंपॉर्टेंस नहीं रखते। क्यों? क्योंकि यह असली कर्म है ही नहीं। इन सब कर्मों से मेरे लक्ष्य की प्राप्ति तो होनी नहीं। मुझे भगवान तो मिलेंगे नहीं, उनका प्रेम तो मिलेगा नहीं। तो यह मेरे लिए इंपॉर्टेंट नहीं है। जगत में आया हूं, करना है, करूंगा। सो न्यूट्रलिटी मेंटेन करके रहेंगे। अनासक्त भाव से रहेंगे, तो यह संसार भी आपके मन को अपनी ओर विचित्र रूप में नहीं खींचेगा और मन भी आपका हरि गुरु के चरणों में लगा रहेगा।


Source : Raseshwari Devi Ji

प्रभु राम का जीवन और शिक्षा (रामायण भाग 1)

अयोध्या पूरी एक नया युग की प्रतीक्षा में थी। प्रजा लोग हर्षोल्लास के साथ खुशियां मना रहे थे। अचानक सब बदल गया। प्रभु राम को सिंहासन में अभिषिक्त होना था, लेकिन कैकई के प्रार्थना पर दशरथ जी ने प्रभु राम को 14 साल के वनवास की आज्ञा दी एवं भरत जी को सिंहासन में अभिषिक्त होने के लिए सूचित किया गया। एक दारुण दुस्वाद से सब लोग हतचकित हो गए, लेकिन प्रभु राम के श्रीमुख मंडल में वही स्मित हास्य जो राजा बनने की सूचना पाकर था और जो वनवास जाने की सूचना मिलकर वही स्मित हास्य उनके श्रीमुख मंडल में उदेति सविता ताम्रस्ताम्रवामेति च संपत्तच विपत्तच महता एक रूपता जैसे सूर्य भगवान उदय के समय में जिस रंग धारण करके निकलते हैं, जब अस्तांचल में जाते हैं, वही रूप लेकर जाते हैं।

जो महापुरुष होते हैं, तो सब समय एक स्थिति पर रहते हैं। भागवत में कहा गया है, "बाप की संपत्ति यानी प्रभु की संपत्ति को कौन संतान पा सकती है?" पहली शर्त तत्तुकम सुसमक्षमाणु, दूसरा उनवा कृतम विपाकम। उनकी अनुकंपा, उनकी कृपा पाने के लिए पहली शर्त है सुखदुख जो मिलता है, वो प्रभु की इच्छा मानकर उसको साहस भोग करना। जब सुख का समय आता है, सब लोग विभोर होकर हर्षित पुलकित हो जाते हैं और जो दुख का समय आता है, हम लोग बहुत भ्रमित हो जाते हैं। हम लोग बहुत परेशान हो जाते हैं। जिस प्रकार सुख हमारे किए हुए कर्मों का फल है, दुख भी तो हमारे किए हुए कर्मों का फल है।

तो इसीलिए संभापर्णता भगवान और महापुरुष हम लोगों को सिखाते हैं। अपने जीवन में इसको करके संभावपन्नता प्रभु राम के जीवन में सबसे बड़ी शिक्षा है। प्रभु राम राजा बनेंगे, यह सूचना जानकर जितनी प्रसन्नता है, जंगल जाना पड़ेगा। 14 साल के लिए जंगल जाना पड़ेगा, यह सूचना सुनकर वही उनकी स्थिति है। इसी को संभावपता कहते हैं। महापुरुष और भगवान यही समभाव गुण प्रकट करते हैं, जिससे हमको सीखना है।

संपूर्ण वैज्ञानिक है सुखदुख हमारे कर्मों का फल है। सुख का भोग करने के समय हम विभोर रहते हैं, दुख के भोग करने के समय हम परेशान हो जाते हैं। यह दुख तो हमारे किए हुए कर्मों का फल है। बल्कि हमको प्रसन्न रहना चाहिए। हमारे खराब कर्मों का फल भोग लेंगे, तो आगे अच्छा ही अच्छा है। जिस प्रकार सूर्य उदय के समय और अस्त के समय एक स्थिति में रहते हैं, महान व्यक्ति, महापुरुष और भगवान भी जीवन में यही आदर्श को स्थापित करते हैं। प्रभु राम ने यही आदर्श को जगत में स्थापित किया।

महापुरुष और भगवान के लिए खास करके महापुरुष के लिए कहा गया है, "वेदांत वाक्यु सदा रमंतः, भिक्षा न मात्र चतुष्टता, अशोक मंत करण चरंतः, कौपी निवंत खल भाग्यवंत।" जो मिल जाए उसमें प्रसन्न रहना। भिक्ष मात्रण चतुष्ट मंत क्योंकि कि अशोक वो अंतकरण में विचरण करने वाले। इसलिए ना वैभव, ना अभाव, उनके हृदय में कोई हर्ष, ना कोई उद्वेग पैदा कर सकते हैं। प्रभु राम यही आदर्श जगत में रखते हैं।

तीसरी सीख हमको यह मिलती है कर्तव्य परायणता और अधिकार का त्याग। प्रभु राम कर्तव्य परायणता के ऊपर जोर दे रहे हैं। क्योंकि हमको तो प्रभु से कृपा चाहिए। तो और हम अगर शास्त्रों के अनुसार कर्तव्यों का पालन करेंगे, हमारे प्रभु को प्रसन्नता होगी। इसलिए कर्तव्य परायणता का पालन प्रभु कर रहे हैं और अपना अधिकार जाहिर नहीं कर रहे हैं। क्योंकि अधिकार जो है, वो सुसुख वासना है। कर्तव्य परायणता यह है उनके सुख के लिए कार्य करना। अत कामे प्रेमे बहुत अंतर। काम अंधतम प्रेम निर्मल भास्कर। काम अपने सुख के लिए, यह है अधिकार भोग और कर्तव्य परता उनके सुख के लिए। यह है प्रेम।

तो काम प्रेम में बहुत अंतर होता है। काम अपने सुख के लिए, प्रेम उनके सुख के लिए। प्रभु कर्तव्य परायणता को जोर दे रहे हैं, अधिकार को कम प्राधान्य दे रहे हैं। व्यक्ति हो, परिवार हो, समाज हो, प्रांत हो, राष्ट्र हो, विश्व हो, समस्या तो यहीं पर है। हम सुसुख वासना अधिक रखते हैं, यानी अधिकार के संबंध में हम अधिक सचेत हैं और कर्तव्य प्रणता भूल जाते हैं। अगर हम कर्तव्य प्रणत को ध्यान रखेंगे, जिससे उनको सुख मिलेगा, अधिकार के ऊपर ध्यान कम होता जाएगा, जिससे हमको सुख मिलना मिलेगा। इसलिए प्रभु राम का जीवन आदर्श हम लोगों को ऐसी प्रेरणा देती है।

प्रभु संसार में आए, जगत में साधारण मनुष्य के समान कुछ लीलाएं करके गए ताकि हम साधारण मनुष्य उनकी संभावता, उनकी स्थिति, प्रज्ञता, उनकी कर्तव्य निष्ठा से हमको प्रेरित करें और हम प्रभु राम के आदर्श में अनुप्राणित होकर भगवत चिंतन, गुरु चिंतन से हम भवसागर से उत्तीर्ण हो जाएं। प्रभु राम अवतार लेकर यही शिक्षा दे रहे हैं।

Source : Swami Yugal Sharan_Hindi